कविता:-
मेरा बेटा बड़ा हो रहा है
घर से ही ,पैरों पर खड़ा हो रहा है
मेरा बेटा अब बड़ा हो रहा है।
मैं जाऊं जो मंदिर तो छाता पकड़ ले
मैं फिसलूं जरा तो, बांहों में जकड़ ले।
जब होता था अंधेरा, लग जाता था छाती
अब होते ही शाम, सुलगा देता दिया-बाती।
दुखें जो पैर , झट से आके दबा दें
लगे जो गर्मी, पंखा करके हवा दे।
वो मुझपे क्यों इतना फिदा हो रहा है
कर्ज ममता का शायद अदा हो रहा है।
अब न मांगे वो गुड़िया, न कोई खिलौना
मेरा लाल दुनिया में सबसे सलौना ।
क्या बचपन से बच्चा जुदा हो रहा है?
वो कच्चे से पक्का घड़ा हो रहा है ।
मेरा बेटा अब बड़ा हो रहा है।
सीमा शिवहरे ,"सुमन"
भोपाल।