अभी तक आपने पढ़ा कि रितु होश में आने के बाद शर्म और पीड़ा से टूटकर अपने भाई किशन और माँ से लिपटकर रोने लगी। परिवार उसे संभालने की कोशिश करता है, पर उसकी बेबसी और दर्द सबको तोड़ देता है। किशन बदले की आग में जल रहा है, जबकि इंस्पेक्टर दीक्षित बताती हैं कि असली षड्यंत्रकारी रितु की मालकिन बीना है, जिससे अब किशन का गुस्सा और बढ़ जाता है। अब इसके आगे पढ़ें-
इंस्पेक्टर दीक्षित से बात करने के तुरंत बाद पंकज भी गाँव से निकल चुका था। गाँव दूर होने के कारण उसे आने में काफ़ी वक़्त लगा। जब वह शहर पहुँचा तो उसके दोस्तों ने उसे अस्पताल पहुँचने से पहले ही सब कुछ बता दिया। रितु और बीना के झगड़े वाली बात से लेकर झगड़े का असली कारण, स्वयं पंकज ही है, यह भी बता दिया।
इस समय पंकज को बीना से नफ़रत हो रही थी। उसे वह एक ऐसी घिनौनी बीमारी लग रही थी जो इंसान को खा जाती है और यदि समाज में फैल जाए तो बर्बादी, क़यामत ढाती है। पंकज अपना संयम खो चुका था; वह सबसे पहले बीना के घर पहुँचा, पर वहाँ कोई नहीं था। फिर वह थाने गया, जहाँ बीना को कुछ समय पहले ही लाया गया था।
पंकज थाने पहुँचा और जैसे ही उसने बीना को देखा, उसका गुस्सा फट पड़ा। बीना ने भी पंकज को देख लिया। वह कुछ भी कहती उससे पहले ही पंकज ने आकर उसके गाल पर एक चांटा जड़ते हुए कहा, "अरे, तूने किस नापाक इरादे को समेट कर अपने अंदर भर रखा था? तू क्या समझती है कि तूने जो कुछ भी किया या करवाया है उससे मेरा प्यार रितु के लिए ख़त्म हो जाएगा? और तेरा रास्ता साफ़ हो जाएगा? अरे, यह सब गलतफहमी है तेरी। रितु आज भी मेरी है और हमेशा रहेगी, समझी? तू कल तक मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी, हाँ सिर्फ़ दोस्त। लेकिन अब से मेरा तुझसे बड़ा कोई दुश्मन इस दुनिया में नहीं है। मैं तुझसे नफ़रत करता हूँ, सिर्फ़ नफ़रत।"
पंकज की बातें सुनकर बीना निःशब्द थी। हताश और हैरान होकर वह उसे केवल देखे जा रही थी। उसने जिसे पाने के लिए इतनी बड़ी साज़िश रची थी, वही उससे दूर जा रहा है और नफ़रत कर रहा है।
उसने कहा, "पंकज, मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ; तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगी।"
पंकज कड़क कर बोला, "तो मर जाना था ना? तूने तो उस बेचारी को जीते जी ही मार डाला है। अब मैं उसे जीना सिखाऊँगा; वह फिर से हँसेगी। तूने कभी सोचा है, एक बलात्कार के बाद उस परिवार की, जिसकी बहन / बेटी शिकार बनी हो, उनकी कैसी ज़िंदगी हो जाती है? मुझे मेरे साथियों ने उसके परिवार के विषय में बताया है। रितु के माँ-पापा का रो-रो कर बुरा हाल हो रहा है, ज़रा जाकर देख। सुना है उसका भाई बदले की आग में जल रहा है। अभी तो मैं रितु के पास जा रहा हूँ; तुझे तो मैं बाद में देख लूँगा।" इतना कहकर पंकज सीधे अस्पताल के लिए निकल गया।
पंकज को अस्पताल पहुँचते ही बिस्तर पर दर्द से कराहती अपनी प्रियतमा दिखी तो उसकी आँखों में मानो रितु का दर्द उतर आया। आँखें दर्द से भरे आँसुओं को बहाती ही जा रही थीं।
रितु के पलंग के पास उसका पूरा परिवार बैठा अपनी क़िस्मत पर रो रहा था। पंकज को तो कोई भी वहाँ पहचानता नहीं था। लेकिन रितु ने एक बार किशन को फ़ोन पर पंकज के बारे में बताया था। उसने कहा था, "किशन, यहाँ एक लड़का है ...पंकज। वह मेरी मैडम का दोस्त है; वह मुझे पसंद करता है, पर मुझे डर लगता है कहाँ वह और कहाँ हम?"
किशन ने पूछा, "तुम्हें क्या लगता है, जीजी? तुम्हारा मन क्या कहता है उसके लिए?"
रितु ने जवाब दिया, "सच कहूँ किशन तो मुझे भी वह अच्छा लगता है।"
"तो फिर आगे क्या इरादा है, जीजी?"
"देख, किशन, लड़का तो अच्छा है, लेकिन मुझे अभी कहाँ शादी करनी है। मुझे तो पहले तेरा भविष्य बनाना है, तेरा घर बसाना है; उसके बाद अपने लिए सोचूंगी।"
✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः