आज मै ये कलम छोड़ रहा हुँ, शब्दों से मुंह मोड़ रहा हुँ
भरम तो भरम ही सहीं, खुदको उसमे झोंक रहा हुँ
फिर न कभी ये कलम उठेगी , ना लफ़्जो से कह पाऊँगा
शायद सांसें बचे न बचे, मै घोर अंधेरों मे खो जाऊंगा
शायद कल फिर मै दिखु न दिखु, पर रखना जे़हन मे इतना सिया
जो जगह है आपकी अंतर मे, ना कोई और वह ले पाएगा
बस एक सुनहरा सपना था, हम तुम संग जीवन होना था
पेशा नही है लिखना मेरा, अतित ने मुझे भड़काया है..
परवाह नहिं है तुझको मेरी, उसकी मुझे परवाह नहिं
क्षणिक खुशी के कारण ही, मै गुमनाम मुसाफिर हो जाउंगा
आपसे मिले इस हुनर को, वापिस आपको सोंप रहा हुँ
आज मै ये कलम छोड़ रहा हुँ, शब्दो से मुंह मोड़ रहा हुँ..