हर रात मखमली नहीं होती
तीखे नोकों वाली रातें भी होती हैं
जो सहसा चुभ जाती हैं सीने में
एक धक्के से आँख खुल जाती है,
बहुत दूर तक दिखाई पड़ने लगता है
फिर रात है कि काटे नहीं कटती
और सुबह है कि सहर नहीं होती
हर रात मखमली नहीं होती
एक झड़ी लग जाती है
संवाद की, वार्तालाप की
बड़े दिनों बाद मिले
उस शख्स से
जिसे देखा नहीं आइनों में कई दिनों से
श्रंखला कहने सुनने की
फेहरिस्त शिकवा शिकायतों की ऐसी है कि
ख़त्म नहीं होती
हर रात मखमली नहीं होती
एक चेहरा याद आ जाता है
जिसे हाथों में लेते ही
पूरी धरती बस जाती थी आँखों में
एक सुकून मिल जाता था
लेकर बाहों में
उसे दूर से पास और फिर
पास से और पास लाने की
हसरत कम नहीं होती
हर रात मखमली नहीं होती