Kaarva - 2 in Hindi Anything by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | कारवाॅं - 2

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कारवाॅं - 2

अनुच्छेद दो

अंजलीधर मड़ई में बैठी अखबार देख रही हैं। कई राज्यों में किसानों के आत्महत्या की खबर देखकर वे चिंतित हो उठीं। सुबह के दस बजे थे, धूप बहुत तेज नहीं थी। रामसुख अपने खेत का दो विश्वा गोड़कर लौटे। अंजलीधर के पास ही बैठ गए। 'किसान आत्महत्या कर रहे हैं रामसुख।' 'बहुत मजबूरी में किसान इस तरह का कदम उठाता है माँ जी', रामसुख बोल पड़े। 'इधर मैंने कुछ रिपोर्ट देखी हैं जिसमें बताया गया है कि फसल का उचित दाम न मिल पाने तथा कर्ज़ से दबे होने के कारण किसानों ने आत्महत्या की है। कैसे ये आत्म हत्याएँ रुकेंगी रामसुख? तुम क्या सोचते हो?' 'माँ जी किसान के लिए संकट ही संकट है। बँटते-बँटते सभी के पास ज़मीन कम होती जा रही है। इस पर भी किसान हर जगह ठगा जाता है। लोग कहते हैं कि खेती पर बोझ ज्यादा है। आखिर गाँव के लोग कहाँ जाएँ ? गाँव के बच्चे बड़े शहरों की ओर भागते हैं। हम लोगों के साथ भी यही हुआ। छोटे-मोटे काम करके हम लोग कुछ रुपये गाँव ले आते हैं। शहरों में भी हम लोग एक तरह से बाहरी ही माने जाते हैं। इसका निदान क्या होगा माँ जी? यही सोचने की बात है।' 'इसीलिए हम लोगों ने खेती के साथ डेरी को जोड़ा है। बिना कोई व्यवसाय किए अब किसानों का गुज़ारा नहीं हो सकता।' रामसुख माँ जी के साथ बात कर ही रहे थे कि राम दयाल भी कंधे पर कुदाल रखे खेत से आ गए। माँ जी को प्रणाम किया। आशीष देते हुए माँ जी ने कहा, 'राम दयाल जी, इस समय बहुत सी जगहों पर किसान आत्महत्या कर रहे हैं। क्या किया जाए कि ये आत्महत्याएँ रुक जाएँ?' 'माँ जी, अब थोड़ी खेती से तो खर्च नहीं चलेगा। खाद, पानी सब महँगा हो गया है। जो कुछ वह पैदा करता है, उसका ठीक दाम नहीं मिलता। वह आतमहत्या न करेगा तो क्या करेगा माँ जी ?' अंजलीधर भी सोचने लगीं। आखिर खुशी में कोई आत्महत्या नहीं करता। पूरा समाज खेती-किसानी को हेय दृष्टि से देखता है। पिछड़ा धंधा हो गया है यह। किसानों द्वारा पैदा किया हुआ अनाज़, साग-सब्जी और फल का व्यापार करके लोग करोड़ों कमा लेते हैं पर किसान वहीं का वहीं रह जाता है। 'माँ जी अब तो नए बच्चे खेती नहीं करना चाहते लेकिन उनके पास और कुछ करने के लिए है भी नहीं। कुछ भी जुगाड़ हो जाएगा तो बच्चे खेती के बदले उसे करना चाहेंगे।' रामसुख बोल पड़े। 'ठीक कहते हैं राम सुख भाई', रामदयाल ने भी समर्थन किया। 'बच्चे और कोई काम तभी कर सकते है जब उस काम को उन्हें सिखाया जाए और काम भी कुछ ऐसा जिससे वे कुछ कमा सकें। पहले लोग बिनाई, रफूगीरी जैसे काम भी करते थे पर जब से प्लास्टिक की कुर्सियाँ आ गईं, कपड़ों में नए-नए फैशन आ गए, ये दोनों धन्धे ख़त्म हो गए। तुम देख ही रहे हो कि रिक्शे आ गए तो इक्के वालों का धंधा लगभग खत्म हो गया। जहाँ रिक्शे नहीं जा सकते, वहीं इक्के आपको मिलेंगे। जहाँ कहीं भैंसा बुग्गी भी चलती थी वहाँ भी ट्रैक्टर ट्राली आदि आ जाने से ये बुग्गियाँ समाप्त हो रही हैं। जब टेम्पों आ गए तो रिक्शा का धन्धा फींका हुआ।'

'इसका मतलब है नया नया धंधा तलाशना पड़ेगा माँ जी।'

'हाँ, जब कोई नई तकनीक आ जाती है तो पुरानी तकनीक से काम करना लोग बन्द कर देते हैं।'

