Quotes by Digvijay Singh Rathore in Bitesapp read free

Digvijay Singh Rathore

Digvijay Singh Rathore

@digvijaysinghrathore332439
(77)

Happy Independence Day to All the People of India. 🇮🇳

And Especially to those who believe this country become a Gas Chamber. Intolerence. Psuedo successer. Hatred. Genoside Spot. One side viewer. A puppet of US. Bankcurracy of Intelligence.

पुराने बटन-

नया शूट बनवाया,

महँगा चीर खरीदा,

कॉलर, आस्तीन,

फिटिंग और पुराने

बटन जोड़ी में टंकवाए।

स्मृतियों के पटल पर

कांच के इस बटन पर

दिए वचनों के साथ-साथ

छूते मचलता अहसास साथ।

उसके धीर का तोड़ कहाँ?

नए मकान में पुराने फाटक

जोड़े, अब वो रातरानी कहाँ?

नए वादों में पुराना फसाना,

समांतर सींचे प्रियतमा अब कहाँ?

उजड़ते पल भर में रिश्ते,

सालों संजोए महबूब न्यारे!

माथे के बल भूलते पहचाने,

मस्तिष्क पुष्पवान रोज़ पुकारे।

हवा ने सब कुछ बिगाड़ डाला,

देवता का पुष्प मुझ आ बरसा।

संभवतः उसने पुकारा बुलाया,

कोई मेरे कानों में फुसफुसाया है।

हाँ, उसने मुझे दीदार पर बुलाया है।

©DSR

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यत्र तत्र सर्वत्र

गर्म हवा मुल्क को लील रही,
नवीन सोच को झुलसा रही।
कई दूरियाँ पट रही, उभर रही,
मानवता दिन-दिन तिल हो रही।

झगड़ों का अंबार है, झंडों की गुलामी,
एक नई नफ़रत लहू में उबाल मार रही।
अनगिनत मंदिर हैं, अनगिनत मस्जिद,
प्रेम सिकुड़ रहा, झूठा राष्ट्रवाद उफ़न रहा।

कागज़ पर सब चंगा दिखता, मीठी स्याही,
ग़ौर से सूंघने पर स्याही रक्त सी तप रही।
फ़िज़ा का धर्म नहीं कोई, न कोई सरहदें,
क्यों ख़ुद को हम क़ैद में घुटते जा रहे हैं।

आतंक के बलबूते बेगुनाहों को सताते,
मज़लूमों को रगड़ते, अपने लफ़्ज़ बुलवाते।
जेबें सरेआम काटी जाती, क़ानून में फँसाते,
भावनाएँ आहत होतीं, बस्ती जलाई जाती।

आलम है न्याय का मेरे महबूब सा रिश्ता,
आज ग़लत, कल का सही, परसों कोई नया।
मरे हुओं को मौत आ जाती दुबारा हुज़ूर मेरे,
आते-आते आदेश, आधा इंसान बनता मूर्ति मेरे।

दो मुल्कों के नासूर रोग से पीड़ित है सब यहाँ,
कभी फटे बम यहाँ, कभी फटे मिसाइलें वहाँ।
बच्चे मरते कूड़ा बीनते, घुट-घुट अदना मरता,
मरती शबनम, मरती मीरा, प्रेम हृदय दफ़नाता।

पूर्वज ताड़ पे लिखते, उंगलियों से रटते जाते,
कल भी क़लम बेबस, वर्तमान दोहराता दिखता।

