# काव्योत्सव
शिर्षक-प्रेम
प्रेम तो शाश्वत है...
यह कब मिटता है.
धरती दिखती है हरी- भरी ,
आंसमा जब बरसता है.
चंद्र नहीं तो तारे बताएंगें,
चकोर यूं किये देखता है .
नदी को रास्ता देकर...
पहाड भी सह्रदयी दिखता है.
जो होती है रौशनी दिये से..
संग पतंगा क्यों जलता है.
प्रेम तो शाश्वत है
यह कब मिटता है.
कण कण में छुपा है प्यार..
गौर करें तो
सब दिखता है.
हर पल नया फिर भी पुरातन....
हर बार नया इतिहास रचता है.
दुरियां क्या
फासला करेंगीं दरम्या,
मन तो मन के पास रहता है.
ज़िन्दगी कम है जीने के लिए,
लड़ाई में वक्त क्यों जाया करता है.
शंकाओ को छोड.
खुशी पा लें " वंदे "
कौन यहां अमर रहता है .
प्रेम तो शाश्वत है
यह कब मिटता है.