हनुमंत पच्चीसी और अन्य छंद 5
'हनुमत हुंकार' संग्रहनीय पुस्तक
प्रस्तुत 'हनुमत हुंकार' पुस्तक में हनुमान जी के स्तुति गान और आवाहन से सम्बंधित लगभग 282 वर्ष पहले मान कवि द्वारा लिखे गए 25 छंद हैं , जिनके अलावा उन्ही मान कवि के छह छंद ' हनुमान पंचक' के नाम से शामिल किए हैं, तथा 'हनुमान नख शिख' के नाम से 11 छंद लिए गए हैं।
बैरिन कौं बार बार छली कर छार-छार, मार मार मूढ़ जार जार दे ज्वरन कौं।
भनै कवि 'मान' हनुमान बलवान, हाँक हन हन हुड़े खन खन बिमुखन कौं ॥
भेदिन कौं भिन्द भिन्द छुद्रन कों छिन्द छिन्द, रुन्ध रुन्ध वाक्य बन्ध बन्ध अरिगन कौं।
दक्ष दक्ष दुष्ट ग्रह तक्ष तक्ष प्रेतन कौं, भक्ष भक्ष भूतन को रक्ष रक्ष जन कौं ॥१५॥
अर्थः- हे हनुमानजी, बैरियों को जला डालो, ठगों को भस्म कर दो,दुष्टों को मार डालो, तथा ज्वरों (संतापों) को जला रखो। मान कवि कहते है कि हे बलवान हनुमान, अपनी हाँक से हूड़ों (उजड्ड और हठी लोगों) को मार डालो और शत्रुओं की जड़ें खोद दो अथवा उनके टुकड़े कर डालो। भेदियों के भेद (रहस्य) को खोल दो, नीचों का छेदन (ध्वंस या नाश) करो, तथा शत्रुओं के समूह को बन्धन में डाल कर उनके वाक्यों को रुद्ध कर दो अर्थात् रोक लो । दुष्ट ग्रहों के लिये आप अनुकूल बनें, घेतों को डस ले, भूतों का भक्षण करें, और भक्तों की रक्षा करें ।
अन्धन करैया, सौं उदधि उलंघन कर-कंजन सौं कवल करैय्या दिनकर कौ।
उखरैय्या बिपिन गरैय्या अरि गरब, जरैय्या उजरैय्या दशकन्धर नगर कौ ॥
भनै कवि 'मान' सीता शोक कौ नसैय्या, राम निकट बसैय्या दरसैय्या दिव्य वर कौ।
सेल तैं विभीषण कौ जीव उबरैय्या, अक्ष प्राण कौ हरय्या, बन्दों दूत रघुबर कौ ॥१६॥
अर्थः- मान कवि कहते हैं कि अन्धों को भी समुद्र पार करने की सामर्थ्य देने वाले, कर-कमलों से सूर्य को एक कौर में निगलने वाले, जंगल को उखाड़ देने वाले, शत्रु के गर्व को गलाने वाले, रावण के नगर को जला देने और उजाड़ देने वाले, सीताजी के शोक को नष्ट करने बाले, रामजी के निकट बसने वाले, दिव्य वरदान को दर्शाने वाले अर्थात् प्रदान करने वाले अपने भाले से विभीषण के शत्रुओं का विनाश करते हुए उसकी प्राण-रक्षा करने वाले, अक्षकुमार के प्राण को हर लेने वाले रघुवीर के दूत हनुमान की में वन्दना करता हूं।
नख चट चटत सु अस्त्रन अटत, अरि गात उर फटत झटत करि कर कौ।
दन्त कट कटत विलोक भट कटत,
अभङ्ग जङ्ग हटत निशाचर निकर कौ ॥
भनै कवि 'मान' प्रले रुद्र तें अमान, क्रुद्धमान रुद्धमान कालनेमि की अकर कौ।
जाकी करतूत लखें होत है अकूत, ऐसौ समर सपूत, बन्दों दूत रघुबर को ॥१७॥
अर्थ :- मान कवि कहते हैं कि मैं उन हनुमानजी की वन्दना करता हैं, जो रघुवर के दूत है और समर (युद्ध भूमि) में सपूत (बहादुर) हैं, जिनके नख चट चटाने से और अस्त्रों (हथियारों) के घुमाने फिराने से शत्रु का शरीर और हृदय फट जाता है, और जो हाथी की सूंड़ को झटक देते हैं। उनके दाँतों के कटकटाने को देख कर योद्धा कट जाते हैं, और अखंड युद्ध से निशाचरों का निकर (समूह) हट जाता है। वे प्रलय करने वाले रुद्र से भी अपार (अधिक) क्रोध करने वाले हैं और कालनेमि की अकड़ (हेकड़ी) को मिटाने या रोकने वाले हैं । उनकी करतूत देख कर अकूत (अपरिमित) को भी देखा या पाया जा सकता है।
गद्ध नभ उद्धत निरुद्धत मसान, अब्ध उद्धरण, नद्धिर बेताल पिये धर कौ।
क्रुद्ध शुद्ध बुद्धि वृद्धि दुर्द्धर बिरूद्ध प्रेत, योगनीन उद्ध वंशन दिव्या, है वर कौ ॥
उद्धत कर्मद्ध कुद्ध नद्ध तन भूत वृद्धि, मेदि वृद्धि युद्ध मध्य वृद्धि छीन्है पर कौ।
जाके युद्ध मध्य वृषभध्वज प्रसिद्ध, क्षुद्र बुद्धि तत्र शुद्ध, बन्दों दूत रघुबर को ॥१८॥
अर्थ- मान कवि कहते हैँ जिनका प्रचण्ड गर्जन आकाश को कम्पित कर देता है और पिशाचों को रोक देता है, जो अन्धि (समुद्र) का उद्धार करने वाले हैं, जो धड़ (मस्तक विहीन मानव शरीर) को चूसने वाले बेताल की गति को निरुद्ध करते है, जो शुद्ध बुद्धि से दुर्धर्ष रूप धारण कर प्रेतों की वृद्धि को रोक देते हैं, जो ऊर्ध्व गति वाली योगिनियों को वश में करने वाले और वरदाता हैं, जो युद्ध में प्रचण्ड पाश धारण करते हैं, जो भूतों की वृद्धि का क्षय करते हैं, जो रणक्षेत्र में संहार द्वारा मेद (चर्बी ) की वृद्धि करते हैं तथा विपक्षी की वृद्धि का क्षय करते हैं, शुद्ध बुद्धि से मैं अल्पज्ञ रण में वृषभान शिव के समान प्रसिद्ध रघुवर दूत हनुमानजी की वन्दना करता है।
जुद्ध हू हू पारन उपारन विपिन, लङ्क जारन उबारन विभीषण के घर कौ।
अक्ष मार पञ्च सेनापति कौ संघारन,उतारन उभर इन्द्रजीत की अकर कौ ॥
भनै कवि 'मान' राम रामानुज कारण, उपारन समूल कूल द्रौण धराधर कौ।
अरि दल गञ्जन, गनीम मुख भञ्जन, प्रभञ्जन को पूत, बन्दों वृत रघुबर कौ ॥१९॥
अर्थ :- मान कवि कहते हैं कि हनुमानजी युद्ध में हाहाकार मचा देते है। वे जंगल को उखाड़ डालते हैं। उन्होंने लंका जलाई, पर विभीषण के घर को बचा दिया। अक्षकुमार को मार कर उन्होंने पाँच सेनापतियों का संहार किया और इन्द्रजित मेघनाद की अकड़ (हेकड़ी) के उभार को उतार दिया अर्थात् जोश को ठण्डा कर दिया। वे कहते हैं- राम और रामानुज (लक्ष्मण) के कारण हनुमानजी ने द्रोण पर्वत को जड़ से उखाड़ डाला । मैं राम जी के दूत हनुमान की वन्दना करता हूँ, जो शत्रुओं के समूह को नष्ट करने वाले, और बैरियों के मुँह को तोड़ने वाले पवन पुत्र हैं।
पूरव बिकट मुख मर्कट को उदभट , दक्षिण नृसिह तेज उग्र भराभर कौ।
दीन पक्ष रक्ष पक्षराज तुण्ड पश्चिम कौ, उत्तर बाराह अबगाहक समर कौ।
भने कवि "मान" उर्द्ध उर्धर तुरङ्ग रङ्ग जीत जङ्ग भङ्ग करें दानव निकर कौ।
युद्ध अवधूत शम्भु रूप मजबूत, पञ्च बदन सपूत, बन्दों दूत रघुबर कौ ॥२०॥
अर्थ :- मान कवि रघुवर के दूत हनुमानजी की वन्दना करते हैं, जो युद्ध ने अवधूत योगी जैसे तन्मय है, जिनका रूप शम्भु (शंकर) जैसा सुदृढ है और जो पाँच मुख वाले सपुत (शूरवीर) है। उनका मुख पूर्व दिशा में उद्भट (श्रेष्ठ) बानर जैसा विकट है। दक्षिण दिशा की ओर उनका मुख नरसिंह भगवान के उग्र तेज से भरपूर भरा हुआ है। पश्चिम दिशा में उनका मुख दीनों के पक्ष की रक्षा करने वाले पक्षिराज के तुण्ड जैसा है। उत्तर दिशा में उनका मुख युद्ध के लिए तैयार वाराह जैसा है। ऊपर (आकाश) की ओर उन्नत उनका मुख रणरंग के लिए प्रस्तुत तुरंग जैसा है, जो जंग जीत कर दानवों के समूह को भंग कर देने वाला है।