Shrapit ek Prem Kahaani - 58 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 58

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 58

चतूर कहता है ----

> आलोक क्यों ना बाईक को कुछ दुर और अंदर ले जाकर दैखते है़ ? 

आलोक कहता है --

> नही यार मैं ऐसै भी ज्यादा करते ही बोला था क्योकी चेतन इतने समय मे इससे ज्यादा दुरी तय नही कर पाएगा। अब हम भानपूर की और जाएगें। 


आलोक बाईक चलाते हूए गुणा से कहता है--

> गुणा यार तु ठीक तो है ना ?  

गुणा दर्द से कराहते हुए कहता है--

> हां..... आह। मैं ठीक हूँ । 

आलोक समझ जाता है के गुणा को दर्द हो रहा है। 

आलोक बाईक को हॉस्पिटल के सामने रोकते हूए कहता है--

> गुणा तु अब अंदर जा और जाकर अपना ईलाज करा मैं समझ सकता हूँ के तुम तकलीफ मे हो। अब तुम जाओ और अपना ईलाज कराकर आराम करो मैं और चतुर चेतन को ढुंढने जाते है। 

तभी वहां पर एकांश भी आ जाता है और कहता है--

> अरे तुम सब यहां इतनी जल्दी आ गए। चेतन मिल गया क्या।

 एकांश इतना बोलकर गुणा के गाल को दैखने लगता है जहां से खुन निकल रहा था और कहता है--

> अरे गुणा ये तेरे गाल पर ये चोंट कैसे लग गई। 

एकांश घबराते हूए आलोक से पूछता है--

> आलोक तुम सब ठीक हो ना । कहीं गाड़ी का एक्सीडेंट तो नही हूआ ?

 एकांश गाड़ी और आलोक को दैखने लग जाता है। आलोक एकांश से कहता है --

> वो सब मैं तुझे बाद मैं बताउगां पहले तु गुणा को दवाई लगा। मैं और चतुर चेतन को ढुंढने जाते है वो अभी तक नही मिला है। बाकी बात आ कर बताता हूँ 


 इतना बोलकर आलोक और चतुर वहां से चला जाता है। आलोक चतुर भानपूर की और चार किलो मीटर अंदर तक तला जाता हैं। तभी आलोक बाईक को रोकते हूए कहता है--

> ये कैसे हो सकता है। चेतन ना ही उदयपुर की गया है और ना ही भानपूर की और तो फिर वो जा कहां सकता है़।

 चतुर कहता है--

 कहीं चेतन जंगल की और तो नही चला गया है ? 

चतुर की बात पर आलोक कहता है--

> हां यार शायद तुम ठीक कह रहे हो । क्योकींं इतनी जल्दी कोई जा कहां सकता है । पर आखीर ये चेतन है कौन ? और इतनी रात को जंगल जाने का साहस कैसे कर सकता है वो भी ये जानते हूए के उस जंगल के अंदर मौत है। यार इन सबके पिछे आखीर क्या राज है । 

आलोक जंगल के अंदर जाने के बारे में सौचता है। तभी चतुर आलोक से कहता है--

> आलोक कहीं तुम इस समय जंगल के अंदर जाने के बारे मे तो नही सौच रहे हो ? 

आलोक चतुर की बात पर हल्की मुस्कान देता है जिससे चतुर समझ जाता है के आलोक जंगल के अंदर जाना चाहता है। चतुर आलोक पर गुस्सा होते हूए कहता है--

> तु पागल है । लोगों की इस जंगल में दिन मे जाने से फटती है और तु रात मे जाने के बारे मे सौच रहा है। और कुंभ्मन क्या तु उसे भूल गया । रात मे देत्यों की शक्ती डबल होती है डबल। तु जो सौच रहा है ना वो तो अभी नही होने वाला । मैं इतनी रात को इस भयानक जंगल के अंदर नही जाने वाला।

 आलोक चतूर को समझाते हूए कहता है--

> दैख यार अगर अभी हम जंगल के अंदर जाते हैं तो हो सकता है के चेतन हमे मिल जाए। और उसकी 
मिलना बहुत जरूरी है। क्योकी अब वही हमे बता सकता है के इन सबके पिछे किसका हाथ है ।

आलेक की बात सुनकर चतुर कहता है--

> इतनी बड़ी जंगल इसमे तु चेतन को ढुंढ लेगी ? और अगर कुंभ्मन मिल गया तो । नही यार जरा दिमाग से सौच जान बची रही तो हम चेतन को कल भी ढुंढ निकालेगें। 

चतुर की बात को सुनकर आलोक सौचने लगता है और फिर जंगल नही जाने का फैसला करता है। क्योकी चतूर की बात काफी हद तक ठीक था। आलोक चतुर की बात सुनकर उसके कंधे पर हाथ रख कर कहता ह़े़ै--

> तु ठीक बोल रहा है यार । इतनी रात को जंगल मे जाना सही नही है। 

आलोक की बात सुनकर चतुर एक गहरी सांस लेता है और बाईक पर बैठकर हॉस्पिटल वापिस आ जाता है। हॉस्पिटल के अंदर आकर दौनो दैखता है के गुणा का गाल सुझा हुआ था और दौनो गालों पर पट्टी बंधी थी। गुणा के पास आलोक और वृंदा भी बैठे थे। 

आलोक और चतुर को दैखकर सभी उन दैनो के पास जाता है़ । एकांश आलोक से चतुर के बारे में पूछता है--

> क्या हुआ चेतन का कुछ पता चला ? 

