Hindi Quote in Poem by Digvijay Singh Rathore

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शिवम् गंगा-

बीहड़ों, जंगलों, कस्बों, शहरों,

गाँवों, नदियों के तट पर

विशाल भू-भागों में,

मंदिरों की प्रार्थनाओं,

अगरबत्तियों, दीपकों

से उठते प्रकाश और धुएँ के बीच,

जब देवियाँ आँखें मूँदती हैं,

अनेकों अनजानी कलियाँ

घुटकर अपनी साँसें गिनती हैं।

गंगा लाश खींचती है पापियों की,

साधु की और अपने शोषितों की।

काँटे जितने शिव के धतूरे में,

उससे अधिक उसे सौंपने वालों में।

रंग-भेद, नस्लीय भेद, हीन, अपंग

सब डोलते हैं एक समान आँगन में।

अपने हृदय में ढोंग पिरोते, झूठ रचते,

मायावी चारों ओर हालाहल बाँटते हैं।

अनेकों रेखाएँ मानचित्र में ढेरों उलझी हैं,

उससे अधिक दिमाग पे उभरती दिखती हैं।

शत्रु सब हैं यहाँ, मित्र कोई नहीं है यहाँ,

भोग की शुरुआत यहाँ, मुक्ति मुक्त है यहाँ।

आदर्शों की पंक्तियाँ मंदिरों में छपी यहाँ,

दुख-दुख जोड़े, सुख बाँटे—लिखित यहाँ।

बीहड़ों, जंगलों, कस्बों, शहरों,

गाँवों, नदियों के तट पर

©DSR

Hindi Poem by Digvijay Singh Rathore : 112033243
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