बाल कविता :- 'सपने में गौरैया'
इक दिन सपने में गौरैया
टोली लेकर आई।
दाना- पानी नहीं रहा तो
दुनिया छोड़ दें भाई।।
कहाँ गये वो लिपे-पुते
खुले- खुले घर-आँगन।
ज्वार, बाजरा, गेंहूँ ,चावल
चुगते थे मन भावन।।
कच्चे आँगन के गढ्ढों में
भरा रहता था पानी।
राह तका करती थी अपनी
घर की दादी-नानी।।
बिना पेड़ सब आँगन सूने
घोंसला कहाँ बनाऐं।
अण्डे देकर कहाँ रखें
कैसे परिवार बढ़ाऐं।।
बालकनी में टाँगो काटके
एक प्लास्टिक का डब्बा।
नन्हे चूजे देकर हम भी,
बन जायें अम्मी अब्बा।।
बच्चों मदद करो हमारी
दुनिया बस जाऐगी।
हर घर के सूने आँगन में
फिर से गौरेया मंडराएगी।।
सीमा शिवहरे' सुमन'
भोपाल ।