मातंक कहता है--
> तुम चिंता ना करो मित्र कुम्भनी हमारी भी पुत्री है
और उसे बचाने के लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। अब हमे कहां जाना होगा मित्र ?
मांतक की बात सुनकर कुंम्भन कहता है--
यहां इस जंगल के बाहर तीन गांव है इन्ही तीन गांव मे से किसी एक गांव मे मणी छुपी हूई है । तुम्हे अपना भेष बदल कर उसका पता लगाना होगा।
मांतक कहता है --
> ठीक है मित्र । अब आञा दो ।
तभी मांतक को रौकते हूए कुंम्भन कहता है --
> ठहरो मित्र । एक बात और जिसके पास भी वह
मणी होगा वह मानव श्रापित होगा।
कुम्भन की बात सुनकर मांतक हैरानी से कहता है--
> श्रापित..! परतुं क्यों मित्र ? वो मानव सौन सा श्राप भौग रहा है।
कुंम्भन कहता है--
> झील के जल के कारण मित्र । मैं उसी झील की बात कर रहा हूँ मित्र जिसमे परियां आकर स्नान करती हैं। तुम्हें तो इस बारे में ज्ञत होगा है
मांतक कहता है--
> हां मित्र ये बात तो सारे देत्यों को ज्ञात है के उस झील मे सिर्फ प्रेमी जौड़ा ही स्नान कर सकता है। अन्यथा दौनो को ही भंयकर श्राप भौगना पड़ता है।
कुंम्भन कहता है--
> हां मित्र सत्य कहां तुमने। वो मानव भी इसी का श्राप भौग रहा होगा जिस कारण उसके शरिर पर कई सारे घांव होगें । तुम्हें जहां कहीं भी ऐसे मानव दिखे तुम उसे मैरे पास यहीं लेकर आ जाना।
मांतक कहता है --
> ठीक है मित्र जैसी तुम्हारी ईच्छा । परतुं मित्र क्या कुंम्भनी को भी उस मानव ने झील पर लेकर गया था ?
कुंम्भन कहता है --
> हां मित्र । इसिलिए तो मेरी पुत्री कुम्भनी की ये दशा
है । उस दुष्ट ने मेरी पुत्री को अपने वश मे कर लिया था और उसे उसी झील के पास ले जाकर उसके साथ बल पूर्वक स्नान किया और उससे उसकी मणी छीन लिया । दौनो के आपस मे प्रेम ना होने के कारण दौनो को ही श्राप लग जाती है। मेरी पुत्री कुम्भनी इस बात को सहन ना कर सकी के देत्य लोक मे कोई उसे बूरी नजर से देखें के किसी मानव ने उसके साथ बल पूर्वक ... !
इतनी बोलकर कुंम्भन रुक जाता है और फिर कहता है--
> वो नही चाहती थी के कोई उसके बारे उसके गलत
बातें करे। इसिलिए मित्र उसने अपने प्राण त्याग दिया । कुम्भनी ने़ प्राण त्यागते समय मुझे सारी बात बतायी और अंत मे कहा ।
कुंम्भन अपनी उस पल मे चला जाता है जहां कुम्भनी अपने पिता कुंम्भन के गौद मे अपना सर रखकर आकरी सांसे ले रही थी। कुंम्भन के आंखो से आंसु बह रहे थे वो कुंभ्मनी के बालो को सहलाते जा रहा था। कुंम्भनी कुंम्भन से कहती है--
> पिताश्री मैंने कोई पाप नही किया । मैं पवित्र हूँ
पिताश्री । मैने आप पर कोई लांछन नही लगने दिया । पिताश्री उस दुष्ट ने मेरी मणी मुझसे छीन लिया और मुझे अपने वश मे करके उस झील के समीप ले कर गया मैने उसे बहुत कहा बहुत समझाया परतुं उस दुष्ट ने मेरी एक नही सुनी और मुझे उस झरने मे बल पूर्वक स्नान करा दिया ।
कुंभ्मनी रोती हूई कहती है----
> मैं क्या करती पिताश्री मैं विवश थी ।
कुम्भन रोते हूए कहता है--
> ये तुम्हें क्या हो गया पुत्री। अब मैं क्या करू तुम्हारी मणी भी मेरे पास नही है । मैं तुम्हें कुछ नही होने दुगां । पुत्री मुझे बताओ कैन था वो दुष्ट जिसके कारण तुम्हारी ये दशा हूइ । मैं अभी जाकर उससे तुम्हारी मणी लेकर आऊगां और उसका वध कर दूगां।