'बात बिलकुल ठीक बता रहीं है माँ जी आप।' रामसुख ने नज़र दौड़ाई। 'रिक्शा, तांगा की कौन कहे माँ जी, टेलीफोन को ही देखिए। पहले लोगों ने पी.सी. ओ. खोल कर पैसा कमाया पर जैसे ही मोबाइल चलन में आया, पी.सी.ओ. का धन्था ख़त्म हो गया। अब कोई पी.सी.ओ. से ही चिपका रहेगा तो उसको रोटी मिलनी भी मुश्किल हो जाएगी।' 'बड़ी ज्ञान की बातें हैं माँ जी। हम सब का बहुत हुशियार रहै का परी।' रामदयाल का भी दिमाग दौड़ने लगा। 'ठीक कहते हो रामदयाल । हम सभी को हमेशा नई जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए...। नई जानकारी के हिसाब से काम में भी बदलाव करना होगा।' माँ जी बताती रहीं।

इसी बीच बगल के पुरवों के तीन लोग मो० करीम, राम जियावन और मोलहू आ गए। रामजोहार के बाद तीनों सामने के तख्ते पर बैठ गए। मो० करीम ने माँ जी से कहा, 'माँ जी, हम लोग भी आपकी डेयरी से जुड़ना चाहते हैं।'

'यह तो बड़ी अच्छी बात है भाई', माँ जी ने उत्तर दिया। 'पर हम लोगों की कुछ शर्तें होती हैं।'

'कौन सी शर्तें हैं माँ जी?' करीम ने पूछा। 'करीम भाई हम लोग ईमानदारी से अपनी रोज़ी कमाना चाहते हैं। इसीलिए विकल्प डेयरी के लोगों ने यह तय किया है कि जो ईमानदारी से काम करना चाहें वही इससे जुड़ें। दूध का धन्धा अधिक ईमानदारी की माँग करता है। दूध में किसी प्रकार की कोई मिलावट चाहे वह पानी की ही क्यों न हो, यहाँ नहीं चल पाएगी। आप इस पर विचार कर लें फिर हम लोगों को सूचित करें। सदस्यों की आम सहमति से ही कोई निर्णय लिया जाएगा।'

'बात आपने तो बिलकुल ठीक कही है माँ जी। हम लोग आपस में बात करके फिर मिलेंगे।' करीम ने कहा।

'ठीक है आप लोग विचार कर लीजिए', माँ जी के कहते ही तीनों उठे और चल पड़े।

'माँ जी बहुत सोच-समझ करके इनको सदस्य बनाना होगा', राम दयाल ने कहा।

'ठीक कहते हो राम दयाल। हम सबको बहुत सावधानी से हर काम करना होगा। यदि लोग ईमानदारी से जुड़ना चाहते हैं तो विचार किया जाएगा।' माँ जी ने समझाया। माँ जी हमेशा अपने को तोलती रहती हैं। कहीं उनके कदम गलत दिशा की ओर तो नहीं जा रहे। इसी बीच माँ जी का मोबाइल बज उठा, यह फोन वत्सला का था। माँ जी वत्सला का हाल-चाल पूछती रहीं। घर, परिवार, विपिन, सभी का। वत्सला ने विपिन की माँ से माँ जी की बात कराई। एक दूसरे की आवाज़ सुनकर दोनों बहुत खुश हुईं। छोटी-छोटी सुखकर घटनाएँ मन पर कितना गहरा प्रभाव डालती हैं! प्रसन्नता से आदमी दीप्त हो उठता है। 'हम लोग परसों वर्दवान से चल पड़ेंगे। आरक्षण मिल गया।' 'इतनी जल्दी माँ जी ने अनुमति दे दी?' अंजलीधर ने पूछा। 'माँ जी, तरन्ती ने फोन से सूचित किया था कि नन्दू, हरवंश और तन्नी जेल पहुँच गए हैं। आप पर इस समय काम का दबाव ज्यादा होगा। इसीलिए हम लोगों ने माँ जी से जाने की आज्ञा माँगी। उन्होंने खुशी-खुशी आज्ञा दे दी। आप बहुत परेशान न हों माँ जी, हम लोग आ रहे हैं। विपिन भी दौड़-धूप करेंगे ही। कोशिश करके तीनों को छुड़ाया जाएगा। विपिन बहुत चिंतित हो उठे हैं। वे जल्दी हठी पुरवा पहुँचना चाहते हैं।' तब तक विपिन भी आ गए। उन्होंने माँ जी से कहा, 'माँ जी हम लोग आ रहे हैं। हठी पुरवा हम लोगों के दिमाग़ में घूम रहा है, आप अधिक चिंतित न हों। "हम सब लोग मिल कर काम कर रहे हैं। इसमें सभी चिंतित हैं, हमें सभी की चिन्ता का ध्यान रखना है। ठीक है आजाओगे तो हमें आसानी होगी पर हम लोगों ने दौड़-धूप करके तीनों की ज़मानत करा ली है। तीनों पुरवे में आ गए हैं।' माँ जी ने कहा। फोन पर वार्ता जैसे ही खत्म हुई, माँ जी ने रामसुख से कहा, 'रामसुख जी, वत्सला और विपिन भी आ रहे हैं। सभी लोग दौड़-धूप करेंगे। मुकदमें की अच्छी पैरवी की जाएगी। डेयरी के काम को आगे बढ़ाना होगा। कुछ कमाते हुए ही हमें यह लड़ाई लड़नी है।' 'आप हैं तो हम लोग निश्चिंत हैं', रामसुख और रामदयाल दोनों बोल पड़े। खंजन के दो जोड़े मड़ई के सामने आकर प्रसन्नता से विचरण करने लगे मानो कह रहे हों माँ जी, हम सब लोग भी आपके साथ हैं।
राम दयाल और रामसुख दोनों उठे और अपने अपने घरों की ओर चले गए। माँ जी सोचने लगीं-चलो अच्छा हुआ। विपिन के आ जाने से बच्चों के मुकदमे में अच्छी पैरवी हो सकेगी। आखिर यह लड़ाई हमें अन्त तक लड़नी ही है। इसी बीच भँवरी एक लोटा जल लेकर आ गई। कहा 'माँ जी रोटी तैयार है, ले आऊँ? 'ठीक है, ले आओ।' माँ जी ने कहा। माँ जी ने झोले से गिलास निकाला, उसे धोकर पानी भरा, हाथ धोया और पद्मासन की मुद्रा में बैठ गईं। भँवरी एक थाली में गेहूँ और मक्के के आंटे की बनी हुई दो रोटियाँ तथा आलू-बैगन की सब्जी ले आई। माँ जी के सामने रखा। माँ जी ने एक कौर रोटी तोड़ते हुए भँवरी से कहा, 'तुम भी अपनी रोटियाँ ले आओ। यहीं साथ खाओ।' 'नहीं माँ जी, मैं वहीं खा लेती हूँ।' इतना कहकर भँवरी घर के अंदर चली गई।

मुकदमों की पैरवी करनी है, पूरा पुरवा कसमसा रहा है। तीनों बच्चों को 
अपनी खेती-बारी और डेयरी का काम भी सँभालना है। माँ जी ने सभी ग्राम वासियों स्त्री-पुरुष बच्चों को इकट्ठा किया। दूसरे पुरवों के लोग भी डेयरी से जुड़ना चाहते हैं इसी पर चर्चा छिड़ी। माँ जी ने सबसे पहले अंगद से पूछा कि क्या किया जाए? 'काफी जाँच-परख कर कदम उठाया जाए', अंगद ने कहा। 'जाँच-परख कैसे की जाए यह तो बताओ?' माँ जी बोल पड़ीं। 'जो लोग जुड़ना चाहते हैं वे लोग यदि ईमानदारी से काम करें तब तो उनका जुड़ना ठीक होगा।' रामसुख ने अपनी बात रखी। 'मैं उनको ईमानदारी से काम करने का एक अवसर देना चाहती हूँ। ईमानदारी का भी एक परिवेश बनाना पड़ता है। हो सकता है हम लोगों के साथ जुड़कर वे सभी ईमानदारी से रोजी कमाने में विश्वास करने लगें।' 'मौका देने की बात तो ठीक है लेकिन उनसे कबूल करा लिया जाए कि वे ईमानदारी से काम करेंगे।' राम दयाल चहक उठे।

तीन दिन बाद विपिन और वत्सला भी आ गए। शहर पहुँचते ही उन्होंने अपना सामान कमरे में रख पुरवे की ओर रुख किया। इन दोनों के पहुँचते ही हठी पुरवा में एक उत्सव का माहौल बन गया। जो भी सुनता, दौड़ा आता। बच्चे वत्सला जी से मिलने दौड़ पड़े। वत्सला के हाथ में लड्डुओं के दो पैकेट थे। विपिन ने उन पैकटों को खोलकर अंगद के हाथ में दे दिया। अंगद सभी को लड्डू देने लगे। पुरवे के तीन बच्चे एक ग़लत मुकदमे में फँसाए गए है इस कसक में भी उत्सव का यह क्षण लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट बिखेरता रहा। छोटे-छोटे सुख भी कितने महत्वपूर्ण होते हैं? महिलाएँ वत्सला जी का हाल-चाल पूछती रहीं। आखिर बेटी ससुराल से लौटी है।

