Shadyantra - 3 in Hindi Crime Stories by Ratna Pandey books and stories PDF | षड्यंत्र - भाग 3

Featured Books
Categories
Share

षड्यंत्र - भाग 3

अभी तक आपने पढ़ा कि बीना ने कबूल किया कि वह पंकज से प्यार करती थी, लेकिन रितु के कारण उसका रिश्ता बिगड़ गया। ईर्ष्या और दुश्मनी में उसने रितु को हटाने के लिए सामूहिक बलात्कार जैसी घिनौनी योजना बनाई, ताकि पंकज कभी उससे शादी न करे और उसका रास्ता साफ़ हो जाए। अब इसके आगे पढ़ें-

बीना ने अपने जीवन की सच्चाई बताने के बाद ख़ुद को निर्दोष बताते हुए कहा, "इंस्पेक्टर मैडम आप लोग अपना समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं? आप लोग मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते, क्योंकि बलात्कार मैंने थोड़ी किया है? आप उन बलात्कारियों को सजा दो; आप लोग यहाँ क्यों आए हो?"

इंस्पेक्टर ने बड़े ही व्यंगात्मक अंदाज़ में कहा, "मैडम जी, बड़ी गलतफहमी है आपको। यदि आपने षड्यंत्र रचा था तो आप भी गुनहगार ही हुईं। एक लड़की के ऊपर सामूहिक बलात्कार करवाने का इल्ज़ाम कितना खतरनाक होता है, शायद तुम इसे नहीं जानती। वह लड़की तो अभी तक अस्पताल में बेहोश पड़ी है। अब तक उसका कोई भी रिश्तेदार नहीं आया है। क्या तुम बता सकती हो कि उसके माँ-बाप कहाँ रहते हैं?"

बीना ने कहा, "वे सब तो किसी गाँव में रहते हैं और रितु हमारे घर में ही रहती है।"

"और वह लड़का क्या नाम बताया था तुमने?"

"जी पंकज।"

"हाँ पंकज, वह अभी तक क्यों नहीं आया उससे मिलने?"

तभी इंस्पेक्टर का माथा ठनका और विस्मय भरी नज़रों से उसने बीना की तरफ़ देखते हुए कहा, "बहुत बड़ी चाल चली है तुमने, उसे तो यह सब पता ही नहीं होगा। लाओ, मुझे तुम्हारा फ़ोन दो।"

बीना ने बौखलाते हुए पूछा, "मेरा फ़ोन ...? पर क्यों?"

इंस्पेक्टर ने उसके हाथ से फ़ोन छीनते हुए कहा, "अब यह फ़ोन हमारे नियंत्रण में रहेगा; इसमें से हमें उस पंकज का नंबर भी मिल जाएगा। तुम्हें पता ही नहीं कि तुम्हारे घर में काम करने वाली उस लड़की की हालत कितनी नाज़ुक है। बड़ी बेरहमी से पेश आए थे वे धूर्त। मैं उन्हें उनके कर्मों की सज़ा दिलवा कर रहूँगी। वह लड़की बचेगी या नहीं, यह तो डॉक्टर ही बता सकते हैं। भगवान करे वह बच्ची बच जाए, परंतु कहीं वह मर गई, तो उसकी मौत की ज़िम्मेदार तुम भी होगी। चलो हमारे साथ, हम तुम्हें गिरफ्तार कर रहे हैं।"

बीना ने कहा, "देखो इंस्पेक्टर, मुझे गिरफ्तार करके तुम्हें क्या मिलेगा? परंतु यदि मेरा साथ देकर मुझे बचाओगे, तो मालामाल हो जाओगे। वह लड़के तो मेरी मुट्ठी में हैं; मैं जैसा चाहूँगी, वे सब वैसा ही बोलेंगे।"

इंस्पेक्टर दीक्षित ने कठोर स्वर में कहा, "गलतफहमी में हो तुम। तुम्हें क्या लगता है तुम्हारे फेंके टुकड़ों से मैं कुत्ते की तरह दुम हिलाते हुए तुम्हारी बातों में आ जाऊँगी। मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ जो स्त्री होकर दूसरी स्त्री को नर्क के दलदल में ढकेल दे। रहा सवाल उन लड़कों का तो पुलिस के डंडे के आगे अच्छे-अच्छे सूरमा दम तोड़ देते हैं तो उन लड़कों की औक़ात ही क्या है!"

इसी बीच, इंस्पेक्टर दीक्षित के फ़ोन पर अस्पताल से डॉक्टर का कॉल आता है।

फोन उठाते ही डॉक्टर ने कहा, "हैलो, इंस्पेक्टर दीक्षित! वह लड़की होश में आ रही है। होश में आते ही उसने कहा था ... 'मुझे छोड़ दो।' और फिर कहा ... 'बीना मैडम, प्लीज़ मुझे बचा लो। यह लड़के मेरे साथ ...' इतना कहकर इसके बाद वह फिर बेहोश हो गई।"

इंस्पेक्टर दीक्षित ने कहा, "ठीक है, हम तुरंत वहाँ पहुँचते हैं।"

इंस्पेक्टर दीक्षित और उसके साथी जल्दी ही अस्पताल पहुँच गए। वहाँ जाकर उन्होंने रितु को देखा ... वह बार-बार तड़प रही थी और तड़पते हुए कह रही थी, "बीना मैडम, मुझे बचा लो!"

इंस्पेक्टर ने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "रितु, तुम अब घबराओ मत। तुम्हें कुछ नहीं होगा। तुम जल्दी ही ठीक हो जाओगी। क्या तुम अपने घर का फ़ोन नंबर बता सकती हो?"

रितु ने कहा, "नहीं-नहीं, मेरे घर पर यह बिल्कुल मत बताना। मेरे माँ-बाप बिना मरे ही मर जाएंगे। मेरा भाई तो गुस्से से पागल ही हो जाएगा। वह पता नहीं क्या कर बैठेगा।"

✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः