निजी स्वार्थ-
मैं शहद बोलता हूँ,
ज़रा ओट लिए छानता,
तुला तोलता फिर बोलता हूँ।
उपस्थित दूत भी हूँ, टुकुरता—
मसका लगाए दिखता,
अंतर्मन में चयनता फेरता।
कितना वक्त खाएगा?
मैं इससे क्या पाऊंगा?
कुछ मांगने आया होगा?
हाँ, पिछला बकाया है,
शायद अदा करने आया है?
सवाल-मंथन रुकता, जब
निजी स्वार्थ इशारों में फूटता है।
वह अपनी कलाई खोलता,
मैं अपनी उसे दिखाता हूँ।
हाथों से उपहार बदलते,
बड़े नयनों से तसल्ली करते,
तब लफ़्ज़ों की चहक फोड़ते।
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