Shrapit ek Prem Kahaani - 73 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 73

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 73

कुंम्भन की बात सुनकर मांतक कहता है--

> मित्र क्या ये संभव है के एक देत्य कन्या को किसी 
मानव द्वारा बंधक बना लिया गया हो। क्या इस युग मे भी ऐसे मानव है जो हम देत्यो से भी ज्यादा शक्तीशाली है ? 

कुंभ्मन कहता है --

> पता नही मित्र। परतुं सत्य तो यही है के मुझे मेरी 
पुत्री इसी अवस्था मे मुझे यहां मिली थी । तो इसका अर्थ यही हुआ के के कोई शक्ती तो है जो मेरी पुत्री की शक्ती को पराजीत कर दिया है या छल किया है । 


कुंम्भन की बात को सुनकर त्रिजला कहती है---

> अगर उस समय कालदामु के रहते पुत्री कुंम्भनी पर 
कोई अपनी शक्ती का प्रयोग कर रहा था तो फिर कालदामु क्या कर रहा था । और अगर कालदामु ने ये सब दैखा है तो फिर उसने उस मानव के बारे मे क्यो नही बताया। और उसकी खोज क्यो नही किया ? और जब आप इस इतने वर्षो से इस जंगल मे बंदी थे तो उसने ये समाचार आज तक हमे क्यों नही दिया ताकी हम आपकी सहायता कर सके। कही ये सब कालदामु का किया तो नही है? 

त्रिजला की बात को सुनकर कुंभ्मन और मांतक दौनो ही गहरी सौच मे पड़ जाते है त्रिजला की बात का समर्थन करते हुए मांतक कहता है---

> कदापि तुम सत्य कह रही हो त्रिजला ! तुम्हे ये पहले ही सौचना चाहिए था मित्र। 

मांतक कुंम्भन की और दैखकर कहता है ।

कुंम्भन कहता है--
.> तुम ठीक कह रहे हो अब हमे इसकी गहन खोज करनी होगी । अपनी पुत्री के इस अवस्था के कारण मैं 
ये भूल गया था के कालदामु ने आज तक मुझे यहां से निकालने प्रयास का तक नही किया और ना ही कभी कोई खबर मुझतक पहुचानें की कोशीश की । 

कुंम्भन कुछ दैर सोच कर चुप रहता है और फिर मांतक की और दैखकर कहती है ---

> तो क्या ये सारा संड्यत्र कालदामु का है मित्र और हम उस मानव की खोज मे लगे है जिसका वास्तव मे 
कुंम्भनी के इस अवस्था का कारण है ही नही। परतुं मित्र इसमे कालदामु का क्या स्वार्थ हो सकता है । उसे ये सब करके क्या लाभ मिल सकता है। 

कुंम्भन मांतक से पूछता है --

> अब क्या किया जाए मित्र ?

कुम्भन की बात को सुनकर मातंक कहता है। 

 > मित्र तुम इस बात की चितां ना करो वो दुष्ट जहा कही भी होगा मैं उसे जरूर ढुंढ निकालुगां । परतुं मित्र हमे मानवों को कम नही आकना चाहिए क्योकी हमने जो यहां दैखा वो अति विचित्र था। जिसे मैने आजतक नही दैखा।

 कुम्भन हैरानी से पूछता है। 

. ऐसा क्या दैखकर लिया मित्र जो तुम्हे अति विचित्र लगा ।

 मांतक कहता है ।

> मित्र ! कल रात्री को मैं और त्रिजला वन के पास बैठकर पृथ्वी लोक की वातावरण का आंनद ले रहे थे के तभी वहा पर तीन युवक एक यंत्र जो उसका वाहन था पर सवार होकर आया जिसमे से प्रकाश निकल रही थी ताकी रात्री को उन्हे आगे का पथ दिखाई दे सके । परतुं मित्र सबसे आश्चर्य की बात तो ये है मित्र के वो एक अच्छी गति के साथ चल कर हमारे पास आकर रुक गई। पहले तो हम दोनो उस वाहन को दैखकर एक दम से चोंक गए । सभी वहां पर उस वाहन से उतर गए और अपने आपस मे कुछ बाते करने लगे। फिर अचानक से उस वाहन पर लात मारने लग जाता है लात मारने पर उस वाहन से एक अन्य प्रकार की ध्वनी और प्रकाश दौनो आने लगती है। और फिर सभी उस वाहन के उपर बैठ कर वहां से चला जाता है । मैने ऐसा विचित्र वाहन आज से पहले कभी नही दैखा। जिसका एक चक्र आगे और एक चक्र पिछे की और लगा परतुं मित्र सबसे विचित्र बात यह है के एक एक चक्र होने पर भी वह वाहन आराम से चल रही थी वो बिना गिरे क्या संतुलन थी उस वाहन की वाह । अन्यथा ऐसे वाहन तो ठीक से खड़ा भी ना हो पाए और संघ्र ही गिर जाए। इन मानवो ने पता नही कौन यंत्र का निर्माण किया है या किसी देवता से वरदान मे प्राप्त किया है। वरना इस तरह का वाहन तो पहले किसी रथी या महारथी के पास नही दैखा। 


मांतक की बात सुनकर कुंम्भन कुछ सौच कर कहता है। 

पता नही मित्र तुम किस तरह के यंत्र की बात कर रहे हो। मैं तो इतने वर्षो से यहां इस जंगल मे बंदी रहा हूँ तो इसिलिए मुझे इस तरह के यंत्र का कोई ज्ञान नही। हो सकता है के मानव भी ईश्वर से वरदान मे इस वाहन को मांग लिया हो और बहुत शक्तीशाली हो गया हो।

 कुंम्भन की बात पर मांतक कहता है। 

जो भी हो मित्र उससे हमे क्या हमे तो उस मानव को ढुंढना है जो पुत्री कुंम्भनी की मणी लेकर गया है और उसकी इस दशा का कारण है। 

मातंक कहता है ।

> सत्य कहा तुमने मित्र जिस किसी के कारण पुत्री कुंम्भनी की ये दशा हुई है । मैं उसका धड़ उसके सर से अलग कर दुगां। उसे ऐसी भयानक मृत्यु दुगां के उसकी आत्मा तक कांप उठेगी।

 कुंम्भन कहता है ।

> मै जानता हूँ मित्र के तुम जरुर सफल होगें मुझे पुर्ण विश्वास है तुम पर और तुम्हारी बुध्दि पर ।


 मांतक और त्रिजला जैसे ही वहां से जाने को होता है के तभी मांतक की नजर यज्ञ कुण्ड के पास मे रखी मानव खोपड़ी पर जाता है । जिसे दैखकर मातंक समझ जाता है के कुंम्भन ने नारंग को भी बुलाया है। मातंक यज्ञ कुण्ड के पास जाकर उस खोपड़ी और वहा पर रखी सामग्री को दैखकर पता कर लेता है के नारंग यहा पर आया था ।

 कुंम्भन भी समझ जाता है के मांतक को पता लग गया है के नारंग आया है। मांतक कुछ कहता इससे पहले कुंम्भन मातंक से कहता है। 

> मित्र तुम जो सौच रहे हो वो सत्य है । मैने नारंग को बुलाया है। 

कुंभ्मन के मुह से नारंग का नाम सुनकर मातंक नाराज हो कर कहता है।

> मित्र मुझ-पर तुम्हारा बस इतना ही विश्वास था जो तुम्हे नारंग को भी बुलाना पड़ा। क्या मैं उस दुष्ट को ढुंढमे मे सझम नही ? मित्र क्या तुम्हे अब ऐसा लगने लगा के तुमने मुझपर ये कार्य सौंपकर भूल किये हो। 

मातंक की बात का कुंभ्मन जवाब देते हूए कहता है। 

> नही नही मित्र मुझे गलत मत समझो मे तो बस तुम्हारा कार्य को औक सरल करने के लिए ही नारंग को बुलाया है ताकी तुम्हे मेरे लिए और कष्ट ना सहनी पड़े। 

मांतक कहता है । 

> वाह मित्र वाह ! क्या कुंम्भनी मेरी पुत्री नही है मित्र ! जो मैं उसके लिए इतनी सा कष्ट भी ना सहन कर सकू तो फिर मित्र अगर तुम ऐसे सोचते हो तो धिक्कार है मित्र मेरे उपर और मेरे मित्रता पर। के मैं समय आने पर अपने मित्र का दिया हुआ कार्य पूर्ण नही कर सका। 

कुंम्भन मातंक के पास आकर कहता है। 

> ऐसा मत कहो मित्र । ईश्वर के लिए ऐसा ना कहो। 
इश्वर जानता है मित्र के मैं तुमपर अपने आप से भी ज्यादा भरोसा करता हूँ । मित्र मेरे बात को समझो वो दुष्ट जो कोई भी है बहोत ही चालाक है। उसे ढुंढना इतना सरल नही है। इसीलिए मैने नारंग को यहां पर बुलाया है ताकी नारंग यहा रहकर तुम्हारा भी सहायता कर दे। और मांतक के पास भी सभी प्रकार के बंधन को भैदने का उपाय पता है। इसिलिए मित्र मैने तुम्हे और फिर मांतक को भी बुलाकर ले आया। ताकि तुम्हारा कार्य भी सरल बन जाए । 

मांतक कहता है । 

> ठिक है मित्र । जैसा तुम कहो। 

इतना बोलकर मातंक और त्रिजला फिर से पक्षी का रुफ धारण करके वहां से उड़कर चला जाता है। मातंक और त्रिजला के जाने के बाद कुंम्भन सौच मे पड़ जाता है के क्या सही मे सेनापति कालदामु इस तरह का कार्य कर सकता है। तब कुंम्भन को त्रिजली की कही बात को याद करता है । 

त्रिजला कहती है। 

. जब आप इतने वर्षो से यहां पर बंद तो फिर कालदामु ने इसकी सुचना हम तक क्यो नही पहूँचायी और फिर इस संकट मे वो किसी और से भी सहायता क्यो नही मांगी ।