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Digvijay Singh Rathore

Digvijay Singh Rathore

@digvijaysinghrathore332439


// मानसिक तिलिस्म //

मैं ना बंदी बना था,
ना ही गुलाम मुक्कर
खुला था इतना सा था
डरता, उड़ता नहीं था।

कुछ था अंदर धंसा हुआ,
टूटे कांच सा गढ़ा हुआ,
हर दम फिरता विचरता
अंधे कुंवे में तस्वीर खीचता।

मेरे सा रोज़ मरता मुर्दा बोलता,
कफ़न बगैर जीवन काटता था
मन कीचड़ मलिन, मस्तिष्क
भूतों का हरदम घेरा डला था।

चार पल चैन नहीं रुकता, धमकता
बेचैनी जगत की मायाजाल चढ़ता
स्वर्ण पाकर, कंकड़ चबाया करता,
फिर देखो, मैं ना ही बंदी बना था।

रोज़ यूँही मरी मौत से जागकर उठा था,
उस रोज़ कुछ भीतर जुड़ा घटा बढ़ा था,
साथ पसीजा और अंधकार तब्दील था
उस पल मेरा मानसिक तिलिस्म टूटा था।
©DSR

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भाग 2

वह मूर्ति की आँखों में देखता रहा, जो सपाट और स्थिर थीं। उसे समय का होश ही नहीं रहा कि कब स्कूल की घंटी बजी। वह गेट के करीब पहुँचा, तो अंदर से असेंबली की आवाज़ आ रही थी। उसे प्रधानाध्यापक की चेतावनी याद आ गई। पूरा विद्यालय प्रिंसिपल के सख्त स्वभाव से परिचित था। चौकीदार ने छोटा फाटक खोला और कहा, "बड़े सर ने आपको बुलाया है।"

विशाल प्रिंसिपल रूम में पहुँचा। प्रिंसिपल ने पूछा, "आज आपका क्या बहाना है?" विशाल ने लड़खड़ाते हुए कहा कि उसके कपड़े भीग गए थे। यह सुनते ही प्रिंसिपल का रोष फूट पड़ा, "यह बहाना तो मैं बचपन में सुना करता था। और आपसे कितनी बार कहा है, शेव करवा कर आइए। बीवी चली गई तो चली गई, नौकरी मत जाने दीजिए।"

यह बात विशाल के दिमाग से ऐसे टकराई मानो किसी ने उसके चेहरे पर थप्पड़ जड़ दिया हो। उसने कहा, "आप मेरे निजी जीवन में दखल दे रहे हैं।" प्रिंसिपल ने उसे अंतिम चेतावनी देते हुए कहा, "अगली बार गलती हुई तो आप इस स्कूल से बाहर होंगे।"

वह भारी मन से बाहर निकल आया। स्टाफ रूम में वह साक्षी वसंत से मिला। विद्यालय में उसका सम्मान था। विशाल के लिए उसके दिल में कुछ तो था, जिसे वह न तो खोलना चाहती थी और न ही छुपा पा रही थी। विशाल के जाते ही साक्षी ने रजिस्टर में हस्ताक्षर किए।
क्लास में विशाल खोया-खोया रहा। दोपहर में कैंटीन में साक्षी ने उससे बात शुरू की।

"क्या आपको लंच नहीं करना?" उसने पूछा। बाद में चाय पीते हुए साक्षी ने कहा, "मम्मी चाहती हैं कि मैं दूसरी शादी कर लूँ।" विशाल ने ठंडे लहजे में कहा, "तो कर लो।" विशाल ने अपना दुख साझा करते हुए कहा कि उसे अपना जीवन बेरंग धागों सा लगता है। उसने पत्थर गिरने और वजूद तबाह होने की भयानक ख्वाइश भी जताई।

छुट्टी के बाद विशाल घर आया। शाम को साक्षी टिफिन लेकर उसके घर आई। अंदर आते ही उसने कमरे में शराब की गंध महसूस की। सच सामने आने पर विशाल फफक-फफक कर रो पड़ा।

उसने बताया कि कैसे उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई और अब वह मरी हुई ज़िंदगी जी रहा है। साक्षी ने उसे सांत्वना दी और अपना दुख भी साझा किया। उसने कहा, "तुम मेरी स्नेह को नहीं समझ पाए।" जाते-जाते जब विशाल ने उससे पूछा कि क्या जो उसने कहा वह सच है, तो साक्षी ने शर्माते हुए सहमति जता दी।

विशाल ने खिड़की-दरवाज़े बंद किए। आज वह सोने ही वाला था कि शराब के समय का अलार्म बजा। उसने मुस्कुराकर उस अलार्म को बंद किया और सुकून की नींद सो गया।

