अभी तक आपने पढ़ा कि धीरे-धीरे पंकज और रितु के बीच प्यार गहराने लगा, जिसे बीना ने ईर्ष्या और शक की नज़र से देखना शुरू कर दिया। पंकज और रितु एक-दूसरे के करीब आते गए, जबकि बीना की ज़िद और जलन ने उसके भीतर शैतान को जन्म दे दिया। अस्पताल में पंकज ने रितु के परिवार को हिम्मत दी कि वे उसे फिर से जीने की चाह दिलाएँ और सामान्य जीवन देने की कोशिश करें। अब इसके आगे पढ़ें-
किशन के मुँह से लेकिन शब्द सुनते ही पंकज ने कहा, "लेकिन क्या, किशन? रितु मेरी थी, है और हमेशा रहेगी। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ; मैं उसे इस दलदल से बाहर ज़रूर निकाल लूँगा।"
किशन ने पंकज को गले से लगा लिया।
उसके बाद पंकज रितु के पास गया और उससे कहा, "रितु, तुम बिल्कुल चिंता मत करना सब ठीक हो जाएगा।"
रितु ने अब तक भी उसकी तरफ़ पीठ कर रखी थी।
उसने कहा, "तुम जाओ ... यहाँ से।"
"नहीं, रितु, मैं जाने के लिए नहीं बल्कि तुम्हारे साथ समय बिताने आया हूँ, दोस्त हूँ न तुम्हारा। रितु मेरी तरफ़ देखो तो सही," कहते हुए पंकज ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
हाथ का स्पर्श होते ही रितु काँप गई और ज़ोर से चिल्लाई, "मत छुओ मुझे! मैं अब उस लायक नहीं रही।"
घबराकर अपने हाथ को अलग करते हुए पंकज पीछे हट गया।
कुछ देर बाद वह संभला और धीरे से बोला, "रितु, संभालो अपने आप को। किसी पापी के पाप करने से हम दोषी नहीं बन जाते। यह समय डरकर मुंह छुपाने का नहीं है उठकर फिर से जीवन की नई शुरुआत करने का है।"
अब पंकज तन-मन से किशन के कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था।
अस्पताल में पंकज के बराबर आते रहने और रितु का ध्यान रखने को वहाँ पर रितु का परिवार महसूस कर रहा था।
रितु भले ही पंकज की तरफ़ ध्यान न दे रही थी, पर पंकज का पूरा ध्यान रितु पर ही था। वह तो अपने घर पर भी शादी की बात कर आया था और रितु की तस्वीर भी सबको दिखा चुका था। उसके लिए तो रितु उसकी होने वाली पत्नी थी।
लेकिन एक सवाल बहुत पेचीदा था ... क्या पंकज के माता-पिता अब उसे ऐसी लड़की से विवाह करने की अनुमति देंगे जिसके साथ पाँच लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया हो? भले ही पंकज सकारात्मक व्यवहार कर रहा था, पर माता-पिता के निर्णय का भय उसके दिमाग़ में नागिन की तरह फ़न फैलाए बैठा था। कब उनका निर्णय उसे डस देगा, यह वह नहीं जानता था; और वह ज़हर केवल पंकज के लिए ही नहीं, बल्कि रितु के लिए भी मौत के फरमान जैसा हो सकता था।
अस्पताल में तीन-चार दिनों तक इलाज़ होने के बाद डॉक्टर ने उन्हें घर जाने की अनुमति देते हुए कहा, " किशन, हमने अपना काम कर दिया है। तुम्हारी बहन की शारीरिक चोटों का इलाज़ तो हो गया है, लेकिन उसकी मानसिक तकलीफ़ों का इलाज़ तो अब तुम्हारे परिवार को ही करना होगा। उसका बहुत ध्यान रखना होगा। हर पल उस पर नज़र रखनी होगी, क्योंकि इस अवस्था में वह आत्महत्या की कोशिश भी कर सकती है।
और हाँ वह कौन है ...पंकज? मैंने भी सुना है कि वह रितु से प्यार करता है। यदि इस समय वह तुम्हारी बहन का साथ देगा तो रितु के लिए यह बहुत अच्छा होगा। हफ्ते भर बाद एक बार फिर रितु को फ़ॉलो-अप के लिए ले आना। दवाइयाँ समय पर देते रहना।
मैं भी एक लड़की हूँ, किशन, रितु की तकलीफ़, उसका दर्द और तुम्हारे परिवार की मानसिक स्थिति मैं अच्छी तरह समझ सकती हूँ। दो पल के अपने स्वार्थ के लिए कुछ नालायक लड़के किसी की पूरी ज़िंदगी बर्बाद कर देते हैं; समझ ही नहीं आता कि ऐसे लोग किस मिट्टी के बने होते हैं। शायद उन्हें संस्कार ही नहीं मिले होते, ऐसे लोगों को तुरंत ही फांसी पर लटका देना चाहिए। "
किशन ने कहा, "थैंक यू डॉक्टर, आप बहुत अच्छी हैं; वरना इतना समय आजकल के समय में कोई किसी को कहाँ देता है।"
✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः