झूठों ने की तरक्की वो महलों को पा गए
सच्चे हमारे जैसे तो सड़कों पे आ गए
पत्थर की बहुत क़ीमतें बढ़ने लगीं साहिब
शीशे के लोग जबसे मेरे शहर आ गए
कुर्सी पे बैठना है तो होशियार अब रहो
लकड़ी के कीड़े कितनी ही शीशम को खा गए
महँगे लिबास उनके नुमाईश में लगे हैं
कैसे तमाशबीन तमाशे दिखा गए
शर्मिंदा कई सूरजों को कर गए हैं जो
बुझते दीये कुछ ऐसी रौशनी लुटा गए
शैतान कहें, साधु कहें या कि मदारी
चेहरे पे एक कितने वो चेहरे लगा गए