इंसान अपने मुताबिक़ रंग चुनता है
उसे लगता है की वो रंग चुनने माहिर है
जैसे...
वह अपनी खुशी दर्शाने के लिए
कभी लाल चुनता है,
कभी सफेद या
कभी काला।
ग़म की तस्वीर में
कभी काले रंग भरता है,
तो कभी हरे या;
फिर वही सफेद।
पर सच तो ये है—
रंग इंसान नहीं चुनता,
रंग तो ऊपर वाला रंगता है
रंगरेज़ जो है वो....
उसके हाथ में है ब्रश, रंग है
वो अपनी मर्ज़ी से रंग भरता हैं
जीवन के कैनवस पर।
हम तो बस उसके बनाए चित्र को
कभी समझ नहीं पाते,
और रंगों से ही नाराज़ हो जाते हैं।
देव जी......
आपने सारे प्रश्नों के उत्तर ग़लत दिए थे।
आसमान नीला नहीं होता —
वो तो सफेद होता है।
बस, ऊपर वाला
उस सफेद कैनवस पर
कभी नीला,
कभी गुलाबी,
तो कभी स्लेटी रंग भरता है।
सूरज भी पीला नहीं —
असल में तो वो भी सफेद है।
हम रंगो से बेहद प्यार करते है
तभी उसे पीले या लाल रंग में देखते है
और चाँद?
उसका तो कोई रंग ही नहीं।
वह एक तबाह मिट्टी है ..
'सिर्फ एक तबाह मिट्टी'
फिर भी हम ता-उम्र
रंगों को समझने का दावा करते हैं।
नीला आसमान,
पीला सूरज,
सुनहरी धूप,
चाँदी-सा चाँद...
पर हम भूल जाते हैं —
ऊपर वाला बहुत चालाक रंगरेज़ है।
उसके हाथ में है ब्रश,
हम सिर्फ कैनवस हैं।
वो जैसे चाहे,
जो चाहे —
रंग भर देता है।
और उसकी इस कलाकारी को
हम कभी समझ नहीं पाते...
बस भ्रम में जीते रहते हैं —
कि हमें रंगों की समझ है ।
बस देव जी,
इतनी सी समझ आई है अब —
जो 'सफेद ' होता है ना..
वो बेहद मासूम होता है,
ऊपर वाला उसी पर रंग थोपता है।
जितने बुरे, बचे रंग, दर्द से बने रंग
वो मासूम चुपचाप उसी रंग मे ढल जाता है
अपनी नियति समझ कर...उफ़ तक नही करता
अंत मे-
उसी के हिस्से आते हैं
ग़मों के सारे रंग।
पर एक रंग ऐसा है —
'काला'
जिससे खुद भगवान भी डरता है।
उसमें वो कोई रंग नहीं भरता।
जैसे काली रात —
जिसमें कोई और रंग नहीं दिखता।
और आज...
मैं भी काली साड़ी पहन कर आई हूँ।
ताकि आप...
आपका प्यार,
आपकी हमदर्दी,
आपके एहसास,
आपकी कोई भी भावना का रंग
मुझ पर न चढ़ सके।
ना मोहब्बत का,
ना दया का,
ना दर्द का।
क्योंकि अब मैं
किसी रंग मे रंगना नहीं चाहती —
इन रंगो से दूर जाना चाहती हूँ ....बहुत दूर
आज भी देव ने सफ़ेद कमीज पहनी थी हमेशा की तरह ...और आज भी चालाक रंगरेज़ ने उस पर अपनी मर्जी का रंग लगा दिया।
दर्द मे डूबा रंग..
महक की मुस्कान... वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी।
इस बार उसकी मुस्कान में सुकून नहीं, बल्कि दर्द छुपा था —
एक ऐसा दर्द, जिसे शब्दों में नहीं,
सिर्फ ख़ामोशी में महसूस किया जा सकता था।
धीरे-धीरे, नज़रे झुकाए, वापिस मुड़ कर
NGO के बाहर की ओर बढ़ने लगी।
पीछे से देव ने उसके कदमों की आहट पकड़ ली...
वो भी उसके पीछे चल पड़ा —
शायद कुछ कहने...
या बस उसे जाते हुए देख लेने के लिए।
उन्हे विश्वास था की महक हमेशा की तरह भाग कर वापिस आएगी ,गले लगा कर कहेगी
" रोक लो मुझे देव....."
