प्रेम का अर्थ: -
भुल स्वीकारना भूल सुधारने का प्रेरम होता है....इस संसार में एसे कितने मनुष्य है जो भूल को स्वीकार करते हैं?
मनुष्य उसीकी भक्ति करता है जिसे वो प्रेम करता है परंतु उसी भक्ति को शक्ति बनाकर अपने आराध्य पर वस पाना चाहता है....
सब भूल गए हैं प्रेम का अर्थ किसको पाना नहीं उसमें खो जाना है....
आत्मा संतुष्टि नहीं आत्मा का विस्तार भक्ति का मूल प्रेम है....
मेंने आपको शब्द से समझाया आप नहीं समझे होंगे क्युकी शब्द सुनकर भूल है और जो दिखता है उसे याद रखते हैं....
इस लिए शिवप्रिया को जाना होगा सबको समजना होगा ईश्वर तक पहोच ने का मार्ग है प्रेम....
हर पीड़ा का अंत है प्रेम, हर शुभ का आरंभ है प्रेम....
ना पास ना दूर, ना मिलना ना बिछड़ ना, ना करीबी ना जुदाई.... एसी है शिवप्रये की प्रीत....
पाने को ही प्रेम करे जगकी है ए रीत,
प्रेम अर्थ समझायेगी शिवप्रेयी की ए प्रीत....?