Shrapit ek Prem Kahaani - 57 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 57

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 57

> मालिक ! इस कागज पर ऐसा क्या लिखा है जिससे पड़कर आपकी ये हालत हो गयी। 

 दक्षराज कागज़ को दयाल के हाथ मे थमा देता है। दयाल कागज को मन ही मन पड़कर लगता है। चेतन ने कागज पर लिखा था के हवेली के आसपास कोई दैत्य शक्ती है जिसका आभास मुझे हो रहा है। शायद वो शक्ती छिपकर हमारी बात सुन रहा है इसिलिए मेैने इस कागज पर लिख कर तुम्हे सब बता रहा हूँ।

 चट्टान सिंह की बात मुझे समझ मे आ गया है क्योकी हॉस्पिटल मे मुझे आभास हो गया था के आलोक को मुझ-पर शक हो गया है और वो मुझ-पर नजर रखने लगे है।


 इसिलिए मैं वहां भागकर यहीं आ गया परतुं आलोक और उसके दोस्त अब कभी भी यहां आ सकता है इसिलिए मैं अब यहां से चलता हूं तुम्हें कल सुबह बाबा के पास आ जाना हम वही पर बात करेगे़ और हां तुम लोग अब सावधान रहना क्योकी हवेली के उपर जो दौ पक्षी बैठा है वह कोई और नही बल्की दैत्य है उसे शायद तुमपर शंदेह हो गया है इसिलिए तुम पर नजर रख रहा है। 


तुम सतर्क और सावधान रहना और ऐसी कोई भी बात नही करना जिससे उसका शंदेह सत्य हो जाए और ऐसा होने पर तुम सब मारे जाओगे। मैं ये लिखकर इसिलिए बता रहा हुँ क्योकी उन्हें हमारी देवनागरी लिपि समझ मे नही आएगी। दयाल के माथे पर भी पसीने के बड़ी बड़ी बूंदे आ जाती है। 

दक्षराज और दयाल बहुत ही घबराए हूए थे । दौनो ही धीरे से हवेली के उपर दैखता है जहां पर दैनो को दौ पक्षी दिखाई दैता है जिसकी आंखे अंगीरे जैसी लाल थी जो इम सबको ही दैख रहा था। दक्षराज और दयाल दौनो की हालत डर के मारे खराब हो जाता है। दौनो थर थर कांपने लगते है। तभी चेतन दयाल से कागज लेकर कुछ और लिखने लगता है और दक्षराज को दे देता है। 

जिसमे लिखा था के उन दैत्य को अभी तुमपर सिर्फ शंदेह है विश्वास नही अन्यथा तुम सब अभी तक जिवित नही रहते इसिलिए यूं घबराकर और डरकर उससे विश्वास मत दिलाओ। शांत रहो और उसे यहां से जाने दो। अब मैं चलता हूँ। 

इतना बोलकर चेतन वहां से चला जाता है। मांतक और त्रिजला ये सब दैख रहा था । तभी वहां पर आलोक चेतन और गुणा भी आ जाता है । आलोक को दैखकर दक्षराज हैरान हो जाता है। आलोक दक्षराज को हवेली के बाहर दैखकर कहता है--

> बड़े पापा आप यहां हवेली के बाहर इतनी रात को क्या कर रहे हो ?

 दक्षराज कहता है --

> वो बेटा नींद नहीं आ रही थी इसलिए मैं बाहर घूमने चला आया पर तुम इतनी रात को यहां कैसे ? 


आलोक कहता है--

> वो बड़े पापा हम एक पेसेंट को ढुंढ रहे है जो हॉस्पिटल से बिना बताए भाग गया है।

 दक्षराज समझ जाता है के आलोक चेतन के बारे मे ही बात कर रहा है । दक्षराज कहता है--


> अच्छा पर उसे यूं हॉस्पिटल से भागने की क्या जरुरत पड़ गया और अगर भाग भी गया तो क्या जाने दो इतनी रात को ढुंढ कर क्या करोगे वो भी ये जानते हूए के कुंभ्मन अब आजाद हो चुका है।

 आलोक कहता है --

> हां बड़े पापा ।

 दक्षराज के चैहरे पर अभी भी हवेली के उपर बैठे दौनो पक्षी रुपी दैत्य का भय था। जिसे दैखकर आलोक दक्षराज से पूछता है---

> बड़े पापा आपको कोई परेसानी है क्या ? 

दक्षराज कहता है। नही --

> नही बैटा ऐसी कोई बात नही है।

 दक्षराज को घबराता हुआ दैखकर आलोक सौचता है--

> लगता है चेतन यही हवेली के अंदर है इसिलिए शायद बड़े पापा इतने घबरा रहा है। मुझे अंदर जाकर दैखना चाहीए। 

इतना बोलकर आलोक अंदर जाकर चेतन को ढुंढने लग जाता है। 

दक्षराज सौचता है---

> अच्छा तो चट्टान सिंह सही बोल रहा है। ये आलोक चेतन को ही ढुंढने आया है। अच्छा हुआ के चेतन यहां से चला गया। 

उपर बैठे मांतक और त्रिजला दैख रहा था। तभी त्रिजला मातंक ये पूछती है--

> स्वामी ये मानव ऐसे किसे ढुंढ रहे है। और उस मानव ने ऐसा क्या शंदेश लिख कर दिया के इन सबके मुख मे डर और घबराहट थी। 

मांतक त्रिजला से कहता है--

> मैं भी वही सौच रहा हूँ त्रिजला के आखिर उस मानव ने ऐसे क्या लिख दिया के इन सबका मुख मे चितां आ गई। 

मांतक दक्षराज के हाथ मे उस कागज को दैखकर कहता है--

> परतुं अगर वो पत्र हमे मिल जाए तो हम उस पत्र तो किसी मानव से पड़ा सकते है क्योकी ये शंदेश उसी के भाषा मे लिखा गया है। 

मांतक की बात सुनकर त्रिजली कहती है--

> तो विलम्ब क्यो स्वामी मैं अभी जाकर उस पत्र को 
उसके हाथ से छिन कर ले आती हूँ।

 त्रिजली जाने वाली होती है के मांतक त्रिजला को रोकते हुए कहता है--

>. नही । रुको त्रिजला ये तुम क्या करने जा रही हो। जरा सौचे के ऐसी कौन सी पक्षी है जो मानवो का 
शंदेश उसके हाथ से छिना करती है। अगर तुमने ऐसा कर दिया तो उन मानवो का हम पर शंदेह हो जाएगा और हमारा कार्य अधुरी रह जाएगी। 

त्रिजला अपनी भूल स्वीकारते हूए कहती है-- 

> मुझे क्षमा कर दिजिए स्वामी मुझे इस बात का ञान नही था। 

मांतक त्रिजला तो सहलाते हूए कहता है--

> कोई बात नही परतुं आगे से ध्यान रखना के कुछ भी करने से पहले मुझसे पूछ लेना ।

 त्रिजला हां में अपना सर हिलाती है इधर हवेली के अंदर काफी ढुंढने पर भी आलोक को चेतन नही मिलता है तो आलोक कहता है़ --
> लगता है हमारे आने से पहले ही चेतन यहां से जा चुका है। पर कहां गया जा सकता है। 

आलोक कुछ सौचता है और कहता है--

> जहां भी गया होगा ज्यादा दुर नही गया होगा मैं उसे 
ढुंढ निकाल लुगां। 

इतना सौचकर आलोक हवेली से बाहर आ जाता है। आलोक गुणा और चतुर को दैखकर ना मे अपना सर हीलाता है। दौनो ही समझ जाता है के चेतन यहां पर नही है। तभी गुणा की नजर छत पर बैठे पक्षियों पर जाता है। 

जिसे दैखकर गुणा घबरा जाता है और चतुर को इशारा करते हूए दिखता है। चतुर उन दौनो पक्षीयों को दैखकर हैरान हो जाता है और गुणा से धीरे से कहता है---
.> यार ये पक्षी तो हमारा पिछा यहां तक करते हुए चला आया। 

गुणा कहता है---

> हां यार मुझे तो डर लग रहा है के कहीं वो पक्षी फिर से हमपर हमला ना कर दे।

 गुणा और चतुर के अपने ऐर दैखते हूए मांतक कहता है--

> त्रिजला उन दौनो को दैख रही हो। 

त्रिजला कहती है--

> हां स्वामी ये तो वही है जो हमे कुछ क्षण पहले मिला था और ये भी दैख रही हूँ के ये दौनो हमे ही दैख रहे हैं। परतुं स्वामी इन सबके चेहरे पर एक अजीब सा भय और घबराह है। 

मांतक कहता है---

> हां त्रिजला तुमने सत्य कहा। इन सबको दैखकर पता 
नही क्यो ऐसा लगता है के हमे इनसे कुछ ना कुछ तो जरुर पता चलेगी। बस हमे इन सब पर नजर रखनी होगी।