इस बार सच मे उसकी एक बात नही सुनुँगा ...बाहों में कसकर जकड़ लूँगा. .कही जाने नही दूंगा. ..कही भी नही ।
तभी सोनिया अचानक महक के पीछे से आ गई,
देव का हाथ थाम लिया और उसके सीने से लग गई।
देव ठिठक गया... शब्दों से भी, रास्ते से भी।
आज फिर से उसकी जिंदगी मे भावनाओं का तूफ़ान आ गया, गुस्सा,नफरत,महोब्बत,मिलना ,बिछड़ना
थक चुका है अब देव...
भगवान को भी तरस नही आया उस पर। अगर अपने मन के समुन्दर मे सब भावनाओं का मंथन भी करता तब भी , कलश मे सिर्फ दर्द ही निकलता।
महक ने पलट कर कुछ नहीं देखा।
पर उसका मन सब कुछ देख चुका था।
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लाल गुलाबों की खुशबू पूरे वातावरण को महका रही थी पर अब देव के NGO मे सिर्फ गुलाब की खुशबु नही थी साथ मे महक की महक भी मिल गयी...गुलाब के फूल भी उसे राह से गुजरते हुए देख कर झूक गये ...वो भी तो मासूम होते हुए सारी उम्र कांटो का दर्द सहते है...वो समझ चुके थे महक का दर्द।
वो NGO के गार्डन में झुकी —
और एक लाल गुलाब का पौधा तोड़ लिया।
नरमी से उसे अपने आँचल में रख लिया,
जैसे किसी मासूम को गोद में लिया हो
"इसे मैं अपने घर के गमले में लगाऊंगी,"
उसने मन ही मन सोचा।
"ताकि और गुलाब खिलें...
और मैं रोज़ उन्हें भगवान के चरणों में अर्पित कर सकूं।"
"शायद..."
"शायद वो मेरी भावना समझ जाएं।
शायद मेरा दर्द देख लें।"
पर तभी जैसे भीतर से एक आवाज़ आई —
"नहीं... बिल्कुल नहीं।"
"वो कैसे समझेंगे?"
"वो तो पत्थर के बने हैं..."
उसके कदम तेज़ हो गए...
और आंखों की नमी को उसने हवा से छुपा लिया।
पर देव... महक की खुशबू को कैसे दूर कर सकता है...वो तो एक खुशबू बन के उसकी रूह मे समा गयी थी।
देव की आँखों से आखिर ओझल हो गयी महक..
सामने से सुधा और आलोक आ गये
" महक ऐसा नही कर सकती तुम देव के साथ" आलोक का गुस्सा और बैचैनी साफ साफ नजर आ रही थी ।
" इसलिए तो आपको फोन करके बुलाया है की आप आ कर देव को संभाल ले...मेरे देव को"
महक ने सुधा का हाथ पकड़ा और चैन उसके हाथ मे रख कर मुठी बंद कर दी..."मै इस प्यार कर काबिल नही।"
महक ने गाड़ी मे बैठते ही ड्राइवर से कहा" दिल्ली चलो"
दिल्ली जाकर बच्चों को समझाना है कि उनके पापा अब इस दुनिया में नहीं हैं…
देव अंकल एक सपना थे, भूल जाना होगा।
ताया जी की नाराज़गी भी सहनी पड़ेगी, पर वो जानती है कि वह बहुत बहादुर है—सब संभाल लेगी।
“मैडम, आगे रास्ता जाम है, मैं छोटे रास्ते से गाड़ी निकाल रहा हूँ,” ड्राइवर ने कहा।
थोड़ी दूर चलने पर वही पुराना शिव मंदिर सामने आ गया।
“ज़रा गाड़ी रोक दो…” महक कहकर मंदिर की ओर बढ़ पड़ी।
वो आकर चुपचाप मूर्ति के सामने बैठ गई, आँखें बंद कीं और धीमे से बोली—
“आप यूँ आँखें मूँदे मुस्कुरा रहे हैं… ये बता दीजिए कि देव जी की परीक्षा लेनी कब बंद करेंगे?
