भाग – 13 last part
लेकिन समाज
अब भी बाहर खड़ा था।
माँ ने पूछा—
“फैसला कर लिया?”
सृष्टि ने जवाब दिया—
“हाँ। मां जी पर में तारीख बाद
में डिसाइड करुंगी।
माँ समझ गईं थी।
यह शादी
दबाव में नहीं होगी
बल्कि दोनों की मर्जी से होगी ।
सारे शहर में
खबर फैल गई कि—
“वही विधवा औरत …
अब शादी कर रही है।”
लेकिन इस बार
उस खबर में शोर और जहर नहीं था।
इस बार खबर में साकारात्मक बतावरण था।
क्योंकि कहानी
अब सृष्टि और अंकित के हाथ में थी।
फिर भी
एक सवाल
अब भी अधूरा था—
क्या दोनों की शादी
इस कहानी का अंत होगी…
या
एक नई शुरुआत?
क्योंकि असली इम्तिहान
रिश्ता बनने के बाद
शुरू होता है।
शादी की तारीख़ तय नहीं हुई थी।
और यही बात
सबसे ज़्यादा लोगों को परेशान कर रही थी।
लोगो के बीच में
तरह तरह की बातें चल रही थी।
“शादी है या नहीं?”
“अगर है तो कब है ?”
“ऐसे कैसे?”
लेकिन सृष्टि और अंकित
इन सवालों से
अब डरते नहीं थे।
अब दोनों सवालों के डट कर
जवाब देते थे ।
क्योंकि पहली बार
उन दोनों ने अपनी ज़िंदगी
खुद की गति से चलाने का
फैसला किया था।
शादी की तैयारी शुरू हो चुकी थी।
पर किसी धूमधाम से नहीं थी।
न बड़े बैनर,
न लंबी मेहमान सूची,
न ही टेंट और न ही बैंड बाजे।
साधारण सिंपल ।
सृष्टि ने साफ़ कहा—
“मैं कोई तमाशा नहीं चाहती।
मैं बस एक दिन चाहती हूँ
जो मुझे याद रहे,
क्योंकि लोगों का काम है कहना
क्योंकि उनको कभी भी कोई कम ,
अच्छा नहीं लगेगा ।
अंकित ने बस इतना कहा—
“और मैं एक रिश्ता चाहता हूँ
जो बराबरी से शुरू हो।”
मंदिर में
बहुत कम लोग थे—
माँ,
दो-चार करीबी,
और महिला संगठन की वे औरतें
जिन्होंने सृष्टि का हाथ
काम के दिनों में थामा था।
सृष्टि ने
लाल जोड़ा नहीं पहना।
उसने
सादा हल्का रंग चुना—
जैसे कहना चाहती हो
कि यह विवाह
नएपन का है,
रीति का नहीं।
फेरे शुरू हुए।
पहले फेरे में
पंडित ने कहा—
“साथ निभाने का वचन।”
सृष्टि ने मन ही मन सोचा—
साथ, लेकिन बंधन नहीं।
दूसरे फेरे में—
“सम्मान।”
अंकित ने
उसकी तरफ़ देखा—
यह वचन
वह हर दिन निभाना चाहता था।
तीसरे फेरे में—
“विश्वास।”
सृष्टि की आँखों में
पिछले सालों का डर
अब नहीं था।
सिर्फ़ स्पष्टता थी।
सातवें फेरे से पहले
सृष्टि ने पंडित से कहा—
“एक वचन और जोड़िए।”
सब चौंक गए।
सृष्टि ने साफ़ कहा,
“यह रिश्ता
अगर कभी
मेरी पहचान छीनने लगे,”
“तो मुझे
रुकने का हक़ होगा।”
अंकित ने
उसी पल कहा—
“और मुझे
उस रुकावट को
समझने का फ़र्ज़।”
पंडित ने
एक पल रुककर
मंत्र पढ़ा।
शायद पहली बार
किसी विवाह में
मंत्र से ज़्यादा
अर्थ बोला गया था।
शादी हो गई।
लेकिन असली परीक्षा
उसके बाद शुरू हुई।
लोगों ने बातें कीं—
“ज्यादा आज़ाद है।”
“देखते हैं कब तक चलेगा।”
सृष्टि ने सुना।
और मुस्कुरा दी।
अब वह जानती थी—
हर रिश्ते का भविष्य
लोग तय नहीं करते,
रहने वाले करते हैं।
कुछ महीनों बाद
सृष्टि का काम
एक छोटे केंद्र में बदल गया।
वह अब
दूसरी औरतों को
काम सिखाने लगी थी।
अंकित
अब भी बाहर काम करता था,
लेकिन हर लौटने पर
वह घर आता था—
जहाँ कोई डर नहीं था।
एक शाम
सृष्टि ने उससे पूछा—
“अगर मैं कभी
इस रिश्ते को छोड़ना चाहूँ
तो?”
अंकित ने बिना सोचे कहा—
“तो मैं दुखी होऊँगा,
लेकिन रोकूँगा नहीं।”
सृष्टि की आँखें भर आईं।
उसने कहा,
“शायद,”
“यही प्यार है।”
यह कहानी
यहाँ खत्म नहीं होती।
क्योंकि यह कोई
परियों की कथा नहीं थी।
यह कहानी
उन तमाम औरतों की थी
जो विधवा कहलाकर
खामोश कर दी जाती हैं।
और उन मर्दों की भी,
जो साथ खड़े होना
चुनते हैं—
मालिक बनना नहीं।
अगर कोई पूछे—
“क्या सृष्टि और अंकित
हमेशा खुश रहे?”
तो जवाब होगा—
“वे हमेशा ईमानदार रहे।”
और कभी-कभी,
ईमानदारी ही
सबसे बड़ी खुशी होती है।
— समाप्त —
अगर आपको यह स्टोरी पसंद आई हो तो
मुझे dm में अपनी राह बताए और ,
next स्टोरी किस टॉपिक पर होनी चाहिए बताइए ।
BY...................Vikram kori..