Shrapit ek Prem Kahaani - 78 in Hindi Love Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 78

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 78

निलु के इतना कहने पर गाड़ी अपने आप रुक जाती है। गाड़ी रुकने के बाद निलु गुस्से से कहता है। 

रुक तुझे अभी बताता हूँ। 

इतना बोलकर निलु गाड़ी से उतरता है तो वो हैरान हो जाता है। निलु की आंखे फटी के फटी रह जाता है। क्योकी निलु जहां पर पहले था उसकी गाड़ी अब भी वही पर थी। ये सब दैखकर निलु बहोत घबरा जाता है । उसे समझ मे नही आता है के ये सब क्या हो रहा है। निलु कहता है।

 य.…य....ये कैसे हो सकता है। मैने खुद गाड़ी को आगे बड़ते हूए दैखा है। जो पिछे से कोई गाड़ी को धक्का लगा रहा था। पर ....!

 इतना बोलकर निलु घबराते हूए इधर उधर दैखने लगता है। पर वहां उसे उसके अलावा और कोई नही दिखाई देता है़ । 

निलु अपने गाड़ी के हेंड ब्रेक को जाकर चेक करता है और फिर गाड़ी को धक्का लगाता है पर गाड़ी ब्रेक मे होने के कारण उसी जगह पर है। निलु कहता है :

ये कैसे हो सकता है जब मैं गाड़ी के अंदर के था तब गाड़ी अपने आप चल रही थी और अब गाड़ी उसी जगह पर है ये कैसे हो सकता है। 

 निलु इतना सौच ही रहा था के तभी फिर से उसी आदमी के रोने की आवाज दोबारा से आने लगता है।

निलु को ये सब अजीब लग रहा था और डर भी लग रही था। उस आदमी के रोने की आवाज और तेज हो जाती है। निलु घबराते हूए कहता है। 

मैं वहा पर जाकर दैखता हूँ के आखीर वहां पर कौन और क्यों रो रहा है। 

इतना बोलकर निलु धिरे धिरे डर से आगे बड़ता है। पर अंधेरा बहुत ही ज्यादा होने कारण उसे कुछ दिखाई नही दे रहा था। निलु उस आवाज का पिछा करते हूए आगे बड़ता जा रहा था पर रोने की आवाज भी उससे उतनी ही दुर होते जा रहा था। निलु उस आवाज तक पहूँच ही नही पा रहा था । ऐसे आवाज का पिछा करते करते निलु काफी दुर तक चला जाता है।

 तब वह थोड़ा घबराता जाता है और डरते हूए कहता है।

 ये ...ये ...! क्या हो रहा है। मैं जितना उस आवाज तक पहूँचने की कोशिश कर रहा हूँ मैं पहूँच ही नही पा रहा हूँ । कही ये कुम्भन तो नही । 

कुम्भन का नाम लेते ही फिर से रोने की आवाज और तेज हो जाती है अब ऐसा लग रहा था जैसै वह आवाज अब धिरे धिरे निलु के पास ही आ रहा हो निलु घबरा कर पिछे अपने गाड़ी की और भागने लगता है। भागते भागते निलु ठौकर खाकर गिर जाता है । 

ओ मां मर गया रे। मेरा पैर ।

 निलु कराहते हूए अपना पैर को पकड़कर कहता है। 

जैसे ही निलु संभलकर उठका है तो निलु दैखती है के वही पास ही सड़क के किनारे एक आदमी बैठकर रो रहा था उसकी मुह दुसरी तरफ होने के कारण से निलु को उसका शक्ल नही दिख रहा था । निलु अपने घबराते हूए आवाज मे कहता है ।

 क.....ककक कौन ? कौन है वहां पर ।

 इतना बोलकर निलु धिरे से उस आदमी के पास जाकर खड़ा हो जाता है और उसके कंधे पर अपना हाथ रखकर कहता है। 

कौन हो भाई ! क्या हुआ है तुम्हे ? और तुम यहां इतनी रात इस भयानक जंगल मे अकेले बैठकर क्यो रो रहे हो ? 

निलु के पूछने पर भी वह आदमी कोई जवाब नही देता है।

 निलु मन ही मन सोचता है :

 अजिब आदमी है । मेरे इतना कहने पर भी कोई जवाब नही देता है बस रोये जा रहा है। 

निलु उसे गौर से देखे जा रहा था । निलु दैखता है के उस आदमी ने काले रंग के अजीब से कपड़े पहना हुआ है। जो दैखने मे बिल्कुल TV सिरियस मे राजा महाराजा जैसा लग रहा था ऐसा लग रहा था कोई ड्रामा वाले यहा आ गया हो । 

उसके पूरे शरीर पर बहोत सारे रत्न और आभूषण थे। जिसे दैखकर निलु हैरान था । निलु को लगा के शायद ड्रामा वालो ने इसका काम छिन लिया हो या फिर ये रास्ता भटक गया होगा। इतना बोलकर निलु दोबारा से उस आदमी को आवाज लगाता है और कहता है। 

अरे भाई सुन रहे हो । मैं तुम्हीं से कह रहा हूँ । कौन हो तुम । और तुम्हें क्या परेसानी है । 

निलु उस आदमी के कंधे को हिलाते हूए कहता है। निलु के इतना कहने पर वह आदमी उठता है और उठकर निलु की और दैखता है। और वो आदमी कोई और नही बल्की देत्य कुंम्भन था।

 पर निलु ने कभी कुंम्भन को नही दैखा था इसिलिए वो इस बात से अनजान था। कुंभ्मन निलु से कहता है। 

हे मानव कौन हो तुम और इतनी रात्री को यहां पर क्या कर रहे हो ? अपने घर जाओ । 

कुंम्भन की बात सुनकर निलु अपने दांत चियारते हूए कहता है। 

कमाल है । ये बात तो मुझे तुमसे पूछनी चाहिए के तुम यहां क्या कर रहै हो । कबसे तुम्हें आवाज लगा रहा हूँ और तुम हो के रोये जा रहे हो। और फिर तुम मुझसे कह रहे हो के मैं यहां क्या कर रहा हूँ । 

निलु की बात का जवाब देते हूए कुंभ्मन कहता है। 

हे मानव तुम्हें ज्ञात नही के तुम कहां और किसके सामने खड़े हो । इसिलिए तुम्हारे लिए अच्छा यही होगा के तुम सिघ्र ही यहां से चले जाओ। 

कुंभ्मन की अजीब तरह से के बोलने से निलु चिड़ कर कहता है। 

ओ भाई । पहले तो तुम अपने केरेक्टर से बाहर आओ ठीक है भाई। ये ..! हे मानव तुम किसे कह रहे हो। 

कुंभ्मन के अजीब भाषा के वजह से निलु कुंम्भन से कहता है।

 तुम कहां के हो भाई और कौन सी भाषा मे बात कर रहे हो भाई तुम अभी भी अपने उसी केरेक्टर मे हो क्या । और ये तबसे तुम हे मानव , कह रहे हो , ये सब क्या बोल रहे हो। 

निलु के बात का जवाब देते हूए कुंम्भन कहता है। 

मैं तुम्हे ही बोल रहा हूँ मानव । तुम यहां पर इतनी रात्री को किस कार्य से आए हो। देखो मानव मैं अपनी पुत्री के लिए बहोत चितिंत हूँ । मेरे से विवाद ना करो और यहां से चले जाओ। अन्यथा हे मानव कही तुम मेरे क्रोध का शिकार ना बन जाओ । 

निलु अपने सर को खुजाते हूए कहता है। 

अरे यार तब से मैं दैख रहा हूँ तुम्हारी सारी नोंटकी । हे मानव , कार्य , अन्यथा , क्रोध ये सब क्या लगा के रखे हो। मेरा नाम हे मानव नही । निलु है । निलु । समझे । मैं राजनगर गांव की रहने वाला हूँ । इतना ठीक है। अब जो मैं तुमसे पूछुगां तुम उसका जवाब दोगे। 

निलु अपनी बात को जारी रखते हूए कहता है।

 तुम यहां पर बैठकर रो क्यो रहे थे । क्या तु्म्हारे मालिक ने तुम्हें काम से निकाल दिया है ?

 निलु के इतना कहने पर कुंम्भनी नाराज बोकर कहता है। 

कौन और किसका मालिक और कैसा काम। 

निलु कहता है।

 अरे तुम किसी नाटक कंपनी मे काम  करते हो ना जहां से तुम्हें निकाला गया है।।

कुंभ्मन फिर कहता है। 

कौन सा नाटक किसका मालिक । हे मानव लगता है तुम ऐसे नही मानोगे। 

 कुंभ्मन की बात सुनकर निलु मन ही मन कहता है। 

लगता ये आदमी काम से निकाल देने के वजह से पागल हो गया है। या पहले से पागल था शायद इसिलिए इसका मालिक ने इसे नौकरी से निकाल दिया होगा।

 निलु कुंभ्मन को प्यार से समझाते हूए कहता है। 

देखो मैं जानता हूँ के तुम नाटक कंपनी मे काम करते हो क्योकी मुझे तुम्हारे ड्रेस को दैखकर पहले ही अंदाजा हो गया था। 

कुंभ्मन कहता है। ड्रेस ..? ये ड्रेस क्या वस्तु है।

 निलु चिड़ कर कहता है। 

अच्छा बेटा तो तुम्हें अब ड्रेस भी नही मालुम ।

 निलु अपनी जेब से एक बिड़ी निकालता है और उसे जलाते हूए कुंम्भन के कपड़े की और इशारा करके कहता है। 

ड्रेस मतलब कपड़े जो तुम पहने हूए हो उसे दैखकर तो ऐसा ही लगता है के तुम किसी नाटक कंपनी मे काम करते हो। इसिलिए पूछ रहा हूँ । पर अगर तुम्हें बताने मे शरम आ रही है तो कोई बात नही मत बताओ। 

निलु की बात सुनकर कुंम्भन गरजते हूए कहता है। 

हे मुर्ख मानव । कदाचित मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है के तुम मेरे वस्त्र की बात कर रहे हो।

 निलु बिड़ी का एक गहरी कस्त लगाकर कहती है। 

कदाचित , प्रतीत ! हे भगवान ये किस आदी मानव से पाला पड़ गया आज मेरा । इसकी आधी भाषा मुझे वैसे ही समझ मे नही आ रही है। लगता है नाटक कंपनी मे एक ही केरेक्टर का रोल प्ले कर करके इसका इसका भाषा भी वैसी ही हो गई है।

To be continue....1129