सृष्टि के नव विकास हित,
नारी का जन्म हुआ।
पर स्वार्थ की बलि वेदी पर,
नारी का गौरव नष्ट हुआ।
चूनर हो गई तार-तार,
न हिले हृदय के दंभ द्वार।
निज कर्त्तव्यों के पालन में,
नित बार बार क्यों मरती है ?
जीवन के बहते कल-कल में,
नारी ही क्यों छलती है?
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