आलोक को हवेली से बाहर आता दैखकर दक्षराज आलोक पूछता है--

> क्या हुआ बेटा तुम्हे कुछ चाहिए क्या ? तुम शायद कुछ ढुंढ रहे हो।

 आलोक कहता है---

> हां बड़े पापा मैं अंदर मे चेतन को ढुंढ रहा था। 
आलोक सिधे जवाब से दक्षराज घबरा जाता है । 

दयाल आलोक से पूछता है----

> कौन चेतन और वो यहां क्यूं आएगा आलोक बाबा। आलोक कहता है---
> मैं जानता हूं काका के आप लोग चेतन को ऩही जानते होगे। वो इस गांव का है ही नही वो तो कल मेला दैखने के लिए यहां आया था और कुम्भन के आने पर भाग दौड़ मे उसके पैर मे चौंट आ गई थी जिसका ईलाज करीने के वह हॉस्पिटल आया था पर उसके बातों पर मुझे शक हो रही था के वह झुट बोलकर हॉस्पिटल मे आया था और वहीं से बिना बताए भाग गया। 

गुणा और चतुर ने उसे इधर ही आते हूए दैखा था तो मैं घबरा गया था के कही वो हवेली पर तो नही छुप गया और कहीं आप लोगो को कोई नुकसान ना पहूँचा दे इसिलिए मैं यहां पर आ गया। आलोक की बात सुनकर दक्षराज बड़ी चतुराई के साथ कहता है----

> तुम उसकी चिंता मत करो बैटा यहां पर कोई भी नही आया था। और इतनी रात को तुम्हें ऐसे नही निकलना चाहिए। अब क्या करोगे । रात भर यहां रुक जाओ सुबह होने पर चला जाना। वैसे भी रात काफी हो चुकी है। और तुम लोगो को कही जाने की जरुरत नही । 

दक्षराज की बात पर आलोक कहता है--

> नही बड़े पापा हमे हॉस्पिटल जाना ही पड़ेगा पर आप टेंशन मत लो हम लोग चले जाएगें। 

इतना बोलकर आलोक और सभी वहां से चला जाता है। दक्षराज और दयाल भी वहां से हवेली के अंदर चला जाता है। उपर बैठै मांतक और त्रिजला ये सब दैख रहा था। त्रिजला मातंक से कहती है--

> स्वामी इस मनुष्य ने उससे झुट क्यो बोला के चेतन 
यहां पर नही आया था। 

मांतक कहता है ---

> मैं भी यही सौच रहा हुँ । जबकी वह मनुष्य उनके 
आने से पूर्व ही यहां से गया था जो चेतन ही था । उधर बाईक पर बैठकर गुणा आलोक से पूछता है । 

अब क्या यार चेतन तो हाथ से निकल गया। 

अलोक कहता है---

> बच के जाएगा कहां ।

 चतूर कहता है---

> मतलब। 

आलोक कहता है--

>मतलब ये , के वह पैदल था और हम बाईक पर इसका मतलब वह ज्यादा दुर नही गया होगा अगर हम दौनो और दैखा तो चेतन हमे मिल सकता है़ ।

 गुणा आलोक से कहता है--

> पर यार हम उसे ढुंढेगे कहां ? 

आलोक कहता है--

> यहां से दौ रास्ते जाते हैं। एक उदयपुर की और तो 
दुसरी तरफ भानपुर और बिच मे हमारा गांव । बाकी चारो और सुंदरवन है। और इन तिनो गींव से बाहर जाने का यही दौ रास्तों है। हम पहले उदयपूर की और दै किलो मीटर अंदर की और जाएगें फिर वापस चार किलो मिटर भानपूर की और जाएगें। मुझे यकीन है के वह इससे ज्यादा दुर नही जा पाएगा। अब चलो जल्दी। 


इतना बोलकर सभी बाईक से उदयपुर की और चला जाता है। मांतक और त्रिजला भी बाईक का पिछा920 करने लग जाता है। आलोक बाईक को लेकर उदयपुर की और दौ किलो मीटर अंदर तक जाता है। पर वहां उसे चेतन नही मिलता । आलोक झट से बाईक को भानपूर की और घुमाता है। तभी चतूर कहता है ----

> आलोक क्यों ना बाईक को कुछ दुर और अंदर ले जाकर दैखते है़ ?

To be continue.....920