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विशाल

भाग 1

उसने घर की खिड़की खोली, जिससे छनकर आती रोशनी कमरे में बिखर गई। उसने पंखा बंद किया और स्नान किया। नहाकर बाहर आने के बाद वह कुछ देर अपने छोटे से कमरे के बिस्तर पर बैठा रहा। विचार उसके दिमाग में उफन रहे थे, लेकिन कोई भी स्पष्ट रूप से बाहर नहीं आ रहा था।

तभी दीवार घड़ी की 'टिक-टिक' ने उसका ध्यान खींचा। "नौ बज गए। स्कूल पहुँचने में देर हो जाएगी।" वह झट से उठा, किवाड़ बंद किए और मोटा ताला लगा दिया। फिर कदम स्कूल की ओर बढ़ा दिए।

जब वह नुक्कड़ पर स्थित 'बजरंग पान भंडार' के सामने पहुँचा, तो एक आवाज़ आई, "कैसे हो मास्टर जी?" उसने पलटकर जवाब दिया, "मैं ठीक हूँ दिनेश। तुम कैसे हो?" दिनेश कुटिल मुस्कान के साथ बोला। उसकी तंग भौहें और आँखों की चमक उसके पीछे के भावों को साफ बयां कर रही थी। विशाल पेशे से अध्यापक था। अपनी चालीस साल की लंबी उम्र में उसने कितने ही बच्चों को पढ़ाया और आगे बढ़ाया, लेकिन खुद जीवन का एक बड़ा सबक नहीं सीख पाया, जो समय ने उसे सिखाया था।

"भैया, चिमनगंज तक चलना है," विशाल ने एक रिक्शा रोकते हुए कहा। रिक्शा रुका और वह उसमें बैठ गया। विशाल की निगाहें सामने बैठी एक लड़की पर पड़ीं, जो अपने फोन में मशगूल थी। उसके खुले बाल और दमकता चेहरा काफी आकर्षक लग रहा था। विशाल ने अपनी नज़रें हटाईं, पर वे बार-बार उसी पर जा टिकती थीं। रिक्शा सरपट दौड़ रहा था। एक सवारी को उतारने के लिए जैसे ही चालक ने ब्रेक लगाया, उस लड़की का फोन उसके सिर से टकराकर नीचे गिर गया। जैसे ही वह उसे उठाने के लिए झुकी, विशाल की निगाहें अनचाहे ही उसके वक्ष पर जा टिकीं।

वह स्वयं को इन हरकतों के लिए अपराधी मानता था, फिर भी उसका ध्यान अनायास ही उधर चला जाता था। जिस पर उसकी नज़रें टिकी थीं, वह लड़की इस गंदी ललक को भाँप गई और स्वयं को ढंक लिया।

शहर का नया दिन अभी भी खुद को व्यवस्थित करने में लगा था। बाहर की खुली हवा विशाल के चेहरे को छूकर अपने होने का अहसास दिला रही थी। उसने आँखें मूँद लीं ताकि उस पवन को महसूस कर सके। उसके बंद आँखों के पीछे ख्याल तैरने ही लगे थे कि गाड़ी फिर रुकी।"चिमनगंज! चिमनगंज!" इस आवाज़ पर वह हड़बड़ाकर उठा, किराया दिया और स्कूल की ओर बढ़ गया। विद्यालय का रास्ता एक गली से होकर जाता है।

उस रास्ते के एक कोने पर गणेश जी का एक छोटा चबूतरा है। आज भी वह वहाँ रुककर उस चबूतरे को कुछ देर देखता रहा। एक समय था जब उसकी ईश्वर में बड़ी आस्था थी। लेकिन पिछले तीन सालों से उसने उस चबूतरे को देखा तो, लेकिन न समाज बदला, न ही उसके देवता।

वहाँ अब उसका विश्वास पूरी तरह समाप्त हो चुका था। उसे किसी बात में दिलचस्पी नहीं रही थी।

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कोरा पन्ना

क्या लिखूँ, रचूँ जो, भीगा यह संसार है,
छोड़ दूँ, या रिक्त कर दूँ, कोरा पन्ना साथ है।

ललाट पर चस्पा दूँ, छपवा दूँ उसका इनकार है,
गुदगुदी छोड़ दूँ, या दर्द जोड़ूँ, स्वयं समापन है।

बुलावा भूल जाऊँ, नाम मिटा दूँ, द्वार बंद है,
अधीरता छोड़ दूँ, पागलपन पीकर, विचार बंद है।

स्याह कलह दूँ, उसका अब शत्रुओं में नया पायदान है,
सज़ा करार दूँ, समांतर अब मेरे, गुनाह तामील है।
क्या लिखूँ, रचूँ जो, भीगा यह संसार है।

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