#काव्योत्सव
चांदनी छीन ली
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अभी खिलने न पाई कमल की कली,
रुप की गंध उठने लगी माधुरी,
तीर ऐसा चलाया बढा कर भरम
बिधं गये थे नयन दृष्टि भी छीन ली।।
भावना की लहर में सतत बह चली
दृष्टि रीती रही, स्वप्न तरसा किए,
लाख तारे गिनूंगा सोचती ही रही ,
चंद्रमा चुप रहा , चांदनी छीन ली ।।
आग सी जल उठी,गगन तप्त था ,
आज मधुमास है ,फूल टेसू खिले,
मैं सुलगती रही,चाह में आपकी,
आंख रीती रही पर हंसी छीन ली,।
प्राण आए न बादल न पुरुवा चली,
मौन संताप से नैन बरसा किये,
चातकी सी पुकारी ,मैं रात भर
स्वर तिरोहित हुआ पर नमी छिन ली।।
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