Shadyantra - Part - 6 in Hindi Crime Stories by Ratna Pandey books and stories PDF | षड्यंत्र - भाग 6

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षड्यंत्र - भाग 6

अभी तक आपने पढ़ा कि रितु के बलात्कार की ख़बर सुनकर उसका भाई किशन और माता-पिता गहरे सदमे में चले गए। पिता रमन को दिल का दौरा पड़ा, पर होश आने पर भी वे बेटी के पास जाने की ज़िद पर अड़े रहे। परिवार दर्द, निराशा और समाज के डर से टूट चुका था, जबकि किशन के मन में बदले की आग और माता-पिता के मन में बेटी के भविष्य की चिंता थी। अब इसके आगे पढ़ें-

उधर अस्पताल में रितु को अब तक पूरी तरह से होश आ चुका था पर वह उसकी आँखों को किसी भी सूरत में खोलना ही नहीं चाह रही थी।

उसी समय डॉक्टर ने आकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "रितु, आँखें खोलो।"

किंतु रितु ने दूसरी तरफ़ मुँह फेर लिया।

उसकी पीड़ा को समझते हुए डॉक्टर ने कहा, "रितु जो कुछ भी हुआ उसमें तुम्हारी तो कोई गलती है ही नहीं। तुम्हें शर्मिंदा होने की कोई ज़रूरत नहीं है। जिनकी गलती है, शर्म उन्हें आनी चाहिए। वे सब जेल में बंद हैं।"

तब रितु ने आँखें खोलीं। उसी समय उसे किशन दिखाई दिया तो रितु उठ बैठी और किशन से लिपटकर इस तरह रोने लगी मानो कोई अभी भी उसे तड़पा रहा हो; वह किशन को छोड़ ही नहीं रही थी।

वह रोते-रोते कह रही थी, "किशन, मैं तो घर में ही थी... उन्होंने घर में ही, किशन, मैं अब जीना नहीं चाहती, मेरे भाई। मुझे अपने आप से नफ़रत हो रही है। उन गुंडों ने मुझे बर्बाद कर दिया। मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। इस दाग के साथ अब मैं किसी के सामने नहीं जा सकती।"

किशन की आँखों से भी आँसू रुकने वाले कहाँ थे। वह अपनी बहन के सिर पर हाथ फेर रहा था, परंतु रितु को समझाने के लिए उसके पास शब्द नहीं थे। आख़िर क्या कहता वह अपनी बहन से। यदि कोई चीज खो गई होती तो वह कह सकता था, "जीजी, चिंता मत करो, मैं दूसरी ले आऊँगा।" लेकिन जो कुछ भी खोया था, उसे तो अब भगवान भी वापस नहीं दे सकते थे। लूटने वाले सब कुछ लूटकर चले जाते हैं, पर लुटने वाला इस तरह लुट जाता है कि फिर कभी मन से आबाद नहीं हो पाता। इस दर्द को केवल उसका परिवार ही महसूस कर सकता है।

तभी रितु की नज़र अपनी माँ पर पड़ी और वह "माँ!" कहकर फूट-फूट कर रोने लगी। बसंती ने पास आकर उसे सीने से लगा लिया।

रमन को देखकर रितु ने फिर से अपनी आँखें बंद कर लीं, मानो वह उनसे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हो।

तब रमन ने पास आकर उसके दोनों हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, "मेरी बच्ची, हम सब हैं न? तू हिम्मत रख बेटा। तू रो मत; तू रोएगी तो हम सब टूट जाएंगे। तुझे टूटना नहीं है। तुझे एक बार फिर खड़ा होना है। तू अपनी आँखों को खोलकर रख। तुझे शर्मिंदा होने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। गलती तो ऊपर वाले की भी है कि उसने नारी को उतनी शक्ति तो देनी चाहिए थी कि वह ऐसे पापियों से अपनी रक्षा कर सके, उनसे ख़ुद ही निपट सके। क्योंकि अब दुर्योधन और दुशासन जैसे ही बचे हैं पर कृष्ण कहाँ हैं?"

तब तक किशन गुस्से में इंस्पेक्टर के पास गया और उसने पूछा, "इंस्पेक्टर मैडम, कौन हैं वे पापी? उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए ... या फिर आप उन्हें मुझे सौंप दीजिए, मैं एक-एक को मार डालूंगा।"

इंस्पेक्टर ने कड़े स्वर में कहा, "तुम्हारा इरादा क्या है? उन्हें मारकर फिर ख़ुद जेल में ज़िन्दगी बिताओगे? देखो किशन, होश से काम लो, जोश से नहीं। वे पाँचों हमारे थाने में हैं और उन्हें मार-मार कर उनकी चमड़ी उधेड़ी जा चुकी है; लेकिन इसमें सबसे बड़ी खल नायिका तो तुम्हारी बहन की मालकिन है।"

किशन ने चौंकते हुए पूछा, "क्या ...? ये क्या कह रही हैं आप?"

"मैं बिल्कुल ठीक कह रही हूँ।"

उसके बाद इंस्पेक्टर दीक्षित ने रमन और किशन को उस दिन का पूरा किस्सा सुना दिया। यह सब सुनने के बाद अब किशन के निशाने पर बीना भी थी।

✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः