'कहीं ..!'
कहीं आकाश का ये नीला रंग,
तुम्हारे प्रेम की विष मय निशानी तो नहीं
कहीं सागर की मचलती लहरें,
तेरे विस्मृत नाम की कहानी तो नही
मृगतृष्णा के नाम को सार्थक करती हैं ,
दृग मरु की ये रेत चमकती हुई
चमकती है दृग-पंक्ति में 'जल सी' जो
वो पत्थर के प्यालों में पानी तो नहीं
बूंद मोती न जाने सीप में जाने का भेद सत्य
अपनी अतृप्त प्यास का महत्वपूर्ण सा तथ्य
व्यर्थ अभिमान हो उठेगा उसको स्वयं पर,
कहीं तुमने मेरे मन की प्यास जानी तो नहीं
....
कभी तुम पत्थर से कठोर कभी सागर से खारे
तभी आकाश से निष्ठुर लगे तो कभी लगे चमकते सितारे,
सब कुछ सिमट आता है तुम पर
चले आते हो स्मृतियों में प्रकृति का रूप धरकर
कहीं इन पेड़ों, हवाओं, बादल औ अम्बर से,
तुम्हारी मैत्री ..मुझसे पुरानी तो नही ?
....
सब कुछ समझ कर भी अनजान बने फिरते हो
कहीं तुम सचमुच अज्ञानी तो नही ..!
-कविता जयन्त