इधर हठी पुरवा में उत्सव उधर दुधहा अमरेश और चौधरी प्रसाद प्रथान जी के यहाँ बैठे 'विकल्प डेयरी' पर ही बात कर रहे थे।

'हम लोगों का धन्धा चौपट हो जाएगा प्रधान जी।' अमरेश ने कहा ।

'वह कैसे?' प्रथान जी चौंके।

'करीम, राम जियावन सभी 'विकल्प डेयरी' में दूध देने का मन बना रहे हैं। उनके साथ ही और लोग भी कसमसा रहे हैं। फिर हम लोगों को दूध कहाँ से मिलेगा?' अमरेश ने बताया ।

'अच्छा ! तो यह बात है। समझ गया मैं। हठी पुरवा का रोग दूसरे पुरवों में भी फैलने लगा है। हठी पुरवा के साथ जुड़ने का मतलब है मेरा वोट कम होना । ऊँ... हूँ... वोट में सेंध। देखना होगा इसे अमरेश।' प्रधान जी भी कुछ ताव में आ गए। 'तुम लोग दूध नहीं पाओगे तो भैंस-गाय पाल लोगे। दूध की पूर्ति हो जायगी। पर मेरा वोट कम हो गया तो उसकी भरपाई नहीं हो पाएगी।'

'प्रधान जी, भैंस-गाय पाल करके दूध बेचने में उतना मुनाफा नहीं है जितना दूध खरीद करके बेचने में।' अमरेश ने चुटकी बजाते हुए बात रखी।

'जानता हूँ... जानता हूँ... दूध खरीद करके पानी मिलाकर बेचना ज्यादा फायदेमंद है, यही न।' 'हाँ, आप तो सब जानते हैं। मैं डेढ़ कुन्तल खरीदता हूँ और तीन कुन्तल बेचता हूँ। रेट थोड़ा कम कर दो, बस सब टूट पड़ते हैं। किसी हलवाई को मैं दूध नहीं देता।'

'हलवाई को कैसे दे पाओगे? वह तो खोए के भाव से पैसा देगा। लेकिन तुम्हारे दूध से मेरा वोट ज्यादा कीमती है। प्रधानी की कमाई से ही नया मकान बनाया है। स्कार्पियो खरीदी है। समाज में मान बढ़ा है। मैं इसे छोड़ने वाला नहीं हूँ। हठी पुरवा में एक विधवा औरत आकर रहने लगी है। उसी की करतूत है यह सब। अभी तक मैं चुप था कि हठी पुरवा का वोट न भी मिलेगा तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पर अगर यह रोग बढ़ा तो मुझे सोचना होगा।'

'अगर उस औरत के हटने से सारा मामला सुलझ जाए तो में यह काम चुटकियों में कर सकता हूँ।' चौधरी प्रसाद भी तैश में आ गए। 'चौधरी, अन्तिम औज़ार को पहले प्रयोग नहीं किया जाता और समझ लो जो लोग यह काम करते हैं वे शोर नहीं करते।' प्रधान जी अपना दाँव सोचते हुए कह गए।

'इस ग्राम पंचायत में कितने लोग दूसरों से दूध खरीदकर बेचते हैं?' प्रधान जी ने पूछा। 'पन्द्रह-सोलह होंगे', चौधरी प्रसाद ने गिनते हुए बताया।

