Radhey….. Love's Ring Tale – 15 in Hindi Love Stories by Soni shakya books and stories PDF | राधे ..... प्रेम की अंगुठी दास्तां - 15

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राधे ..... प्रेम की अंगुठी दास्तां - 15

राधा अपने आप से ऐसे बात कर रही थी जैसे देव सामने बैठकर उत्तर दे रहा हो ।

राधा को यु चुपचाप बैठा देखकर माया देवी बोली-क्या हुआ राधा अच्छा नहीं लग रहा है क्या यहां तो चलो बेटा घर चलते हैं शाम भी होने वाली है।

एक बार फिर मां की आवाज ने राधा का ख्याल तोड़ दिया। बेंच से उठाते हुए राधा बोली- ठीक है मां चलो अब घर चलते है।

.......        .........        .......

अगले दिन..

चांदनी रात थी.. राधा छत पर पलंग पर पड़े- पड़े चांद को निहार रही थी । वो अक्सर चांद से घंटो बातें किया करती थी।

पूर्णिमा की  वो रात.... उसके ख्यालों में किसी फिल्म की तरह चलने लगती थी।

वो चांद से ऐसे बातें करती थी जैसे चांद नहीं.. देव बैठा हो सामने बस -खो जाती थी उसी मे..

इतने ध्यान से क्या देख रही हो राधे __देव की आवाज में राधा को फिर चौंका दिया ।

देव तुम ..!

तुम कब आए ?

तब- जब तुम चांद से मेरी शिकायत कर रही थी और वो भी इतन तल्लीनता से कि मेरे आने का पता ही नहीं चला तुम्हें।

कुछ भी मत कहो मैं तुम्हारी शिकायत क्यों करूंगी भला।

तो फिर क्या बातें कर रही थी चांद से मेरे बारे में 

कुछ भी तो नहीं मैं तो सिर्फ चांद को निहार रही थी और फिर मैं तुम्हारे बारे में क्यों बातें करूंगी और कुछ काम नहीं है क्या मुझे जो सिर्फ तुम्हारे बारे में ही सोचुं।

तुम बिल्कुल भी नहीं बदली ना राधे !!

आज भी वैसी ही हो गुस्सा तो जैसे तुम्हारी नाक पर ही रखा रहता है।

अच्छा तो फिर क्यों आए हो मुझसे बात करने।

तुमसे बात किए बिना तो मेरा दिन ही पूरा नहीं होता राधे..

रहने भी दो अगर इतनी ही तड़प होती तो इतने दिनों बाद नहीं आते !

क्या तुम्हें सचमुच लगता है कि मैं इतने दिनों बाद मिला हूं तुमसे

नहीं पर..

पर, क्या राधे .. मैं तो कभी तुमसे दूर हुआ ही नहीं तुम्हें विश्वास नहीं है क्या ।

"राधा मौन थी "

और देव भी चुपचाप बस उसे निहार रहा था।

......      ........       .......      ......

राधा ओ राधा.. माया देवी आवाज लगा रही थी पर राधा को‌ सुनाई नहीं दिया क्योंकि वो तो अपनी ही दुनिया में खोई थी।

फिर मायादेवी छत पर आती है वो कुछ कहती इससे पहले ही राधा को यूं देखकर उनकी आंखों में आसूं आ गये ।

राधा ...

पलंग पर पड़ी चांद को निहार रही थीं। अब उसका शरीर‌ भी जैसे धीरे-धीरे क्षीण हो रहा हो।

बाल भी झड़ गए थे।

चेहरे पर मुस्कान की जगह उदासी ने ले ली थी।

पथराई सी आंखें जैसे उन्हें हमेशा किसी का इंतज़ार हो..

जो कभी बातें करते थकती ना थी आज उसने चुप्पी ओढ़ ली थी।

जो जितना पूछता उतना ही जवाब देती बस ..

