Antarnihit 47 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 47

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अन्तर्निहित - 47

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“श्रीकृष्ण के चरित्र के विषय में बात करना किसी के भी सामर्थ्य की बात नहीं। तथापि इतना समझ लो कि कृष्ण जो भी करते थे; प्रकट रूप से करते थे। प्रेम भी प्रकट करते थे, शत्रुता भी। एक उदाहरण देता हूँ- 

एक अज्ञात युवती कृष्ण को पत्र लिखकर विनती करती है कि मेरी रक्षा करो। उसकी रक्षा हेतु कृष्ण शीघ्र ही अनेक योद्धाओं से युद्ध करने चल पड़ते हैं। शत्रुओं को परास्त कर उस युवती से कृष्ण विवाह भी करते हैं। उस युवती का नाम जानती हैं?”

“रुक्मिणी?”

“हाँ। रुक्मिणी के साथ ऐसा व्यवहार करने वाल कृष्ण किसी का त्याग कर सकता है क्या? किसी प्रेयसी को विरह में तड़पने को छोड़कर उसे जीवनभर वेदना देगा क्या? और वह भी ऐसी प्रेयसी कि जिसका कोई साकार या निराकार अस्तित्व ही नहीं है? हम कैसे लोग हैं जो किसी की अतृप्त वासना से भरी कल्पना को सत्य मानकर अपने ही आराध्य का अपमान करते हैं, चरित्र खंडन करके उसका आनंद लेते हैं? क्या हमारा आराध्य कृष्ण ऐसा चरित्र वाला है?” 

“नहीं। कृष्ण तो परम योगी थे। क्या ऐसे चरित्र की कथा और गीत आदि की रचना पर सर्वथा प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता?”

“इसका निर्णय न्यायालय करेगा। मैं सक्षम नहीं हूँ।” वत्सर ने कहा। 

“न्यायालय? अर्थात तुम्हारा तात्पर्य मुझसे है? मैं यह कार्य नहीं कर सकता। यह मेरे अधिकार क्षेत्र से परे है। और हाँ, यह भारत है। यहाँ किसी बात पर प्रतिबंध की बात करोगे तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर यह कवि – रचयिता, कलाकार आदि विराट आंदोलन करने निकल पड़ेंगे। मैं सत्य कह रहा हूँ न निहारिकाजी? सपन जी?”

न्यायाधीश के मुख से अपने अपने नाम सुनकर सपन और निहारिका स्तब्ध हो गए। न्यायालय में भी क्षणभर स्तब्धता व्याप्त हो गई। क्षणों के व्यतीत होते ही कपिल उठे, “महाशय। यह कांड मीरा की हत्या का है। वत्सर ने हत्या की है या नहीं? न्यायालय ‘राधा का अस्तित्व है या नहीं? राधा कृष्ण की प्रेयसी थी कि नहीं?’ जैसे विषयों पर चर्चा क्यों कर रही है? क्या न्यायालय को मूल बात से भटकाया जा रहा है? ऐसी निरर्थक चर्चा से न्यायालय का समय व्यर्थ ही नष्ट किया जा रहा है? इसे शीघ्र ही रोका जाए।”

हरीश ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “महोदय, राधा का तर्क तो आपने ही रखा था। इतने सारे व्यक्तियों को न्यायालय में राधा नाम पर तर्क रखने के लिए प्रस्तुत किसने किया? यह कथाकार, यह स्वामीजी, आदि किसके साक्ष्य हैं, कपिल जी? न्यायालय का समय तो आपने ही नष्ट किया है। इसका दंड आपको ही दिया जाना चाहिए।”

हरीश का तर्क सुनकर कपिल क्षुब्ध हो गए। स्वयं को परास्त प्रतीत करने लगे। निराश होकर मौन हो गया। बैठ गया। 

“कपिल महोदय, आपके शब्दों को न्यायालय की अवमानना मानकर मैं कुछ दंड घोषित करूँ उससे पूर्व कुछ कहना चाहते हो?”

“मैं क्षमा चाहता हूँ। दंड न देने की प्रार्थना करता हूँ। ऐसी बात पुन: कभी नहीं करूंगा।” कपिल ने कहा। 

“इस बार दंड नहीं दे रहा हूँ किन्तु आगे ध्यान रखना और बिना तर्क की कोई बात यहाँ न रखना।”

“जी महाशय।”

“जब आज न्यायालय में राधारानी के विषय में इतनी चर्चा हुई है, तर्क दिए गए हैं तब मैं भी वत्सर से एक संशय के विषय में जानना चाहूँगा। वत्सर, क्या तुम मेरे संशय का समाधान करोगे?”