'हूँ..... 'प्रधान जी दाहिने हाथ की उँगली से सिर खुजाते रहे। 'तो फिर रोकना होगा उन लोगों को जो विकल्प डेयरी से जुड़ना चाहते हैं। मैं करीम और राम जियावन को बुलाकर बात करूँगा । तुम लोग अभी जाओ। विकल्प डेयरी का रोग फैलना खतरे की घण्टी है। बिल से निकलते ही साँप का सिर कुचल देना चाहिए। यदि इसमें चूक हो गई तो फुफकारने के लिए हमेशा रहेगा ही। तुम लोग एक काम करो। हठी पुरवा में जाकर जिस भाव से डेयरी दूध खरीदती है उससे पाँच रुपये लीटर अधिक देकर दूध खरीद लो। सारा दूध मिलना चाहिए। एक महीने भी अगर विकल्प डेयरी को दूध न मिला तो डेयरी खत्म। इसके बाद तो तुम लोगों का ही राज होगा। फिर जिस भाव से चाहोगे, दूध खरीदोगे।' कहते हुए प्रधान जी अपनी मूछें ऐंठते रहे। 'पर प्रधान जी, यह काम बहुत आसान नहीं है। डेयरी वालों को तोड़ पाना काफी मुश्किल होगा।' दुधहा अमरेश ने अपनी बात रखी। 'कैसे आदमी हो अमरेश ! दुश्मन को मैदान से हटाना चाहते हो पर उसे पटखनी भी नहीं देना चाहते।' 'हठी पुरवा के लोग बहुत एकजुट रहते हैं। उनको तोड़ पाना काफी कठिन है। वह विधवा औरत जब तक है , गाँव वालों को पटा पाना बहुत मुश्किल होगा।' 'मैं तो भुक्त भोगी हूँ अमरेश। मैंने बहुत कोशिश की कि पुरवे में फूट पड़ जाय पर कामयाब नहीं हुआ। हठी पुरवा का सारा वोट एक ही जगह मेरे विपक्ष में पड़ गया। मैं भी पूरी तरह बदला चुका रहा हूँ। एक भी सरकारी सहायता हठी पुरवा को नहीं मिल रही। जब तक और पुरवे हमारे साथ हैं, मैं हठी पुरवा की परवाह नहीं करता। पर तुम बता रहे हो कि हठीपुरवा का रोग दूसरे पुरवों में भी लगने वाला है, मेरे लिए चिंता का विषय यही है। तुम लोग दूध कहीं दूसरी जगह से भी खरीद सकते हो पर मुझे तो वोट इसी ग्राम पंचायत के पुरवों से लेना है। मुझे हर कीमत पर रोग को फैलने नहीं देना है।' 'हम भी पूरी मदद करेंगे प्रधान जी। हम लोगों का धंधा केवल शुद्ध दूध का धंधा नहीं है। जनता भी हम लोगों का साथ देती है। हम लोग दर्जनों प्रकार का दूध बेचते हैं। दूध जैसा, दूध-पानी, पानी-पानी दूध, दूध-दूध पानी, मक्खन सहित दूध, बिना मक्खन का दूध और भी तरह-तरह के दूध हैं। आखिर सब बिकते ही हैं।' 'क्या तुम लोगों का दूध पकड़ा नहीं जाता?' प्रधान जी ने पूछा। 'जब स्वास्थ्य निरीक्षक पैसा लेता है तो वह दूध क्यों पकड़ेगा? खानापूरी के लिए पहले शुद्ध दूध कभी-कभी भर लिया करता था। पर अब तो कोई नहीं पूछता। हम लोगों ने भी अपना संघ बना लिया है। हम लोगों से टकराने की हिम्मत अब निरीक्षकों में नहीं होती। व्यापार संघ वाले भी हमारी मदद करते हैं। सरकार भी तो अब मिमियाने लगी है। वह तो जनता से बस इतना ही कहती है जागते रहो। सरकार भी जानती है। नीचे से ऊपर तक सभी पैसा लेते हैं। कहीं कोई काम बिना पैसे के होता है? अब तो स्वास्थ्य और खाद्य निरीक्षक बिना पुलिस की सहायता के चेकिंग नहीं कर सकते। और पुलिस इतनी कहाँ है कि उनके पीछे-पीछे लगी रहे। हम लोगों ने प्रशासन से वादा करा लिया है कि बिना अध्यक्ष-मंत्री को सूचित किए छापा नहीं पड़ेगा।' 'तभी तो बिना नकद नरायन के मैं भी कोई दस्तखत नहीं करता। बहुत अच्छा युग आ गया है। पैसा दोनों हाथ से बटोरने की पूरी छूट है। मैं तो यही सोचता हूँ कि ऐसा बढ़िया युग कभी नहीं था। प्रथान को भी हक मिला है कि वह अपना प्रतिनिधि बनाएँ। क्या ऐसा युग कभी था?' 'इस युग में तो हम लोग भी बहुत स्वतन्त्र हैं प्रधान जी। जो भी चाहो कर डालो। किसी का कोई डर नहीं। सरकार ही कहती है कि हम भयरहित समाज बना रहे हैं। सभी दुधहा भाइयों से कहते हैं कि अब कोई डर नहीं। प्रधान जी सुना है कि मशीन भी दूध पैदा करती है। कुछ दवाएँ डाल दो बस दूधैदूध। कौनो कंपनी वाले अइहें और बतैहैं कि हमार मशीन दूध देत है तो हम सबका बतायौ। सब लोग मिलिकै ऊ मशीन खरीद लीन जाई और फिर विकल्प डेयरी टाँय-टाँय फिस्स।' अमरेश ने कुछ याद करते हुए ये बातें बताईं। 'तुम लोग बहुत होशियार हो गए हो अमरेश भाई। हमें तो उसका कोई पता ही नहीं था। अगर कोई कंपनी आएगी तो मैं तुरंत तुम्हें बुलाऊँगा। हम सबको मिलकर विकल्प डेयरी की लुटिया डुबोनी हैं।' प्रधान जी चकित से बताते रहे। 'क्या हठी पुरवा से उस औरत को हटाया नहीं जा सकता ?' दुधहा चौधरी प्रसाद ने अपनी मुट्ठियाँ बाँधते हुए पूछा। 'तुम लोग तुरंत लंठई पर उतर आते हो। हम लोगों को बारीकी से काम करना है। साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।' प्रधान जी ने चौधरी प्रसाद को समझाते हुए कहा। 'तुम लोगों ने बहुत अच्छा काम चुना है। हमें भी विकल्प डेयरी वालों से बदला लेना है। चलो इसी बहाने तुम दोनों को चाय पिलाते हैं।' प्रधान जी उठ पड़े और चाय बनाने का आदेश देने के लिए घर के अंदर गए। लौटते हुए वे सोचते रहे-'यही मौका है हठी पुरवा को मात देने का... यही मौका है।' वे आकर फिर अपनी कुर्सी पर बैठ गए। चौधरी प्रसाद और अमरेश भी अपना दिमाग़ दौड़ा रहे थे। प्रधान जी के बैठते ही चौधरी प्रसाद ने कहा, 'प्रधान जी हम लोगों को अपना पक्का साथी समझो।' 'जानता हूँ.... जानता हूँ हम लोगों का दुश्मन एक है तो हम लोगों को साथ रहना ही है।' बातें होती रहीं। कभी प्रधान जी उछलते तो कभी चौधरी प्रसाद और अमरेश। थोड़ी देर बाद एक बालिका ट्रे में तीन कप चाय लेकर आ गई। तीनों ने अपना-अपना कप उठाया। बालिका ट्रे लेकर लौट गई। चुस्कियों के बीच चर्चा जारी रहीं। 'कैसे भी हो दाँव लेना ही है', प्रधान जी ने कहा। 'आप प्रधान हैं। आपका दाँव खाली कैसे जाएगा?' चौधरी प्रसाद के कहते ही अमरेश ने भी हुँकारी भरी। चाय खत्म हुई। दोनों दुधहा उठ खड़े हुए। 'इस मसले का हल सोचिएगा प्रधान जी। हम हर तरह से हाजिर हैं।' दोनों ने कहा। 'ठीक है, ठीक है'. प्रधान जी ने उत्तर दिया। दोनों राम-राम करके मोटर साइकिल पर बैठे और फुर्र हो गए।
चौधरी और अमरेश को रास्ते में ही करीम मिल गए। चौधरी ने बाइक रोकी और कहा, 'करीम भाई सुनो।' करीम उनके नज़दीक पहुँच गए। 'सुना है आप लोग विकल्प डेयरी में दूध देना चाहते हैं। वर्षों से आप हमें दूध देते रहे हैं। आज कौन सी दिक्कत आ गई जिससे विकल्प डेयरी में दूध देना चाहते हो।' 'चौधरी भाई, हम गए थे। तुम से क्या छिपाएँ? विकल्प डेयरी का काम हमें अच्छा लगा। हम लोग ईमानदारी से रोजी कमाना चाहते हैं।' करीम ने कहा। 'हम लोग कहाँ कहते हैं कि बेईमानी से कमाओ। आप हमें शुद्ध दूध दीजिए। इसमें आपकी बेईमानी के लिए कहाँ मौका है?' अमरेश ने डपटते हुए कहा। 'पर आप लोग दूध में पानी मिलाकर बेचते हैं। इससे हम लोग भी आपकी बेईमानी के गुनहगार बनते हैं। हम लोग इस गुनाह से भी बचना चाहते हैं।' 'देखो भाई करीम दूध में पानी मिलाना या न मिलाना यह हमारा काम है। दूध में पानी मिलाकर ही हम दोनों इतना कमा सके कि चार-चार कमरे का पक्का मकान बना लिया। पुरवे में है किसी का मकान वैसा ? आस-पास के पुरवों में हमारी धाक है। हमने बेईमानी से यह सब कुछ बनाया है पर इसका हमें कोई गम नहीं है। हमारे घर मोटर साइकिलें हैं। पिछले साल हमने भागवत की कथा सुनी थी। पुरवे में कोई सुन सका? पूरे जँवार को हमने न्योता दिया था। लोग आए और वाह-वाह कर रहे थे। तुम्हीं बताओ कि दूध में पानी न मिलाता तो क्या मैं यह

