एकांश गुणा और चतूर से कहता है--
थैंक्स यार तुम दौनो ने मेरी बहुत हेल्प की । अगर आज ये दवाईयां नही आती तो बहोत प्रब्लाम हो जाती ।
चतुर एकांश से कहता है--
> दैख यार दोस्ती में नो थैंक्स । वैसे भी हमारे पास ही नही हा कुछ करने को इसिलिए इसे कर लिया।
तभी गुणा हिचकिचाते हुए कहता है--
> यार एकांश हम दौनो ये सौच रहे थे के जब हमारे पास काम करने के लिए कुछ भी नही है। तो ..... !! तो क्यों ना तुम हमे इसी हॉस्पिटल मे कुछ काम दे दो। गुणा और चतुर की बात सुनकर एकांश दौनो को दैखने लग जाता है।
गुणा और चतुर को लगता है के उन्हेने एकांश को ये बात बता कर अच्छा नही किया । तभी एकांश खुशी से कहता है--
> यार माफ करना मैं थोड़ा सौच मे पड़ गया था।
एकांश की बात सुनकर गुणा कहता है--
> हां यार हम जानते है के हमे तुझे अपनी मजबूरी नही थौपनी चाहिए। हमे माफ करना यार ।
गुणा के इतना कहते ही एकांश कहता है--
> अबे कमिने मेरी बात तो सुन लिया करो पहले। कई दिनो से मैं भी यहीं सौच रहा था के मैं तुम दौनो से इसी हॉस्पिटल पर काम करने को कहु पर हिम्मत नही कर पा रहा था । यही सौच कर मैं नही बोलता था के कही तुम्हे ये ना लगे के मैं तुम पर तरस खा कर कह रहा हूँ।
एकांश की बात सुनकर गुणा और चतुर खुश हो जाता है और चतुर कहता है।
--
> यार पर हम दौनो करेगें क्या ?
एकांश कहता है--
> मेरे हॉस्पिटल में अकाउंटेंट का जगह खाली है जिसके लिए मुझे इमानदार आदमी की जरूरत है जो हॉस्पिटल का सारा हिसाब किताब रखे और उस पोस्ट के लिए तुम दौनो से बेहतर और कोई नही हो सकता।
एकांश के मुह से अकाउंटेट का नाम सुनकर दौनो खुशी से नाचने लगते है। और एकांश को गले लगा है। और दौनो ही एकांश को खुशी से कहता है --
> थैंक्यू मेरे यार।
उधर हॉस्पिटल के अंदर सभी गांव वाले आपस मे मेला के बारे मे ही बात कर रहे थे।
पहला आदमी कहता है-
> कल तो मेला मे हम सब बाल बाल बच गए वरना कुंम्भन तो कल हम सबकी मौत बनकर आया था।
तभी दुसरा आदमी कहता है--
> हां भाया आखीरकार कुंभ्मन अब इस गांव मे प्रवेष कर ही गया।
तभी वहां पर गुणा और चतुर भी आ जाता है। और कहता है---
> हां काका आप बिल्कुल सही कह रहे हो। अब कुंभ्मन रक्षा कवच को तौड़कर इस गाँव मे आ ही गया अब पता नही इस गाँव और इस गाँव के लोगो का क्या होगा।
तभी उनमे से एक आदमी बोल पड़ता है--
> कुछ नही होगा हमारे गाँव का जबतक इंद्रजीत मालिक हमारे साथ है । क्योकीं कल उन्होनें उसी जगह पर एक शक्ती कलस को स्थापित क्या है। और वहां पर पहरे दार भी लगा दिए है । ताकि फिर से कोई रक्षा कवच की तरह इसे तौड़ ना पाए अब वो कुंभ्मन फिर से उसी जंगल मे कैद हो गया है।
कुंभ्मन के कैैद होने की खबर सुंकर सभी खुशी से नाचने लगते है और इंद्रजीत की जय जय कार करने लगता है। तभी उन लोगो की बात को सुन रहे चेतन बड़े चतुराई से बोल पड़ता है--
