हक़ीक़त को भी आजमाने
एक रोज़ मैं चला था
तिनका- तिनका हर रोज़
सुलगी आग सा जला था
तपिस थी तेज़ बड़ी
जिस राह मैं चला था
अंगारे पैरों को जलाएं
कुछ मैं तो कुछ वो जला था
हक़ीक़त को भी आजमाने
एक रोज़ मैं चला था
फँस गई थी नैय्या भवंर में
तेज़ लहरों संग मैं बह चला था
बचा न सका डूबता आशियाना
खर-पतवार सम मैं पड़ा था
हक़ीक़त को भी आजमाने
एक रोज़ मैं चला था
जलता था हर दिन मैं
फिर जल - जल के बुझा था
हक़ीक़त को भी आजमाने
एक रोज़ मैं चला था।