ताया जी आ गए कप टूटने की आवाज सुन कर..
"महक , चिंटू कही लगी तो नहीं"
"नहीं ताया जी ..ठीक हूं "
महक ने धीरे से कहा
"अच्छा मैं भी चलता हूं अब देर हो रही है बस आपसे मिलने का मन था फाइल्स कल ड्राइवर ले जाएगा .अपना ध्यान रखिए"
कह कर देव मुड़ने लगा तो ताया जी ने उसे कस कर गले लगा लिया।
उसने हल्की नजर महक पर डाली ..उसके उड़े रंग को देखा और बिना एक क्षण रुके चला गया।
महक…
अब भी दरवाज़े के पास…
जैसे जमीन में गड़ी खड़ी थी…
चेहरा एकदम सफेद…
हाथ काँप रहे थे…
और दिल… जैसे किसी तूफ़ान में फँस गया हो…
उसके मन में सवालों का सैलाब उमड़ पड़ा—
"कौन है ये देव…?
ताया जी से क्या रिश्ता है…?
कभी उनका ज़िक्र क्यों नहीं हुआ…?
कहीं… ये मेरे लिए तो नहीं आया था…?
या… एक शरीफ चेहरे के पीछे… कोई और सच्चाई छिपी है…?"
सवाल…
बस सवाल…
और हर सवाल… दिल पर दस्तक देता हुआ…
रात हो चुकी थी…
घर के सारे लोग अपने-अपने कमरों में जा चुके थे…
हॉल अँधेरा था…
बस आँगन के कोने में एक पीली रोशनी जल रही थी…
महक बिस्तर पर लेटी थी…
पर आँखें छत पर टिकी थीं…
आज का हर पल…
उसके भीतर बार-बार जी उठ रहा था—
उनकी बाँहों का सहारा…
वो धीमी आवाज़— "संभालो खुद को…"
और फिर…
वो नज़रें…
वो हल्की मुस्कान…
महक के गाल गर्म हो उठे…
उसने करवट ली… तकिये में चेहरा छिपा लिया…
पर दिल… अब भी उन्हीं लम्हों में अटका था…
"देव… ताया जी के चिंटू…
क्या वही है… जिसका इंतज़ार मैं हर रोज़ MTNL की घंटी में करती थी…?"
अचानक उसकी नज़र टेबल पर रखे फोन पर पड़ी…
वो उठकर बैठ गई…
धीरे से रिसीवर उठाया…
डायल टोन सुनी…
फिर… बिना सोचे…
किसी अनजान नंबर पर उँगलियाँ घूम गईं…
पर अगले ही पल…
उसने खुद को रोक लिया…
"बस… अब और नहीं…"
वो शादीशुदा थी…
एक बच्ची की माँ…
"ये सब क्यों हो रहा है मेरे साथ…?"
उसके मन में डर भी था—
"कहीं कोई मुझे गलत या चरित्र हीन ना समझे…"
उसी पल… उसने खुद से वादा किया—
अब ना वो फोन उठाएगी…
ना किसी कॉल का इंतज़ार करेगी…
दिन बीतने लगे…
महक ने सच में फोन उठाना छोड़ दिया…
सुबह हो या दोपहर…
घंटी बजती… और वो अनसुना कर देती…
वो जानती थी—
अब उसे अपने दिल और दिमाग दोनों को काबू में रखना है…
जनवरी का आखिरी हफ्ता…
महक परी को पढ़ा रही थी…
तभी ताया जी लौटे…
थके हुए… परेशान…
"आप ठीक तो है ना ताया जी" महक पानी का ग्लास ले आई।
"मैं ठीक हूँ… पर बड़े बाबू ठीक नहीं हैं…"
उनकी आवाज़ भारी थी…
महक का दिल धक से रह गया—
"क्या हुआ उन्हें…?"
"पत्नी बहुत तंग करती है…
तीन दिन पहले दारू पी कर ऑफिस में हंगामा कर गई…तब से वो बड़े परेशान थे।
वैसे ही कम बोलते है अब और चुप से हो गए।
आज सुबह से बुखार… सांस लेने में दिक्कत…
पर दवा लेने को तैयार नहीं…"
📞 ट्रिन ट्रिन…
महक दौड़ी…
एक पल को लगा— देव का फोन है…
पर नहीं…
पोस्ट ऑफिस से ही फोन था ..
ताया जी को खबर मिली—
"उन्हें हॉस्पिटल ले जाया जा रहा है… वो बेहोश हो गए…"
ताया जी तुरंत निकल गए…
महक की आँखों में आँसू आ गए…
एक अनकहा रिश्ता…
जो उसने खुद भी कभी स्वीकार नहीं किया था…
आज उसी के लिए दिल दुआ कर रहा था—
"देव जी ठीक हो जाएँ…"
रात बीत गई…
नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी…
बस दुआ…
बस इंतज़ार…
सुबह के पाँच बजे…
दरवाज़ा खुला…
ताया जी लौट आए…
महक की धड़कनें जैसे थम गईं…
"कैसे हैं बड़े बाबू…?" उसने धीमे से पूछा…
ताया जी ने भारी आवाज़ में कहा—
"दिल का दौरा पड़ा था…
रात को ही बड़ा ऑपरेशन हुआ…
बड़ी मुश्किल से जान बची है…
शायद… किसी की दुआ काम आ गई…"
महक ने आँखें बंद कर लीं…
होंठों पर बस एक ही नाम था— "देव जी …"
थोड़ी हिम्मत करके उसने फिर पूछा—
"उनकी पत्नी… आई थी…?"
ताया जी के चेहरे पर कसक उभर आई—
"नहीं… उसे कोई फर्क नहीं पड़ता…"
"उनके माता पिता...वो तो होंगे उनके पास"
"अनाथ है वो...अनाथ"
ताया जी रो पड़े।
"कान्हा...वो कैसे रहेगा देव के बिना"
सोचते ही महक सिहर उठी फिर खुद को तसल्ली दी कि दीनू काका संभाल लेंगे।
महक का अगला सवाल जैसे खुद-ब-खुद निकल गया—
"तो… उनके पास कौन है…?"
ताया जी ने गहरी साँस ली—
"आलोक है… उनका दोस्त…
रात भर वही अस्पताल में रुका रहा…
सब संभाल रहा है…"
महक के मन में एक हल्की सी तस्वीर बनी…
एक अनजान सा चेहरा…
जो देव के सबसे मुश्किल वक्त में…
उसके साथ खड़ा था…
"तो… कोई तो है… जो उनका अपना है…"
उसने मन ही मन सोचा…
ताया जी फिर बोले—
"मैं थोड़ी देर आराम करूँगा…
अगर हो सके तो… थोड़ा सूप और खिचड़ी बना देना…
आलोक को भी कुछ खिलाना होगा…
रात भर से कुछ खाया नहीं उसने…"
महक ने पहली बार…
देव के लिए ही नहीं…
बल्कि आलोक के लिए भी
दिल से एक जिम्मेदारी महसूस की…
जैसे…
अब ये सिर्फ दया या हमदर्दी नहीं रही…
बल्कि एक अनकहा रिश्ता बनता जा रहा था…
एक ऐसा रिश्ता ना तो उसे देव चाहिए था ना उसे भुला पा रही थी...
....to be continued
MTNL की घंटी