> ये तो बहुत अच्छी खबर भाया। पर भाया एक बात तो है के कल मेले में कुंभ्मन को अगर उस शक्ती ने ना मारा होता तो कल सबका अंतिम दिन होता। पर दुखः की बात यह है के हम मे से किसीने उस शक्ती को दैख नही पाया।
चेतन की बात सुनकर चतुर कहता है --
> कौन सी शक्ती की बात कर रहै हो तुम भाई।
चतुर की बातत सुनकर चेतन कहता है--
> क्या भाया सबने उस शक्ती को दाखा तुम कहां पर थे ? क्या तुमने वो नीली रोशनी नहीं दैखा जितके
लगने से कुंभ्मन दुर जंगल मे जा गिरा।
चेतन बड़ी चतुराई से बात को बनाकर कहता है --
> बस दुखः इस बात का है भाया के वह शक्ती कहां से आई थी ये भीड़ ज्यादा होने के कारण से दैख नही
पाया पर अधिकतर गाँव वालो का कहना है के वो शक्ती देवी मां की थी जिसने कुंभ्मन से गांव वालो की हमारी रक्षा की है।
चेतन के इतना कहने पर सभी गांव वाले चेतन की बात को सुनकर हैरान थे। तभी उनमे से एक आदमी चेतन से कहता है--
> के बात कह रहे हो भाया क्या सच मे किसी शक्ती ने कुंभ्मन को मार भगाया था। हम सब तो अपनी जान बचावे के खातिर इधर उधर भाग रहे थे तो हम सब कैसै दैख पाते क्यों भाया।
बाकी सभी गांव वाले भी यही कह रहे थे । गाँव वालो की बात सुनकर चेतन समझ जाता है यहां पर उसे कुछ भी पता नही चलने वाला। चेतन एक गहरी सांस लेता है और चुप चाप वहीं बैठ जाता है। तभी चतुर बोल उठता है--
> उफ मैं भी वही पर था मेला मे पर अगर वर्शाली
घायल नही होती तो शायद मैं भी उस शक्ती को दैख पाता।
चतुर की बात पर चेतन झट से पुछता है--
> वर्शाली ये कौन है और ये घायल क्युं हुआ था ?
चतुर कहता है --
> वो एकांश को बचाने के चक्कर मे वर्शाली घायल हो गई थी । क्योकी कुंम्भन ने एकांश पर हमला कर दिया था ना।
चेतन को अब चतूर से और बातें जाननी थी क्यूंकी चेतन जो जानना चाहता था चतूर उसे बताये जा रहा था । चेतन बड़े उत्साह के साथ चतूर से पूछता है--
> ये एकांश हमारे डॉक्टर बाबु ही है ना ?
चतूर जवाब दैकर कहता है--
> हां वही है।
चेतन फिर पूछता है--
> पर कुंम्भन ने डॉक्टर बाबन पर हमला क्यो किया ?
चतूर कुछ कहता तभी आलोक वहां पर आ जाता है
और बात को बदलते हूए कहता है--
> ये क्या भाई तुमने तो डॉक्टर बाबु से कहा के तुम
मेला मे थे और तुम ही सब से मेला के बारे जानकारी ले रहे हो के कुंम्भन ने हमला क्यो किया ये बात तो मेला गये हूए सबको पता है के कुंम्भन ने हमला क्यों किया था और उसने सिर्फ एकांश को चुनकर ही हमला नही किया था। बल्की मेला मे उपस्थित सभी के उपर उसने हमला किया था।
आलोक चेतन के करिब जा कर कहता है--
> क्या कुंम्भन ने आप पर हमला नही किया था। महाशय !
चैतन आलोक के सवाल से परेसान हो जाता है। और घबराते हूए जवाब देता है--
> अरे नही भाई ऐसी कोई बात नही है मैं तो बस यूं ही सब से बात चीत कर रहा था। हें हें हें हें हें !
