प्यार का नगमा
तू समंदर के किनारे रेत जैसा,
में बहते पानी की गहराइयों से।
तू रेत सा बिखरा पड़ा था,
में तुजे खुद से मिलाने की नुमाइश में।
तेरी तिशनगी से अनजान,
फिर भी तेरी प्यास बुजाने की ख़्वाहिश में।
तेरे पास आती मेरी हर लहर को,
तुझे छूने की आरज़ू में।
तुजसे इश्क़ मुक़म्मल हो जाये,
बस इसी एक ख़िदमत में।
बैठा हूँ आज भी इस किनारे पे,
तेरे ही इंतज़ार में।
आना कभी तू मिलने मुझे,
जब तेरी मज़हबी लड़ाई पूरी हो जाये।
मेरे मज़हब इश्क़ को मिलने,
इन्सानी मुशायरो से निकलके,
खुद के ठहराव को मिलने।
मेरा इंतज़ार और इम्तहान दोनों ही खत्म करने,
इत्मिनान से सिर्फ मेरा बन जाने।
तेरे बिखरे हुए अंदाज़ को
मेरी गहराइयों में समा लेने।
मुझसे प्यार का एक समा बांध लेने।
---शिवानी शाह