उन्हें हमेशा बिना कसूर के सज़ा मिलती है…
उनके हिस्से मे सिर्फ दर्द लिखा है? कुछ तो रहम करो भगवान..उनके गुनाह माफ कर दीजिए, उन्हें बख़्श दीजिए…”
कहते-कहते महक की आवाज़ कांपने लगी, और आँसू मंदिर की सीढ़ियों पर गिरते गए।
उस रात का खूबसूरत मंजर उसकी आँखों में घूम गया—
एक हंसी, एक नज़र, कुछ अनकहे वादे…
जाने कितनी यादें समेटकर वो फिर गाड़ी में आकर बैठ गई
“आप ठीक तो हैं, मैडम?” ड्राइवर ने झिझकते हुए पूछा।
“हाँ, ठीक हूँ… चलो,” उसने भारी आवाज़ में जवाब दिया।
“मैडम, गाड़ी में गाने लगा लूँ… अगर आप इजाज़त दें?”
“लगा लो…” महक ने धीमे से कहा।
रेडियो पर उद्घोषक की आवाज़ गूंजी—
“लीजिए, अब आपके सामने पेश है हेमंत कुमार और लता जी का गाना, ममता फिल्म से—
‘छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा, जैसे मंदिर में लो दिये की…’”
महक ने आँखें बंद कर लीं, सर सीट से टिका लिया।
दो आँसू उसके गालों पर लुढ़क आए।
काश .....जब भी मै मरने लगू, मौत से पहले मेरे पास देव जी आ कर बैठ जाए और हमेशा की तरह मेरे बालो को सहलाते हुए बोले..लेखिका जी, देखो पूर्णिमा का चांद।
फिर देव कहे "देखो महक ,इस पर इल्जाम मत लगाओ यह सिर्फ एक तबाह मिट्टी नही है, दो मोहब्बत करने वालों का गवाह है "
उस दिन हम दोनो फिर से एक साथ किसी चबूतरे पर बैठ के चांदनी मे नहाते हुए चांद को देखेंगे और एक गीत गुनगुनाये।
फिर देव मुझे अपने सीने से लगा ले उनकी दिल की धडकनों में सिर्फ अपना नाम सुनाई दे। मेरी धडकनें जब रुक जाये तब देव जी अपनी सफ़ेद रंग की शाल मेरे ऊपर डाल दे...मेरे चेहरे पर सुकून होगा।
उनके प्यार की जोत को दिल मे रख कर ले जाऊगी ना धड़कनो का शोर होगा ,ना बेवजह बहता रक्त। सफर बहुत लम्बा होगा ,अकेले ही तय करना होगा, सब से छुपा कर उनकी महोब्बत साथ ले जाऊगी।
जिंदगी मुझे जैसी भी दी है जी लूंगी पर मौत ऐसी ही देना ,सुकुन से भरी हुई।
महक चीखना चाहती थी,चिल्लाना चाहती थी हमेशा की तरह वापिस भाग कर देव को गले लगा कर कहना चाहती थी " रोक लो मुझे देव"
पर पूरा शरीर बेड़ियों से जकड़ा हुआ था ....सोनिया की धमकी से...परी और माधव को जान से मारने की धमकी से। महक डर गयी थी बहुत डर गयी। इस बात को राज रखने मे ही भलाई थी सबके लिए। मतलबी सोनिया अपने बेटे कान्हा की नही तो किसी और के बच्चों से क्या हमदर्दी रखती।
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रास्ता लंबा था, पर मन उससे भी लंबी दूरी तय कर रहा था—अतीत से वर्तमान तक।
कुछ लोगों को बिना कसूर के भी सज़ा भुगतनी पड़ती है। वो सिर्फ जिम्मेदारी निभाने के लिए पैदा होते है मोहब्बत करने के लिए नही..
अगर उन्हे गलती से मोहब्बत हो भी जाए , दिल् मे छुपा लेगे और जिम्मेदारी को चुनेंगे और उसे निभाएंगे
और उन लोगों में दो नाम थे—देव… और महक।
गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए उसने खुद से एक वादा किया—
वो हर जिम्मेदारी को दिल से निभाएगी, चाहे रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों न हो।
लेकिन… दो चीजें कभी नहीं भूलेगी—
देव जी के दिल की धड़कन…
और MTNL की वो घंटी,
जिससे एक मासूम मोहब्बत की कहानी शुरू हुई थी…
और खामोशी में खत्म हो गई।
क्या सच में खत्म हो गई या कुछ वक्त के लिए खामोश हो गई?
जानने के लिए पढ़ते रहे...
MTNL की घंटी
.....to be continued