हनुमंत पच्चीसी और अन्य छंद 6
'हनुमत हुंकार' संग्रहनीय पुस्तक
प्रस्तुत 'हनुमत हुंकार' पुस्तक में हनुमान जी के स्तुति गान और आवाहन से सम्बंधित लगभग 282 वर्ष पहले मान कवि द्वारा लिखे गए 25 छंद हैं , जिनके अलावा उन्ही मान कवि के छह छंद ' हनुमान पंचक' के नाम से शामिल किए हैं, तथा 'हनुमान नख शिख' के नाम से 11 छंद लिए गए हैं।
खड्ग त्रिशूल हल खटबांग खेट कर, पास अनुकूल मूलधारी मुगदर कौ।
भिन्द पाल बलित कमंडल कलित, गिरि मण्डल दलित दल घोर निशाचर कौ।
भने कवि 'मान' ज्ञान मुद्रा सौं विराजमान, आभरण बान प्रेत सेना वै निधर कौ।
दस भुजदण्ड दस आयुध उदण्ड, पञ्च बदन प्रचण्ड, बन्दों वृत रघुवर कौ ॥२१॥
अर्थ :- मान कवि कहते हैं कि मैं रघुवीर के दूत हनुमानजी की बन्दना करता हूँ, जिनके पाँच प्रचण्ड सुख और दस भुजदण्ड है, जिनमें दस उदण्ड (प्रचण्ड) आयुश्च (हथियार) हैं। उनके हथियारों में खड्ग, त्रिशूल, हल, खट्वांग ब और खेट (ढाल) नामक अस्त्र है। वे पाश (फन्दा) और अनुकूल (सहायक) मूलधारी (अच्छी जड़ वाले) मुगदर को लिए हैं। वे भिन्दिपाल अस्त्र से बलशाली है, सुन्दर कमंडलु लेने वाले हैं, और पर्वत समूह से राक्षसों के भयंकर दल को रौंद डालने वाले हैँ। वे ज्ञानी की मुद्रा से विराजमान हैं, और प्रेतों की सेना का तिरस्कार करने के लिये बाण उनका आभूषण है।
भुकुटी कुटिल मुख डाढ़ विकराल अति, उम्र सम काल तेज कोटि प्रभाकर कौ।
भीषम शरीर भय नाशन गहीर, हरै दासन की पीर, विषहारी विषधर कौ ॥
भने कवि 'मान' हनुमान बलवान, दिव्य माला गन्धवान पीरे पट की फहर कौ।
पिंगल त्रिपञ्च नैनधारी रणधीर, पञ्च-मुखी महावीर, बन्दौं दूत रघुबर कौ ॥ २२॥
अर्थ :- मान कवि रघुनाथजी के दूत हनुमानजी की वन्दना करते हैं-जिनके नेत्र पिंगल (भूरापन लिये हुए लाल) हैं, और जो शंकर के अवतार के नाते संख्या में पन्द्रह हैं। रण में धैर्यवान पाँच मुख वाले महावीर (अत्यन्त शौर्यवान) है। उनकी भुकुटी (भौंह ) (वक्र या बाँकी) कुटिल है; मुख और डाढ़ विकराल (भयानक) है। वे काल के समान अत्यन्त उग्र हैं, और उनका तेज करोड़ों सूर्य के समान है। उनका शरीर भीष्म (शिव-जैसे ) भय को नष्ट करने वाला गहीर (गम्भीर) है, और दासों (भक्तों) की पीड़ा तथा सपों के विष को हर लेने वाला है। ये हनुमानजी अत्यन्त बलवान हैं दिव्य सुगंधित माला धारण करने वाले वायु-पुत्र के पीले पट (वस्त्र) की फहरान मोहक और वन्दनीय है।
नाको नैक पल्लव समान जिहि पारावार, है न पारावार जाके बल के उकर कौ।
कालनेमि मारौ अहिरावण संघारौ, जाने मेद फारौ रावण कुमार के उदर कौ ॥
भने कवि 'मान' जाने लखन उबार दयौ, गार दयो गरव दशानन के वर कौ।
मङ्गल करन, अशरण को शरण, जन-संकट हरण, बन्दों दूत रघुवर कौ ॥२३॥
अर्थ :- मान कवि कहते हैं कि मैं भगवान रामचन्द्रजी के दूत की वन्दना करता हूँ, जो कल्याण के करने वाले हैं, अशरण के लिए शरण है और भक्तों का संकट हरने वाले है। उन्होंने समुद्र को पत्ता जैसा मानते हुए लाँघा । उनके वज्र के उकर (भेद या गुणों के प्रकाश) का पारावार (वार-पार या सीमा) नहीं है। उन्होंने कालनेमि को मारा, अहिरावण का संहार किया, और रावण के बेटे के उदर को फाड़कर चरबी बाहर निकाल दी। उन्होंने ' लक्ष्मण का उद्धार किया अर्थात् उनके प्राणों की रक्षा की, और रावण द्वारा प्राप्त किये गये वर के गर्व को गला डाला ।
कपि साहसीक सुभट शिरोमणि उदार, कपिकेशरी कुमार ऍड़दार ऊँचे कर कौ।
महा बलधाम हेमगिरि अभिराम, करै पूरे मन काम, बिसराम सुर नर कौ ॥
भने कवि 'मान' सर्व गुण कौ निधान, अरि कानन कृशानु, ज्ञानवान चराचर कौ।
लायक लजीलो रघुनायक कौ पायक, सहायक सपूत, बन्दौँ दूत रघुबर कौ ॥२४॥
अर्थ :- मान कवि कहते हैं कि हतनुमानजी साहसी योद्धाओं में शिरोमणि और उदार हैं। वे कपि केशरी के पुत्र है, और वे ऊँचे हाथों वाले है अर्थात उदारतापूर्वक वैभव लुटाने वाले या वरदानों का दान करने वाले हैं। वे बल के परम धाम है, वे हेमगिरि (सोने के पर्वत) के समान अभिराम (सुन्दर) देह वाले है। मन की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, और देवताओं तथा नरों के विश्राम स्थान है, अर्थात् देवता और नर उनकी शरण में पहुँच कर आराम पाते हैँ। वे सारे गुणों के भण्डार है, शत्रु रूपी वन के लिए अग्नि के समान हैं, तथा जड़ और चेतन प्राणियों में सच्चे ज्ञानवान है। वे रामचन्द्रजी के योग्य और विनम्र पायक है तथा सहायक सुपुत्र है। ऐसे रघुनाथजी के दूत की मैं वन्दना करता हूँ।
दुष्टन को दीह दल मेवा लौं मुराय लेव, पाय लेव पापर लौं पाली प्रबलन की।
चाट लेव मधु लौं मदान्धन कौ मद, उतपाट लेव मूलक लौं मूल चुगलन की ॥।
भने कवि 'मान' पञ्चमुखी हनुमान, चाँप चौख लेव ऊखन लौं छुद्रता छलिन की।
चौरइ लौं चीकने चवायन चचाय लेव, खाय लेव खोपरा लौं खोपड़ी खलन की ॥२५॥
अर्थ :- हे हनुमानजी, दुष्टों के दीर्घ दल को आप मेवा के समान दाँतों से बारीक पीस डालें, प्रबलों (शक्तिशाली पुरुषों) की पंक्तियों का पापड़ के समान भोजन करें, घमण्डी पुरुषों के मद को मधु (शहद) के समान चाट लें, तथा चुगलखोरों की जड़ को मूली की भाँति उखाड़ फेंकें ।
मान कवि कहते हैं कि हेमपंचमुखी हनुमानजी, आप बल पूर्वक दवाव से बुलियों (ठगियों) की नीचता को ईख के समान चूस लो। चौरई (चौलाई के साग) के समान चिकने (खुशामदी) चवाइयों (निन्दकों) को चबा लो, और दुष्टों की खोपड़ी को नारियल के समान खा डालो।