अब उसने तन्हाइयों से दोस्ती कर ली थी।

मां से अपनी बेटी की हालत देखी नहीं जाती थी पर वह क्या कर सकती थी बेबस थी अब वह भी ।

मायादेवी के मन में एक विचार आया उसने तुरंत ही अपने आपको संभाल और राधा से बोली --चलो राधा बहुत समय हो गया अब खाना खा लो ।

तुम्हें दवाई भी तो खानी है ‌,फिर आराम करना।

नहीं मां मेरा मन नहीं है खाना खाने का और फिर मैं दिन भर आराम ही तो करती हूं।

थोड़ा-सा खा लो राधा यु खाली पेट दवाई खाना ठीक नहीं रहता ।

पर मां.. मेरा मन नहीं है।

अब और कुछ मत कहो बस चलो नीचे और खाना खा लो।

.....      ......      .....

मोबाइल की घंटी बज रही थी पर कोई जवाब नहीं दे रहा था तो घंटी बंद हो गई ।

फिर दुबारा से घंटी बजी दूसरी तरफ से आवाज आई --हेलो

देव से बात करनी है..

आप कौन बोल रहे हो.. शायद देव के बेटे की आवाज थी।

मैं माया देवी.. देव से बात करनी है!

ठीक है आंटी मे अभी बुलाकर लाता हूं पापा को।

देव ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था ।

पापा आपके लिए कॉल है 

अच्छा...कौन है ??

वो अपना नाम मायादेवी बता रही है।

देव को लगा जैसे एक पल के लिए सब रूक‌ गया हो इतने सालों बाद...

इतनी सुबह अचानक से यू आंटी का फोन आना देव के मन मे संदेह की दीवार खड़ी हो गई।

देव ने तुरंत अपने आप को संभाला और रिटर्न में कॉल किया.. नमस्ते आंटी जी🙏 आप कैसे हो?

मैं ठीक हूं देव ,तुम कैसे हो और तुम्हारी फैमिली 

यहां सब कुछ ठीक है आंटी जी 

आप बताइए कैसे याद किया। 

क्या मैं यूं ही कॉल नहीं कर सकती देव?

अरे क्यों नहीं आंटी जी वो तो काफी समय बाद आपका कॉल आया इसलिए पूछ लिया।

देव, क्या तुम मुझसे मिलने आ सकते हो ?

क्यों नहीं आंटी जी आप बताइए कब आना है। 

कल ही आ जाओ। 

क्या हुआ आंटी जी सब कुछ ठीक है ना। 

हां, सब ठीक है बस तुम आ जाओ। 

ठीक है आंटी बताता हूं ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ेगी।

ठीक है देव जल्दी आ जाना और हां आने से पहले बता देना कि कब आ रहे हो ।

ठीक है आंटी मैं आपको कॉल करके शाम को बताता हूं।

  ...... .....  ....     ......

ऑफिस में 

क्या हुआ देव सर क्या आप परेशान हो?

अरे नहीं ऐसा कुछ नहीं है वो बस थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही है सोच रहा हूं एक-दो दिन की छुट्टी लेकर आराम कर लूं।

जरूर लीजिए  सर वैसे भी आप कहां छुट्टी लेते हो ।

हां बॉस को आने दो फिर छुट्टी के लिए अप्लाई करता हुं।

अभी देव को सवालों ने घेर रखा था,

क्या हुआ होगा आंटी ने क्यों मुझे मिलने को बुलाया वह भी इतने सालों बाद। 

क्या राधा को.. नहीं नहीं राधा को कुछ नहीं हो सकता। वह तो अपने ससुराल में खुश है अभी तो  मिला था मैं उससे।

अभी...अभी कब देव

देव को लगा जैसे राधा ने प्रश्न पूछ लिया हो ।

8 साल.. जिम्मेदारियां निभाते-निभाते पता ही नहीं चला कब बीत गये 8 साल और आज भी कहां कुछ पुरी तरह कर पाया हूं सब अधुरा ही तो पड़ा है....

और मैं.. मैं कहां हूं देव ?

तुम तो मेरे मन में हो राधे ..

छोड़ो भी देव  अब ये झुठी दिलासा देना ।

तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं होता ना राधे ?

मैं तो तुम्हारी तरफ से इसलिए बेफिक्र रहता हूं कि तुम अपनी ससुराल में खुश हो । और मैं तुम्हें  डिस्टर्ब नहीं करना चाहता बस..यही बात है तभी..