अभी तक आपने पढ़ा कि इंस्पेक्टर दीक्षित ने रितु के घर वालों का पता लगाने की कोशिश की, लेकिन रितु ने बताने से इंकार कर दिया। बीना के फ़ोन से पंकज और रितु के परिवार का नंबर मिलने पर दीक्षित ने दोनों को सूचना दी। पंकज रितु से गहरा प्यार करता था और यह ख़बर सुनकर तुरंत शहर लौट पड़ा, जबकि रितु के भाई किशन और माँ-पिता यह सुनकर सदमे में आ गए। अब इसके आगे पढ़ें-
अपने बेटे किशन के मुँह से ये शब्द सुनकर कि सब कुछ ख़त्म हो गया है, तब रमन ने अपनी पत्नी के धड़कते दिल की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, "अरे तू ऐसा क्यों कह रहा है? साँसें चल रही हैं तेरी माँ की।"
किशन ने रमन की बात पर ध्यान ना देते हुए कहा, "बाबूजी शहर से पुलिस इंस्पेक्टर का फ़ोन आया था।"
"अरे तू यह क्या कह रहा है? साफ-साफ बता, क्या बात है?"
"बाबूजी... रितु जीजी का ..." किशन के मुंह से वह शब्द नहीं निकल पा रहे थे।
"कैसे कहूँ, बाबूजी," कहते हुए किशन अपने पिता के गले से लग गया और फफक कर रोते हुए कहा, "बाबूजी, रितु जीजी का सामूहिक बलात्कार हुआ है।"
"क्या ...?"
"हाँ बाबूजी।"
अपनी बेटी के लिए बलात्कार शब्द सुनते ही रमन को इतना ज़ोर का आघात लगा कि उन्हें अटैक आ गया।
किशन को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। तब तक आवाज़ सुनकर उनके पड़ोसी वहाँ आ गए। गाँव के खुले माहौल में एक दूसरे की दुःख तकलीफ़ का पता लगते ही मदद के लिए पड़ोसी पहुँच ही जाते हैं।
वहाँ का माहौल देखकर उनके पड़ोसी सुमन को लगा कि रमन को हृदयाघात हुआ है, इसलिए सब रो रहे हैं। अब तक बसंती को होश आ चुका था और वह भी रो रही थी।
किशन ने अपने पड़ोसी सुमन अंकल की मदद से रमन को अस्पताल में भर्ती करवाया।
उसने अपनी माँ बसंती से कहा, "माँ, मुझे तो जीजी के पास शहर जाना पड़ेगा। यहाँ मेरा दोस्त राहुल है, उसे बुला लेते हैं; वह आपकी मदद करेगा और सुमन अंकल भी हैं।"
"हाँ ठीक है बेटा, हम सभी को रितु के पास जाना चाहिए था, पर भगवान हमारी यह कैसी परीक्षा ले रहा है। तुम्हारे बाबूजी को इस समय अकेला छोड़कर मैं नहीं आ पाऊँगी। तू जा, उनकी तबीयत ठीक होते ही हम दोनों भी आ जाएँगे।"
डॉक्टर ने रमन को देखा और कहा, "माइल्ड अटैक आया है; चिंता की बात नहीं है। हमने दवाइयाँ दे दी हैं, उन्हें आराम की ज़रूरत है।"
लेकिन रमन को होश आते ही वह उठकर सीधे खड़े हो गए और कहा, "किशन, चलो हम शहर चलते हैं।"
एक बेटी जिसका बलात्कार हुआ हो, उसके माता-पिता और परिवार की कैसी हालत होती है, सोच कर ही रूह काँप जाती है और हाथ-पाँव ढीले हो जाते हैं।
रमन को इस तरह अचानक खड़ा होते देख डॉक्टर ने कहा, "रमन सर, आपको अटैक आया है, माइल्ड ही सही, पर हम अटैक को गंभीरता से लेते हैं। आपको आराम की सख्त ज़रूरत है।"
रमन ने कहा, "डॉक्टर साहब, यदि मैं नहीं जाऊँगा तो दूसरा अटैक आ जाएगा। मुझे जाने दीजिए, मेरा जाना बहुत ज़रूरी है।"
"ऐसी क्या मजबूरी है जो आपकी सेहत से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो?" डॉक्टर ने पूछा।
रमन ने कहा, "डॉक्टर साहब, कुछ बातें केवल अपने तक ही सीमित रखनी पड़ती हैं।"
डॉक्टर के लाख मना करने के बावजूद रमन मानने वाले नहीं थे। वे तीनों शहर के लिए निकल पड़े। दर्द से भरे उनके चेहरों पर केवल और केवल निराशा ही दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था मानो उनका सब कुछ नष्ट हो चुका है, अब शेष कुछ भी नहीं बचा। एक माँ-बाप और भाई के लिए उनकी बेटी और बहन की इज़्ज़त से बड़ा दुनिया में और कुछ नहीं होता, कुछ भी नहीं।
यदि भाई किशन की आँखों में नफ़रत और बदले की आग थी, तो माँ-बाप की आँखों में बेटी के लिए दर्द और चिंता बसी हुई थी। "समाज को क्या मुंह दिखाएँगे? रितु के विवाह का अब क्या होगा? उसका भविष्य अब कैसा होगा?" दोनों के मन में इस तरह के प्रश्नों ने हलचल मचा रखी थी। कोई किसी से कुछ नहीं कह रहा था; मानो मौन ने तीनों पर नियंत्रण कर रखा हो या जीभ कुछ भी कहना भूल गई हो।
बसंती सोच रही थी, "वे कैसी माँ होंगी जिन्होंने ऐसे कपूत पैदा किए? वे तो उन्हें संस्कार देना ही भूल गईं। यदि संस्कारों की घूंटी में स्त्री की इज़्ज़त करना सिखाया होता, तो बहन बेटी की इज़्ज़त करना सीख जाते। मेरी बच्ची पता नहीं किस हाल में होगी?"
✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः