#kavyotsav
*कैसी सी है वो*
मुझसे भी ज्यादा कुछ मुझसी है वो,
आंखें भिगो देने वाली हंसी के पीछे ,
खुशी सी है वो ।
कोशिश तो की है बहुत बताने की ,
पर कभी बता ना सका ,
कैसी सी है वो, कैसी सी है वो।।
जो महके कुछ उस सा ,
ऐसा कोई फूल नही
उसे कहना अक़्स खुदा का ,
ये भी तो कोई भूल नहीं ।
वैशाख की धूप में ,
सावन की समीर सी है वो
कोशिश तो की है बहुत बताने की,
पर कभी बता न सका
कैसी सी है वो, कैसी सी है वो ।।
जो चढ़ जाए कुछ उस सा,
ऐसा कोई नशा नहीं।
जादू ऐसा चला उसका,
दिल अब मेरा रहा नहीं।
आंखे बंद है फिर भी,
दिखती सूरज सी है वो
कोशिश तो की है बहुत बताने की,
पर कभी बता न सका,
कैसी सी है वो, कैसी सी है वो।।
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ये मेरी पुरानी यादें है जो मेरे रफ रजिस्टर के पन्नो से निकली हैं। अच्छी है या बुरी ये तो आप ही बताएंगे पर मैं तो इसी उम्मीद में लिख रहा हूं कि क्या मालूम ये उस तक पहुंचे जिसके लिए लिखा था।
अंकित महर्षि
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