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शिवम् गंगा-

बीहड़ों, जंगलों, कस्बों, शहरों,

गाँवों, नदियों के तट पर

विशाल भू-भागों में,

मंदिरों की प्रार्थनाओं,

अगरबत्तियों, दीपकों

से उठते प्रकाश और धुएँ के बीच,

जब देवियाँ आँखें मूँदती हैं,

अनेकों अनजानी कलियाँ

घुटकर अपनी साँसें गिनती हैं।

गंगा लाश खींचती है पापियों की,

साधु की और अपने शोषितों की।

काँटे जितने शिव के धतूरे में,

उससे अधिक उसे सौंपने वालों में।

रंग-भेद, नस्लीय भेद, हीन, अपंग

सब डोलते हैं एक समान आँगन में।

अपने हृदय में ढोंग पिरोते, झूठ रचते,

मायावी चारों ओर हालाहल बाँटते हैं।

अनेकों रेखाएँ मानचित्र में ढेरों उलझी हैं,

उससे अधिक दिमाग पे उभरती दिखती हैं।

शत्रु सब हैं यहाँ, मित्र कोई नहीं है यहाँ,

भोग की शुरुआत यहाँ, मुक्ति मुक्त है यहाँ।

आदर्शों की पंक्तियाँ मंदिरों में छपी यहाँ,

दुख-दुख जोड़े, सुख बाँटे—लिखित यहाँ।

बीहड़ों, जंगलों, कस्बों, शहरों,

गाँवों, नदियों के तट पर

©DSR

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निजी स्वार्थ-

मैं शहद बोलता हूँ,

ज़रा ओट लिए छानता,

तुला तोलता फिर बोलता हूँ।

उपस्थित दूत भी हूँ, टुकुरता—

मसका लगाए दिखता,

अंतर्मन में चयनता फेरता।

कितना वक्त खाएगा?

मैं इससे क्या पाऊंगा?

कुछ मांगने आया होगा?

हाँ, पिछला बकाया है,

शायद अदा करने आया है?

सवाल-मंथन रुकता, जब

निजी स्वार्थ इशारों में फूटता है।

वह अपनी कलाई खोलता,

मैं अपनी उसे दिखाता हूँ।

हाथों से उपहार बदलते,

बड़े नयनों से तसल्ली करते,

तब लफ़्ज़ों की चहक फोड़ते।

©DSR

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हृदय खोलते।

अपने मन को टटोलते,
यदि मेरे हृदय को खोलते।
आँखों में बेदर्दी ना जताते,
मेरे दरमियाँ आँसू तो बहाते।
अंश से दूरी मुझसे ना बनाते,
आगे बढ़कर त्रुटियों पे डाँटते।
दूरियाँ बढ़तीं समंदर सी ऐसे,
दो पाट खींचे मध्य नाव जैसे।
कंधे टूटे, छाप उभरी जहन पे,
यूँ कठोर स्नेह से गाढ़ा करते।
अपने मन को टटोलते,
यदि मेरे हृदय को खोलते।
बेरुखी बढ़ती जाती स्वार्थ से,
कुछ आपमें ज़्यादा, मेरी आपसे।
परिचित बंधन, जल, ज़मीं हमसे,
रक्षक, भक्षक, लहू प्यासे दोनों इसके।
सालों से जड़े मौन को तोड़ें,
हमारे दरमियाँ गुलाब रोपें।
अब त्वचा बिखरी है आपकी,
नादानी छोड़ें, नया रिश्ता जोड़ें।
जीवन को अनेक चयन सूझते जाते,
शांति और हिंसा—कौन सा अपनाते?
अपने मन को टटोलते,
यदि मेरे हृदय को खोलते।
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एक गोल है सर्कस का

एक दायरा है सर्कस का,

जानवरों के करतबों का।

बंदर की गुलाटी,

शेर का पिंजरा,

भालू की दहाड़,

रिंगमास्टर का हंटर,

दर्शकों की तालियाँ,

गड़गड़ाहट और चटकारेदार प्रहार।

हर पशु का जीवन सर्कस,

बचपन, किशोरावस्था से मृत्यु तक सर्कस।

पढ़ा-लिखा ठेठ उल्लू-सा निर्देशक,

शेष सभी करते हैं सर्कस।

आग के गोले से गुजरना,

आज बचे, कल मरे, तय है निपटना।

शोर और चाबुक से छिलती चमड़ी,

मुट्ठी भर अन्न से पेट भरे, और हास्य करे।

कौन राजा, कौन रंक?

सब नियमित काज करें।

एक दायरा है सर्कस का,

जानवरों के करतबों का।
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मसकारा

इतवार बुझा-बुझा बीतता,

सोमवार नुकीला, धारदार।

आस्तीन चढ़ाए, श्वेत बरकरार,

थिरकती उंगलियां दिन बिताए।

भारी पत्थर उठाए, सजाए,

चेहरे पर तना एकल भाव जताए।

डटी हिम्मत सोखती, त्रुटि भुलाए,

जब टूटा मन खुले, अश्रु झर जाए।

मसकारा रिसता, उतरता सुख जाए,

एकल भाव शाखाओं सा फूट जाए।

स्नेह में बंधी कमजोर डोरी जुड़ जाए,

जब वह खुद पिघलकर दूजे में समाए।

चंद मोती लड़ियां बिखर जाए,

पूरा दफ्तर कमरे में समा जाए।

निशा थकान गलाए, पत्ता हरा होए,

पौ फटते ही सर्वत्र अतीत दोहराए।

इतवार बुझा-बुझा बीतता,

सोमवार नुकीला, धारदार।

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// मानसिक तिलिस्म //

मैं ना बंदी बना था,
ना ही गुलाम मुक्कर
खुला था इतना सा था
डरता, उड़ता नहीं था।

कुछ था अंदर धंसा हुआ,
टूटे कांच सा गढ़ा हुआ,
हर दम फिरता विचरता
अंधे कुंवे में तस्वीर खीचता।

मेरे सा रोज़ मरता मुर्दा बोलता,
कफ़न बगैर जीवन काटता था
मन कीचड़ मलिन, मस्तिष्क
भूतों का हरदम घेरा डला था।

चार पल चैन नहीं रुकता, धमकता
बेचैनी जगत की मायाजाल चढ़ता
स्वर्ण पाकर, कंकड़ चबाया करता,
फिर देखो, मैं ना ही बंदी बना था।

रोज़ यूँही मरी मौत से जागकर उठा था,
उस रोज़ कुछ भीतर जुड़ा घटा बढ़ा था,
साथ पसीजा और अंधकार तब्दील था
उस पल मेरा मानसिक तिलिस्म टूटा था।
©DSR

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भाग 2

वह मूर्ति की आँखों में देखता रहा, जो सपाट और स्थिर थीं। उसे समय का होश ही नहीं रहा कि कब स्कूल की घंटी बजी। वह गेट के करीब पहुँचा, तो अंदर से असेंबली की आवाज़ आ रही थी। उसे प्रधानाध्यापक की चेतावनी याद आ गई। पूरा विद्यालय प्रिंसिपल के सख्त स्वभाव से परिचित था। चौकीदार ने छोटा फाटक खोला और कहा, "बड़े सर ने आपको बुलाया है।"

विशाल प्रिंसिपल रूम में पहुँचा। प्रिंसिपल ने पूछा, "आज आपका क्या बहाना है?" विशाल ने लड़खड़ाते हुए कहा कि उसके कपड़े भीग गए थे। यह सुनते ही प्रिंसिपल का रोष फूट पड़ा, "यह बहाना तो मैं बचपन में सुना करता था। और आपसे कितनी बार कहा है, शेव करवा कर आइए। बीवी चली गई तो चली गई, नौकरी मत जाने दीजिए।"

यह बात विशाल के दिमाग से ऐसे टकराई मानो किसी ने उसके चेहरे पर थप्पड़ जड़ दिया हो। उसने कहा, "आप मेरे निजी जीवन में दखल दे रहे हैं।" प्रिंसिपल ने उसे अंतिम चेतावनी देते हुए कहा, "अगली बार गलती हुई तो आप इस स्कूल से बाहर होंगे।"

वह भारी मन से बाहर निकल आया। स्टाफ रूम में वह साक्षी वसंत से मिला। विद्यालय में उसका सम्मान था। विशाल के लिए उसके दिल में कुछ तो था, जिसे वह न तो खोलना चाहती थी और न ही छुपा पा रही थी। विशाल के जाते ही साक्षी ने रजिस्टर में हस्ताक्षर किए।
क्लास में विशाल खोया-खोया रहा। दोपहर में कैंटीन में साक्षी ने उससे बात शुरू की।

"क्या आपको लंच नहीं करना?" उसने पूछा। बाद में चाय पीते हुए साक्षी ने कहा, "मम्मी चाहती हैं कि मैं दूसरी शादी कर लूँ।" विशाल ने ठंडे लहजे में कहा, "तो कर लो।" विशाल ने अपना दुख साझा करते हुए कहा कि उसे अपना जीवन बेरंग धागों सा लगता है। उसने पत्थर गिरने और वजूद तबाह होने की भयानक ख्वाइश भी जताई।

छुट्टी के बाद विशाल घर आया। शाम को साक्षी टिफिन लेकर उसके घर आई। अंदर आते ही उसने कमरे में शराब की गंध महसूस की। सच सामने आने पर विशाल फफक-फफक कर रो पड़ा।

उसने बताया कि कैसे उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई और अब वह मरी हुई ज़िंदगी जी रहा है। साक्षी ने उसे सांत्वना दी और अपना दुख भी साझा किया। उसने कहा, "तुम मेरी स्नेह को नहीं समझ पाए।" जाते-जाते जब विशाल ने उससे पूछा कि क्या जो उसने कहा वह सच है, तो साक्षी ने शर्माते हुए सहमति जता दी।

विशाल ने खिड़की-दरवाज़े बंद किए। आज वह सोने ही वाला था कि शराब के समय का अलार्म बजा। उसने मुस्कुराकर उस अलार्म को बंद किया और सुकून की नींद सो गया।

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