सब कर सकता था। हमारे बाप-दादे ईमानदारी करते-करते मर गए। ठीक से रोटी

नसीब नहीं हुई। किसी दिन मैं एम.एल.ए. का चुनाव लडूंगा। अगर जीत गया तो

अगली दस पीढ़ियों तक का इंतज़ाम कर लूँगा। तुम्हारी तरह ईमानदार बनने की

बेवकूफी नहीं करूँगा। सोच लो तुम गलत रास्ता पकड़ रहे हो। हम फिर मिलेंगे। राम

जियावन और मोलहू को भी समझाना है। हमें अपना धन्धा चौपट नहीं करना है।

टेट में कुछ रहेगा तो लोग इज़्ज़त करेंगे। खाली जेब वालों को कौन पूछता है ?'

'अमरेश भाई बात तो आप बड़ी पते की कर रहे हैं पर हम लोग जिस तरह के

परिवार में पले हैं उसमें बेईमानी करना अच्छा नहीं माना जाता है।' 'तुम भी पचास

साल पहले की बातें कर रहे हो। अब घर का मतलब बदल गया है। उसके रीति-रिवाज

भी बदल गए हैं। दस-बीस साल पहले एक कमाता था, दस खाते थे पर अब हर

आदमी को खुद कमाना है। देख ही रहे हो लड़कियाँ कमाने लगी हैं। तुम्हें सच बताऊँ

करीम, जब किसी को मोटरकार में बैठे फर्राटे से चलते देखता हूँ तो तुरंत एक आह

निकलती है.. मेरे पास भी ऐसी गाड़ी होती ! क्या तुम्हारे मन में यह बात नहीं उठती

कि मैं भी फर्राटा चार पहिए की गाड़ी पर दौड़ लगाऊँ?' 'भाई अमरेश हमारा ईमान

हमें गलत कामों की ओर जाने से रोकता है। हमें सिखाया गया है कि जो कुछ कमा

सको, उसी में संतोष करो।' 'यही संतोष तो ले डूबा है करीम भाई। संतोष का फल

हमारे बाप-दादों ने चखा है। मैं इस भुलावे में नहीं आने वाला। लोग कहते रहे हैं

कि संतोष का फल मीठा होता है। इस तरह की नसीहत वही देते हैं जिनका पेट भरा

होता है। सत्ता में बैठे लोग क्या-क्या गुल खिला रहे हैं, देखते हो। दो सौ करोड़ खाते

में पहुँच जाता है और किसी को कानो-कान खबर तक नहीं होती। यहाँ घोटाले पर

घोटाले हो रहे हैं और मुझे नसीहत दे रहे हो। ईमानदारी के पीछे भागोगे तो पचास

साल पीछे चले जाओगे। ईमानदार बाप, बेटों की नाराजगी का शिकार हो रहे हैं। हर

आदमी चुपड़ी खाना चाहता है और तुम सूखी रोटी की बात करते हो। ईमानदारी से

कितनों की कोठियाँ बनी हैं? हम झोपड़ी में नहीं कोठी में रहना चाहते हैं करीम।

झोपड़ी नहीं, कोठी का सपना देखो। मैं खुद बाप को सूखी रोटी खिलाता हूँ और खुद

चुपड़ी रोटी खाता हूँ। जानते हो क्यों?' 'नहीं जान पाया अमरेश भाई। तुम्हारी ये ऊँची

बातें हमारी समझ में कम आती हैं।' 'इतनी साफ बात भी समझ में नहीं आई। इससे

तुम अपने दिमाग़ का अंदाज़ा लगा सकते हो करीम भाई। बाप को चुपड़ी खिलाकर

कौन जवाब दे कि ये चुपड़ी कहाँ से आई। सूखी रोटी खाते रहे हो तो खाओ। हम

तो चुपड़ी खाएँगे और डंके की चोट पर खाएँगे। जानते हो धर्म का ठेका लेने वालों

को जैसे ही कोई टुकड़ा फेंकेंगे, वे वाह-वाह कर उठेंगे। हमको बड़का धार्मिक बताएँगे

और तुम, अपना दो पैसे का चढ़ावा लिए बाहर खड़े रहोगे'। 'कहा न, हमारी राह बिलकुल जुदा है।' चौधरी प्रसाद भी कुछ ताव में आ गए, 'करीम भाई अपने दिमाग को साफ करो। पुरानी गन्दगी निकले बिना नई बात कैसे समझ में आएगी? पर समझना पड़ेगा ही। दूध की बात करो। आप विकल्प डेरी को दूध नहीं देंगे।' 'भाई चौधरी प्रसाद आपके सुझाव पर गौर तो कर सकता हूँ, पर वादा नहीं कर सकता। हमारे साथ कई लोग हैं। आपस में विचार करके ही हम लोग कोई फैसला करते हैं।' 'अमरेश भाई के इतना समझाने पर भी अभी तुम्हें सोचना-विचारना है। यह बात कुछ समझ में नहीं आई। चलो अमरेश, हम लोग देखेंगे।' इतना कहकर चौधरी प्रसाद ने किक मारी। अमरेश भी पीछे बैठ गए और धड़धड़ाती हुई मोटर साइकिल चल पड़ी। 'याद रखना।' चलते-चलते अमरेश ने कहा। करीम भी सोचने लगे। रईस ने उसे तस्करी के धंधे में लगने का सुझाव दिया था। तस्करी से ही उसने बहुत कुछ कमा लिया है। मिलता है तो कहता है तुम वहीं के वहीं रह गए।

