सुख था जब जीवन में ,
अभिमान था तब मेरे मन में।
जुकता नहीं था किसी के आगे,
देता नही था कोई जो मांगे ।
वक्त गया बदलता ।
कुछ काम नही था में करता।
जिंदगी से था अब डरता ।
पलट गया अब तख्ता ।
आ गया अब सड़क पे ।
जिंदगी ले आयी उस मोड़ पे ।
वहां था मंदिर किशन तेरा ।
पहुच गया में दौड़ के ।
था दयालु वो मेरा कृष्ण ।
खुदको उसके हवाले किया ।
गलतिया थी मेरी बड़ी ।
फिरभी उसने माफ किया ।
थामकर हाथ था वो खड़ा।
बेफिकर होंके तब मैं लड़ा।
पा लिया सबकुछ फिरसे ।
सोचने लगा था, अब मैं दिलसे ।
आयी दिलसे एक आवाज।
नही छोडूंगा तेरा हाथ ।
एकलौता तू सहारा मेरा
मेरा कृष्ण, मेरा कृष्ण ।