#Kavyotsav
सागर से सरिता चली.....
कुछ दूर तू कहाँ चली, इस घरसे अनजानी बनी,
इस दरिये को दे दुहाई, जैसे सागर से सरिता चली...
वो बचपन के देख खिलौने, कही कोने में पड़े है,
जैसे कोई बच्चे से माँ , नाराज होकर चली.....
वो आँगन का दियाँ, अब रौशनी भी देता नहीं,
महोताज़ था वो तेरे नूर का, उसे बेनूर कर चली...
वो मस्ती भरी बातें, वो तेरी झूठी कहानियाँ,
कुछ पल की हसी भी, उधार दे चली.....
वो आँगन की रंगोली, तेरे रंग पहनकर घूमती थी,
वो रंगीन दुनिया भी संग अपने ले चली...
वो प्यार पिता का, वो माँ का आँचल भी,
छोटे भाई - बहन को, यूँ मजधार छोड़ चली.....
वो चहकती दुनिया भी, कुछ पल में सूमसाम हो गई,
जैसे 'तीर्थ ' से ईश्वर की हस्ती चली..