करीम शाम को राम जियावन के घर गए। भैंस दुह कर मँड़हे में बैठे वे तम्बाकू मल रहे थे। करीम ने चौधरी और अमरेश की बातें राम जियावन को बताई। सुनते हुए राम जियावन ने तम्बाकू का मलना बंद कर दिया। जब करीम अपनी बात कह चुके तो राम जियावन ने तम्बाकू ठोंक कर करीम के आगे बढ़ा दिया। करीम ने एक बेरा लेकर अपने मुँह में डाल लिया। राम जियावन ने भी तम्बाकू को होठों से दबाते हुए अपनी बात शुरू की, 'भाई करीम, अमरेश और चौधरी जउन बात कहत हैं उहै बहुत लोग कहत हैं। ई कउनौ नई बात नाहीं कही गै है। बेईमानी ईमानदारी का धकियाय रही है। मुल बात ई है कि हम अउर तू ईमादारी से काम कीन चाहित है कि नाहीं। हठी पुरवा मा माई से यहै बात तौ भई रहा कि ईमानदारी से कमावा चाहौ तौ डेरी से जुड़ो। कहौ तो मोलहुवो का बोलाय लीन जाय?' 'हाँ हाँ, जरूर बोलाय लीन जाय,' करीम ने कहा। मोलहू का घर भी पुरवे में ही था। राम जियावन ने एक लड़के को दौड़ाया। राम जियावन और करीम बतियाते रहे। इसी बीच मोलहू भी आ गए। मोलहू के माता-पिता के दो बच्चे जन्म के एक महीने के अन्दर ही चल बसे थे। जब मोलहू पैदा हुए तो उनके साथ एक टोटका किया गया। मोलहू की फूफू को मोलहू को दे दिया गया और फिर माई ने पाँच रुपये देकर बच्चे को खरीद लिया। तभी से बच्चे का नाम मोलहू-अर्थात मोल लिया हुआ हो गया। पूरी ज़िन्दगी यह नाम मोलहू ढोते रहे। मोलहू भी जल्दी ही आ गए। करीम ने सारी बातें समझाई फिर कहा, "भैय्या अब ई तय करैका है कि रोजी ईमानदारी से कमाई जाय कि नहीं? 'हम तो तब्बै से सोचित है जब हठी पुरवा मा बात भै रहा। ई कउनौ आसान सवाल नाहीं है' मोलहू ने सिर खुजलाते हुए कहा। राम जियावन भी कुछ सचेत हुए, "सवाल तौ कठिन हइयै है। ईमानदारी की कुँइया मा नहाबौ कि बेईमानी के समुद्र मा डुबकी लगइहौ। एक बात अउर जान लेव कि ईमानदारी करै मा बेईमानन से लड़डू का परी । पूँछ लुकुवाये काम न चली।' 'बात बिलकुल ठीक कहत हौ जियावन भाई। यहौ सोचै का है कि ईमानदारी किहे से परिवार साथ देई कि नाहीं।" "का यहो करैका परी?" करीम भाई बोल पड़े। 'मेहरिया घर कै मालकिन है। बिना वह के साथ दिहे तोहार ईमानदारी चलि पाई ?' मोलहू पूछते हुए चहके। "मोलहू भाई ठीकै कहत हौ। घरैतिन विरोध करी तो ईमानदारी चलब मुश्किल होइ जाई।"

" तौ का कीन जाय? मेहरियन से पूछि कै फैसला लीन जाय ?" करीम भाई बोल पड़े।

'हमें दुइ बात फरियावै का है। पहिले हम तीनों तय कइ लेई कि ईमानदारी करब, तबै पूछबो ठीक है। जौ हमरेन मन मा अन्देशा होय तौ पूछे से कउन फायदा?' राम जियावन ने बात को तीर तक पहुँचाया।

तीनों का दिल धकधकाता रहा। 'तो ठीक है, तय करो।' मोलहू बोल पड़े। थोड़ी देर चुप्पी रही। 

'चलो करीम भाई, ईमानदारी की जायगी रोज़ी कमाने में। तय समझो।' राम जियावन खड़े हो गए।

'चलो तय।' मोलहू भी कहते उठे।

'तो घरैतिन से बात कर हम लोग फिर मिलेंगे भाई कल शाम को।' करीम भाई बोल पड़े।