इतना बोलकर कुंभ्मन अपनी आंखे बंद करते कुछ मंत्र बोलने लगता है--
> कुंम्भन कई बार ऐसा करता है और फिर गुस्से से
कहता है--
> ये क्या हो रहा है । मैं तुम्हारी मणी का पता क्यो नही लगा पा रहा हूँ ।
कुंम्भन अपनी पुत्री कुम्भनी से कहता है --
> पुत्री बताओ मुझे वो कौन था।
कुंम्भनी कहती है--
> मुझे नही पता पिताश्री के वो मानव कौन था परतुं
एक भले मानव ने मुझे उस दुष्ट से मुक्त कराने की चैष्टा कीया था परतुं उस दुष्ट ने उसे भी घायल कर दिया । आप जाकर उसकी रक्षा करना पिताश्री। वो ... वो उधर मूर्छित पड़ा है । उसका नाम एकांश है। मैने उन लोगों के मुख से उसका नाम सुना था ।
कुंम्भनी नम आंखो से कहती है--
> पिताश्री देत्य लोक में कहना के भले ही मैं विवश थी परतुं उस दुष्ट ने मेरा कोई क्षती नही कर पाया और मैं बिल्कुल पवित्र हूँ।
कुम्भनी अपने दौनो हाथ जोड़कर कुंम्भन से अपनी टुटती सांसो से कहती है--
> पि..ताश्री मुझे क्ष.. क्षमा कर देना । मैं आ ..आपसे दुर ज.. जा रही हूँ। इतना बोलकर कुंभ्मनी अपने प्राण त्याग देती है।
कुंम्भनी के प्राण त्यागते ही कुंम्भन जौर से चिल्लाकर कहता है--
> पुत्री कुंम्भनी ।
कुंम्भन का आवाज चारों और गूजने लगता है। इतना बोलने के बाद कुंम्भन अपनी इस पल मे आता है जहां पर कुंम्भन मांतक और त्रिजला को बोलकर सुना रहा था। कुंम्भन की आंखे आसुओ से भींगी थी । मांतक कुम्भन के पास जा कर कहता है--.
> मित्र अब तुम चिंता मत करो मे और त्रिजला दौनो ही अपनी का प्रयोग करके उस मानव को मणी सहीत
तुम्हारे पास लेकर आऊंगा।
मांतक कुछ सौचकर कहता है--
> परतुं मित्र मुझे एक शंका है।
कुम्भन कहता है--
> कैसी शंका मित्र ।
मांतक कहता है--
> यही के वो मणी जिसके पास है वो कोई साधारण मनुष्य तो नही हो सकता उसके पास अवस्य ही कोई शक्ती है जो उसकी सहायता कर रही है। अन्यथा एक देत्य को परास्त करना किसी साधारण मनुष्य का कार्य वही हो सकता है।
मांतक की बात सुनकर त्रिजला कहती है--
> परतुं स्वामी ऐसी कौन सी शक्ती हो सकती है जो उस मानव के पास है।
मांतक कहता है--
>. हमे इसका भी पता लगाना होगा त्रिजला।
कुंभ्मन कहता है--
> ठीक कही मित्र तुमने । हमे उसे कमजोर नही
समझना चाहिए ।
मांतक कहता है--
> हां मित्र मैं इन सबका पता सिघ्र अति सिघ्र लगाकर तुम्हारे पास आऊगां।
इतना बोलकर मांतक और त्रिजला एक दुसरे की और दैखता है और जौर से हंसने लगता है। फिर दौनो ही चिड़ियां बन कर वहां से उड़कर चला जाता है।
कुंम्भन अपनी मुठ्ठी को भींच कर हंसते हूए कहत है।--
> हा हा हा हा । अब उन मानवो को लगेगा के मैं तो जंगल मे बंद हूँ और वो निश्चंत हो जाएगें । उन्हें लगेगा के मैं तो अब कुछ नही कर सकता। और इसी का लाभ मातंक और त्रिजला को मिलेगा । वो अब जल्दी ही मुझे मेरी पुत्री का मणी को वापस लाकर देंगे। हाह हा हा हा।
इधर चैतन हॉस्पिटल पहूँच जाता है जहां पर एकांश को दैखकर चेतन लंगड़ाने लगता है। चेतन लंगड़ाते हूए एकांश के पास जाता है और कहता है--
> डॉक्टर बाबु आप ही हो।
एकांश जवाब देकर कहता है--
> हां मैं ही डॉक्टर हूँ । बोलिए क्या सेवा कर सकता हूँ आपका ?