“महाशय, श्री कृष्ण की कृपा होगी तो।”

“मैंने सुना है, कहीं कहीं पढा भी है कि स्वयं ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण के साथ राधा जी का विवाह करवाया था। क्या यह भी मिथ्या है?”

“महाशय, जब कहीं भी राधा जी के होने का ही प्रमाण नहीं है तो श्रीकृष्ण जी के साथ विवाह कैसे हो सकता है? और यदि वास्तव में राधा जी का श्रीकृष्ण जी के साथ विवाह हुआ था तो कृष्ण पर लगे सभी आरोप / लांछन स्वत: निरस्त हो जाते हैं। कृष्ण ने राधा से अन्याय किया था वह बात ही मूल से मिथ्या हो जाती है। अब मैं आप पर छोड़ता हूँ कि राधा का अस्तित्व मिथ्या था या श्रीकृष्ण पर लगे आरोप मिथ्या हैं?”

“मुझ पर क्यों छोड़ते हो?”

“आप न्यायाधीश हैं, न्याय करना – निर्णय करना आपका कर्म है। आपको ऐसा करने का अभ्यास है। आप ही निर्णय कर सकते हो।” 

“इस बात का निर्णय तो मैं नहीं कर सकता किन्तु आज न्यायालय का समय सम्पन्न होने को है। कपिल महोदय, अब कोई प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हो या मैं मीरा कांड का निर्णय घोषित करूँ?”

“महाशय, वैसे हमारे समक्ष कोई सीधे प्रमाण उपलब्ध नहीं है किन्तु इससे वत्सर पर लगा अभियोग मीट नहीं जाता है। अभी भी वह मुख्य अभियुक्त है। अत: न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि हमें वत्सर का न्यायिक कारावास प्रदान करें।”

“कोई विशेष कारण?”

“अभियुक्त वत्सर एक चतुर और चालाक व्यक्ति है। वह पूर्ण सहयोग नहीं कर रहा। अत: प्रस्ताव है कि हमें वत्सर का डीएनए परीक्षण, लाई डिटेक्टर परीक्षण, नार्को परीक्षण तथा आवश्यकता पड़ने पर ब्रैन मेपिंग और हिप्नोटिज्म की प्रक्रिया की भी अनुमति दी जाए।”

“महाशय, सर्वोच्च न्यायालय के 2010 के निर्णय अनुसार संविधान के आर्टिकल 20(3) अंतर्गत व्यक्ति के मूलभूत अधिकार के अनुसार अभियुक्त की सहमति के बिना ऐसे परीक्षण नहीं किए जा सकते। मैं ऐसे परीक्षणों के लिए सहमति नहीं देता हूँ।” हरीश ने प्रतिरोध किया। 

“महोदय कपिल, आपको यह तो सुविदित ही होगा कि अभियुक्त की सहमति के बिना इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। और उसने असहमति प्रकट की है।”

“किन्तु यह आवश्यक प्रतीत होता है।”

“मैं सभी परीक्षणों के लिए सज्ज हूँ, सहमत हूँ।” वत्सर ने कहा। 

“वत्सर, यह तुम्हारा अधिकार है। इसे सहमति न दो। यह तुम्हारे विरुद्ध प्रयोग होगा और तुम निर्दोष हो तो ...।”

“इसिलए ही मैं सहमति दे रहा हूँ, हरीश जी। मुझे संशय के किसी भी प्रकार से, किसी भी अंश से, किसी भी कारण से मुक्त होना है। मैंने मेरे कृष्ण को यह वचन दिया है।”

“महाशय, अभियुक्त ने सहमति दी है तो न्यायालय से अनुमति की अपेक्षा है।” कपिल ने आग्रह किया। 

“वत्सर, पुन: एक बार विचार कर लो। तुम अभी भी असहमत हो सकते हो। तो कहो क्या विचार है?” न्यायाधीश ने कहा। 

“मैं सभी परीक्षणों के लिए सहमत हूँ।”

“जैसी तुम्हारी इच्छा।” हरीश ने स्वयं को खींच लिया। 

“सभी परीक्षणों के लिए न्यायालय अनुमति देता है और आठ दिन में सभी परीक्षण पूर्ण करके न्यायालय में रिपोर्ट प्रस्तुत किया जाए।”