🧡 भाग – 2
उस रात अंकित देर तक सो नहीं पाया।
कमरे की बत्ती बंद थी, लेकिन दिमाग़ में सवालों की रोशनी जलती रही।
“कल मत आना…”
सृष्टि के ये शब्द बार-बार उसके कानों में गूंज रहे थे।
वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या ज़्यादा चुभा—उसका मना करना,
या उसके शब्दों में छुपा हुआ डर।
सुबह होते ही अंकित रोज़ की तरह तैयार हुआ। माँ की तस्वीर को प्रणाम किया और दफ़्तर के लिए निकल पड़ा।
लेकिन आज उसके कदम अपने आप मंदिर की तरफ मुड़ गए।
वह दूर खड़ा रहा।
सृष्टि अभी नहीं आई थी।
अंकित ने राहत की साँस भी ली और हल्की सी मायूसी भी महसूस की।
उसे खुद पर हैरानी हो रही थी—वह किसी अजनबी औरत की मौजूदगी या गैर-मौजूदगी से इतना क्यों प्रभावित हो रहा था?
कुछ देर बाद सृष्टि आई।
आज उसका चेहरा और ज़्यादा थका हुआ लग रहा था। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे, चाल में कमजोरी।
फिर भी वह रोज़ की तरह फूल सजाने लगी।
अंकित आगे नहीं बढ़ा।
उसने याद रखा—“कल मत आना।”
लेकिन वह जा भी नहीं पाया।
सृष्टि ने उसे दूर से देख लिया।
उसका हाथ एक पल के लिए रुक गया।
वह समझ गई—यह आदमी बात समझने वालों में से नहीं है, लेकिन ज़िद्दी ज़रूर है।
“आप क्यों खड़े हैं?”
उसने खुद ही चुप्पी तोड़ी, बिना आँखें उठाए।
अंकित ने धीरे से कहा,
“फूल लेने नहीं आया…
बस यह पूछने कि… क्या सब ठीक है?”
सृष्टि ने मुस्कुराते हुए कहा —
“सब ठीक ही तो है,”
“जैसा होना चाहिए।”
अंकित कुछ नहीं बोला।
वह जानता था—कुछ ‘ठीक’ ऐसे होते हैं, जिनमें बहुत बड़ा राज छुपा होता है।
थोड़ी देर बाद वह बोला,
“अगर बुरा न मानें…
तो एक बात पूछूँ?”
सृष्टि ने सिर हिला दिया।
“आप लोगों से इतना डरती क्यों हैं?”
यह सवाल अचानक था।
सृष्टि की धड़कने तेज हो गई ।
उसने अपने मन को रिलेक्स किया।
जैसे किसी बंद दरवाज़े को खोलने से पहले आदमी हिम्मत जुटाता है।
“क्योंकि लोग सवाल नहीं पूछते,”
वह बोली,
“फ़ैसले सुनाते हैं।”
अंकित चुप हो गया।
सृष्टि बोलती रही—धीरे,धीरे।
“विधवा औरत को यहाँ इंसान नहीं समझा जाता।
वह या तो बोझ होती है…
या बदनामी।”
उसके शब्दों में न ग़ुस्सा था, न शिकायत—
बस थकान थी।
उसने कहा
“पति चला गया,”
“तो लगा जैसे ज़िंदगी भी उसी के साथ चली गई।
माँ-बाप पहले ही नहीं थे।
ससुराल वालों ने कहा—अब तुम हमारी ज़िम्मेदारी नहीं।”
अंकित का दिल भारी हो गया।
उसने धीरे से पूछा।
तो क्या
“आप अकेली हैं?”
सृष्टि ने सिर हिलाया।
“बहुत।”
उस एक शब्द में सालों का दर्द समाया हुआ था।
उस दिन के बाद अंकित रोज़ दूर से ही उसे देखने लगा।
न ज़्यादा बात, न ज़्यादा पास जाना।
बस इतना कि सृष्टि को यह एहसास रहे—कोई है, जो उसे सिर्फ़ देख नहीं रहा, समझ भी रहा है।
और सृष्टि…
वह भी बदल रही थी।
अब उसे अंकित की मौजूदगी से डर नहीं लगता था।
डर उसे समाज से था—उन आँखों से, जो हर बात को गलत मतलब दे देती हैं।
एक दिन अचानक बारिश आ गई।
सृष्टि फूल समेटने की कोशिश कर रही थी, लेकिन तेज़ बारिश में सब भीग गया।
अंकित बिना सोचे समझे आगे बढ़ा।
और बोला
“इन्हें अंदर रख लीजिए,”
उसने अपना छाता आगे किया।
सृष्टि झिझकी।
“लोग देखेंगे,”
उसने कहा।
अंकित पहली बार थोड़ा सख़्त हुआ।
“आज नहीं तो कल देखेंगे ही।
लेकिन आज अगर आप बीमार पड़ गईं…
तो देखने वाला कोई नहीं होगा।”
सृष्टि ने पहली बार उसकी आँखों में भरोसा देखा।
वह छाते के नीचे आ गई।
बस कुछ कदमों की दूरी थी,
लेकिन सृष्टि के लिए यह दूरी समाज की हदों को पार करने जैसी थी।
बारिश के शोर में अंकित की आवाज़ आई—
“मैं कोई वादा नहीं कर सकता…
लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि
आप अब बिल्कुल अकेली नहीं हैं।”
सृष्टि की आँखें भर आईं।
उसने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कुछ बातें कहने से नहीं,
महसूस करने से समझ में आती हैं।
उस रात, सृष्टि ने बहुत समय बाद सुकून की नींद ली।
और अंकित ने पहली बार सोचा—
शायद ज़िंदगी सिर्फ़ ज़िम्मेदारी निभाने का नाम नहीं…
किसी का सहारा बनना भी ज़िम्मेदारी ही है।
To Be continue..............
भाग–3 में कहानी एक नए मोड़ पर जाएगी, जहाँ
अंकित का यह “सहारा”
समाज की नज़रों में भला बुरा बनेगा ।
इस भाग में सामने आएगा—
सृष्टि पर उठने वाले पहले सवाल
अंकित के परिवार की ज़िम्मेदारियाँ या उसका दिल
वह फैसला, जो तय करेगा
क्या यह रिश्ता चुपचाप सहारा बना रहेगा
या खुलकर संघर्ष करेगा?
जानने के लिए बने रहिए हमारे साथ ।
By.............Vikram kori ......