चेतन समझ जाता है के अब अगर कुछ भी सवाल जवाब किया तो आलोक को उसपर शक हो जाएगा इसिलिए अब चुप रहना ही बेहतर है। चेतन सौचता है--
> के अब चुप रहना ही ठीक रहेगा क्यूंकी कहीं इन सबको मुझ-पर शक ना हो जाए। वेसे भी मेरे लिए इतना जानना काफी है के डॉक्टर पर भी हमला हुआ था और वर्शाली ने उस डॉक्टर को बचाया था और वो घायल हो गई थी ।
चेतन अपनी नजरे हॉस्पिटल के चारों और घुमाकर दैखता है और सौचता है--
" परंतु यहां पर तो कोई भी स्त्री या लड़की दिखाई नही दे रही है। अगर वो घायल होती तो उसे हॉस्पिटल मे तो जरुर होना चाहिए था। मुझे सिघ्र ही पता करना होगा के ये वर्शाली आखीर है कौन ? कहीं यही तो परी नही है ।
चेतन बार बार अपनी नजरे हॉस्पिटल के चारों और घुमा रहा था। ताकी उसे वर्शाली दिख जाए । आलोक अपनी नजरे चेतन पर ही टिका कर रखा था । आलोक चेतन को दैखकर सौचता है--
> आखिर ये बार बार इधर उधर क्या ढुंढ रहा है। इस आदमी पर मुझे नजर रखनी होगी।
आलोक चतूर से कहता है----
> अरे चतूर तुझे वो वृन्दां बुला रही थी । तुने जो
दवाईयां लाई है ना उसी के बारे मे पुछ रही थी।
चतुर कहता है --
> अच्छा ...! हां मैं तो उसे बताना भुल ही गया था।
इतना बोलकर आलोक चतूर को एकांश के पास लेकर चला जाता है। चतुर आलोक से कहता है--
> अरे यहां तो वृन्दां नही है । मैं उधर जाकर दैखता हूँ ।
इतना बोलकर चतूर वहां से जाने लगता है। तभी आलोक उसे रौककर कहता है--
> रुको । तुम्हे किसीने नही बुलाया मैने झुट बोलकर तुझे यहां पर लाया हूँ।
आलोक की बात सुनकर चतुर हैरानी से पुछता है--
> क्या झूट बोलकर पर क्यूं यार ?
आलोक कहता है--
> वो इसिलिए क्योकींं तुझे उस आदमी से दुर करना था।
चतूर हैरान होकर आलोक से पूछता है--
> दुर करना था क्या मतलब , कौन है वह आदमी ?
तभी वहां पर गुणा और वृन्दां भी आ जाती है। गुणा सभी को एक साथ दैखकर कहता है--
> अरे ! तुम सब यहां क्या खिचड़ी पका रहे हो ?
आलोक कहता है --
> अच्छा तुम सब भी आ गए । मुझे तुं सभी से कुछ
बात करनी है।
आलोक बात सुनकर एकांश भी आलोक से कहता है--
> हां आलोक उस दिन तुम निलु काका के बारे मे कुछ बताना चाहते थे , मैं तो तुमसे फिर पूछता ही भूल गया, क्या बात है बोलो ना।
आलोक अपने इधर उधर दैखता है और कहता है--
> निलु काका ने जो कहा था के उनका किडनेप हुआ था। और हमारे पूछने पर उन्होनें उस किडनैपर का चैहरा नही दैखा और फिर वह वहां से भाग निकला।
आलोक एकांश की और दैखकर कहता है--
> क्या तुम्हे उनकी बातों पर यकीन हो रहा है। वह बार बार अपनी नजरे चुराते बात कर रहा था और कोई तभी ऐसा करता है जब वह झुठ बोल रहा हो।
आलोक की बात सुनकर गुणा कहता है--
> पर आलोक ये भी तो हे सकता है के निलु काका सच बोल रहा हो भला वो हमसे झुठ क्यों बोलेगा ?
आलोक कहता है--
> हां हो सकता है के निलु काका कू बात सच है पर
उनके सरीर पर लगी खरोचें ये साफ साफ कह रही है के निलु काका झुठ बोल रहे है।
सभी आलोक की और बड़े गौर से दैख रहा था । आलोत अपनी जारी रखते हुए कहता है--
> उनकी सरीर पर लगी खरोंचे किसी इंसान के नही हो सकते है। इतनी बड़ी और गहरी नाखुन किसी इंसान के हो ही नही सकते ।
To be continue....847