आलेक अपना सिर ना में हीलाते हूए कहता है--

> नही यार । पता नही वो अचानक कहीं गायब हो गया। चतुर का मानना है के वो जंगल के अंदर चला गया होगा। पर इतनी रात को जंगल के अंदर जाना सही नही समझा।

 आलोक की बात पर एकांश कहता है--

> ठीक किया यार उस जंगल मे जाना सही नही है। 

सभी गुणा के पास जाकर बैठ जाता है। आलोक गुणा को दैखकर कहता है--

> अब कैसा है तेरा घांव गुणा। गु

णा अपने दौनो हाथ को दौनो गाल पर रखकर कहता है--

> ठिक है यार । 

एकांश आलेक से कहता है़--

> काफी गहरे घांव थे यार । पता नही ऐसी कौन सी पक्षी थी जो इतने गहरे घांव लगा दिया।

 मांतक और त्रिजला वही खिड़की के पास बैठकर उन सबकी बातों को सुन रहा था। चतुर गुणा पर हंसते हुए कहता है--

> आ...ज हा हा हा । आज पहली बार किसी पक्षी को दैखा जो.... हा हा जो गुणा की हालत खराप कर दिया।

 इतना बोलकर सभी हंसने लगते है। तभी गुणा की नजर मातंक और त्रिजला पर जाती है। जिसे दैखकर गुणा बहुत हैरान और डर जाता है। गुणा सभी को इशारा करके मांतक और त्रिजला को दिखाता है। जिसे दैखकर आलोक और चतुर की बोलती बंद हो जाती है। आलोक कहता है--

> ये ये यहां भी हमारा पिछा करते हूए आ गया?

एकांश दैखता है के दौ पक्षी खिड़की के पास बैठा है जिसमे से एक का खुन बह रहा था। तभी गुणा कहता है--

> आज तो मैं इसे छौड़ूगां नही । 
इतना बोलकर गुणा एक लकड़ी उठाता है और उन पक्षीयों को मारने के लिए भागता है तभी एकांश गुणा को रौककर कहता है--

> ये क्या कर रहा है तु गुणा । एक बेजुबान को मारने 
चले हो। गुणा कहता है । तुझे नही पता यार ये कितना खतरनाक है। इसी ने मेरा ये हाल किया है और हर जगह पिछा भी करने लगा है।
 आलोक कहता है -

> गुणा सही कह रहा है यार मुझे तो ये पक्षीयां कुछ 
अजीब लग रहा है। जैसै की ये हमारा पिछा कर रहा हो। 

आलोक की बात सुनकर एकांश कहता है--

>आलोक तु भी ऐसा बोल रहा है। 

एकांश पक्षी की और इशारा करते हूए कहता है--

> दैख जरा उस पक्षी को , कितना घायल है बेचारा । वो डरा हुआ है और एक डरा हुआ जिव अपनी जान
 बचाने के लिए कुछ भी कर सकता है। तो तब भी उसने ऐसा ही किया होगा ।


एकांश गुणा से कहता है--

> जैसे अभी तुमने क्या अपने उपर हमला होते दैख उसे जान से मारने चले थे। उसी तरह इसने भी अपनी जान बचाने के लिए तुमपर हमला कर दिया होगा। 

एकांश की बात सुनकर त्रिजला मांतक से कहती है--

> स्वामी ये मानव कितना बुध्दीमान है। कितनी सरलता से इसने उस मूर्ख को समझा दिया। 

मांतक कहता है--


> हां त्रिजला तुम सत्य कह रही हो। ये मानव एक सच्चा मन वाला मानव है ।

एकांश की बात सुनकर सभी सांत हो जाता है । एकांश घायल पक्षी की और आगें बड़ कर कहता है--

> दैख अब मैं कैसे उस पक्षी के पास जाता हूँ । 

इतना बोलकर एकांश आगे बड़ने लगता है । एकांश को मांतक की और जाता हूआ दैखकर त्रिजला मांतक से कहती है --

 स्वामी अगर इसमे आपको कोई छती पहूचाने की कोशीश की तो मैं इसे भी दंड दूगी। 

इतना बोलकर त्रिजला एकांश की और गुस्से से दैखने लगती है।। आलोक एकांश को रोकते हूए कहता है--

> रुक जा एकांश आगे मत जा ये पक्षी बहुत खतरनाक है। 

मांतक और त्रिदला एकांश नाम सुनकर हैरान हो जाता है। और त्रिजला का गुस्सा सांत हो जाता है। एकांश अब मातंक के पास पहुँच जाता है। जो पक्षी के वेष मे था। एकांश पक्षी की और अपना हाथ बड़ाता है और उसे सहलाने लगता है। त्रिजला चुपचाप होकर ये सब दैख रही थी । एकांश पक्षी को अपने हाथ में उठा लेता है। जिसे दैखकर सभी हैरान हो जाता है। त्रिजला मातंक से कहती है--.

> स्वामी ये मानव क्या कर रहा है। 

मांतक त्रिजली से कहता है--

 तुम अभी सांत हो मैं सिर्फ ये जानना चाहता हूँ के ये वही एकांश है या कोई और। 

त्रिजली मांतक की बात सुनकर चुप हो जाता है। आलोक और चतुर एक साथ कहता है--

> संभल कर एकांश। 

एकांश उस पक्षी को एक टेबल पर बैठा दैता है और उसके सिर से खुन को एक कॉटन से पोछने लगता है। खुन साफ हो जाने के बाद एकांश उसे मलहम लगाकर फिर उसी जगह पर जा कर छौड़ देता है। जहां से वह उसे लाया था। दवाई लगने से मांतक को अच्छा लग रहा था। मांतक त्रिजला से कहता है--
> त्रिजला हो ना हो ये वही एकांश है जिसे हम ढुंढ रहे थे। कुंभ्मनी ने इसी का नाम बताया था। 

त्रिजला कहती है--

> आपकी आञा हो तो इसे अभी यहां से कुंभ्मन के पास लेकर चलुं ?

To be continue....937