चेतन एकांश को अपना पैर दिखाते हुए कहता है--
> देखीए ना डॉक्टर बाबु मेरे पैर को क्या हो गया है।
कल मेला के भाग दौड़ मे धक्का मुक्की में मेरे पैर का ये हाल हो गया। बड़ी मुश्किल से आपके पास आया हूँ ।
चेतन बड़ी चालाकी से एकांश से झुट बोलकर हॉस्पिटल मे एडमिट हो जाता है। एकांश चेतन को एक बेड पर लिटा देता है। और उसके पैर को चैक करने लगता है। एकांश के चेतन के पैर को धिरे धिरे इधर उधर करता है । जिससे चेतन झुट मुट का चिल्लाकर कहता है--
आ..ह , डॉक्टर बाबु बहोत दर्द हो रहा है ।
एकांश चेतन से कहता है ---
> आप चितां मत करो आपके पैर को कुछ नही हुआ है पर जब आपको दर्द हो रहा है तो हो सकता है के सिर्फ हल्की मोच आई ह़ोगीं ,आप यहां आराम करो
तबतक मैं आपके लिए दवाई और बैंडेज लेकर आता हूँ , जिसे आप कल तक ठीक हो जाओगे।
इतना बोलकर एकांश वहां से चला जाता है। चेतन वहां पर उठकर बैठ जाता है। तो चेतन की नजर पास मे ही सोये निलु पर पड़ता है। निलु भी चेतन को दैखकर पहचान लेता है और मन ही मन सौचता है। ये तो अघोर बाबा शिष्य चेतन है पर ये यहां क्या कर रहा है। निलु ये सब सौच ही रहा था के चेतन भी निलु को दैखकर सौचने लगता है। ये मंद बुद्धी यहां क्या कर रहा है। कहीं इसने सबके सामने मेरा नाम लेकर पुकार दिया तो सबकी नजर मेरे पे होगी । चेतन बहुत घबरा जाता है के कहीं निलु सबके सामने उसका नाम लेकर ना पुकारे। चेतन इतना सौच ही रहा था के निलु चेतन का नाम लेकर पुकारता है--
> अरे चेतन जी आप यहां कैसै सब ठीक तो है और बाबा जी कैसै है ?
निलु के इतना कहने पर चैतन गुस्से से निलु को चुप रहने का इशारा करता है और धिरे से कहता है---
> चुप रहो मूर्ख अगर एक भी शब्द और बोला तो मुझसे बूरा कोई नही होगा।
चेतन के डर से निलु चुप हो जाता है एकांश ये सब दैख लेता है और सौचने लगता है--
> ये सब चल क्या रहा है । अब ये चेतन कौन है। मुझे तो पहले ही इस पर शक हो गया था जब ये झुट मुट का दर्द का बहाना कर रहा था।
इतना सौचकर एकांश अनजान बनकर चेतन को पट्टी बांध कर वहां से चला जाता है और आलोक को ढुंढने लगता है। तभी वहां पर दवाईयां लेकर गुणा और चतुर भी आ जाता है। दौनो दवाईओं को अंदर रख कर आता है और गुणा कहता है--
> एकांश इनमे वो सारी दवाईयां है जो तुंने लिख कर दिया था।
एकांश गुणा और चतूर से कहता है--
थैंक्स यार तुम दौनो ने मेरी बहुत हेल्प की । अगर आज ये दवाईयां नही आती तो बहोत प्रब्लाम हो जाती ।
चतुर एकांश से कहता है--
> दैख यार दोस्ती में नो थैंक्स । वैसे भी हमारे पास ही नही हा कुछ करने को इसिलिए इसे कर लिया।
To be continue.....831