में सर्कस का जोकर.. – (केतन मोटला 'रघुवंशी')
में सर्कस का जोकर
हंस-हंस के में खेल दिखाऊ , - दिल ही दिल में रोकर ....
- ० में सर्कस का जोकर
कभी में नाचू कभी में गाऊ , - लोगो का में दिल बहलाऊ .
सब लोगो की ख़ुशी के खातिर, - अपने गम को भूल ही जाऊ .
सब के दिलो को जीत रहा हु , - अपना सबकुछ खोकर ..
- ० में सर्कस का जोकर..
जीवन के इस खेल में अक्सर , - कोई आता कोई जाता है ,
गम की चिंता मतकर प्यारे , - गम से हमारा नाता हे ,
सारे गम को गले लगाऊ , - ख़ुशी को मारु ठोकर ...
- ० में सर्कस का जोकर ..