वामन देवता के पैर बिल्कुल छौटे छोटे थे। जिसे दैखकर राजा बली हैरान होकर कहने लगे।
" हे वामन देवता आपके अपने लिए मात्र तीन पैर जमीन मांगना जिसे सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य लगा क्योकी आपके इतने छोटे छोटे पैर से तीन पैर जमीन लेकर क्या किजीएगा अगर आपको मांगना ही है तो सोना , चाॅदी , किमती रत्न वस्त्र ये सब मांगिए। "
राजा बली के कहने पर भी वामन देव हल्की मुस्कान के साथ कहता है --
> राजन मुझे मुझे इन सब वस्तुओं की कोई आवश्यकता नही है मुझे केवल तीन पैर जमीन ही चाहिए।
सभी वामन देव के बात पर हैरान थे और वे ये सौच रहे थे के वामन देव अपनी इतनी छोटे छोटे पेरो से मात्र तीन पैर जमीन लेकर केसा करेगें । राजा बली के कहने पर भी जब वामन देव ने ये कहा के उन्हें सिर्फ तीन पैर जमीन ही चाहिए तब दानवीर राजा बली ने दान कर दिया। उसके बाद वामन देव ने अपना विशाल रुप धारण किया और दौ ही पैर मे पुरी शृष्टी को नाप लिया और एक पैर बाकी रह गया तब वामन देव कहता है--
> हे राजन मैने अपने दोनो पैरो से ही पुरी शृष्टी को ही नाप लिया । अब मेरे पास एक पैर और बची है मैं
इससे कहां रखु ?
राजा बली ने कहां आप अपना पैर मेरे मस्तक पर रखिए ।
तब वामन देव ने राजा बली के मस्तक पर अपना तीसरा पैर भी रख दिया और उन्हें पाताल लेकर चले आए। और तब भगवान वामन देव ने राजा बली से कहा --
> मैं तुम्हारे दान पुण्य से बहुत प्रसन्न हूँ इसिलिए मैं तुम्हें तुम्हारा राज्य वापस लौटा रहा हूँ । इतना बोलकर वामन देव वहां से अपना लोक को चले गए और हम सभी देत्य अपने लोक मे रह गए।
कुंम्भनी कहती है ---
> अच्छा तो इतने सारे राज छिपे थे हमारे यहां इस
लौक मे रहने के पिछे।
कुंम्भनी तब कुंभ्मन से कहती है---
> पिताश्री क्या आप कभी पृथ्वी लौक मे गए हो ?
कुम्भनी की बात का कुंम्भन उत्तर देते हुए कहता है --
> हां पुत्री कई बार गया हूँ। परतुं बहोत वर्ष पहले गया हूँ । कितुं पुत्री तुम अचानक से ये पृथ्वी लोक के बारे मे क्यों पूछ रही हो ?
कुंम्भनी हिचकिचाते हूए कहती है--
> वो पिताश्री मैने देत्य लोक मे बहुतो से पृथ्वी लोक की सुंदरता के बारे मे सुनी हूँ के वहा की प्राकृतिक
सुंदरता बहुत मन मोहक हे़ै। और वहां पर अभी भी असुर देवता और परीयां भी आती रहती है। इसिलिए पिताश्री मैं .....भी ...! मैं भी वहां पर जाना चाहती हूँ ।
कुंभ्मनी के पृथ्वी जाने की बात पर कुंम्भन पहले थोड़ा सा हैरान हो जाता है फिर कुंम्भनी से पूछता है --
> परतुं पुत्री यू अचानक से तुम्हें पृथ्वी क्यों जाना है ? और पुत्री पहले की बात और थी और अब की बात और है ।
> वो क्यू पिताश्री ?
कुंम्भनी पूछती है--
कुम्भन कहता है---
> क्योकी पुत्री अभी कलियुग जल रही है। और तब कहा था के इसी कली युग मे जितने भी मनुष्य रहेगें कली के प्रभाव से सभी के मन मै सिर्फ पाप ही रहेगी । और अभी कलियुग है पता नही पुत्री वहां पर मानव कैसे निवास करते होगें । इसिलिए पुत्री पृथ्वी लोक जाने के बारे मे विचार नाही करों तो अच्छा है। क्योकी अभी के मानव के बारे मे मुझे ज्यादा जानकारी नही है।
पर कुंम्भनी पृथ्वी लोक जाने की जिद करती रही । जब कुंम्भन के बहोत समझाने पर भी कुंम्भनी नही माना तब मृदुला कुंम्भन से कहती है--
> स्वामी जब पुत्री इतनी जिद कर रही है तो जाने
दिजिए ना । और फिर हमारी शक्तीयों के आगे कोई मानव कहां टिक पाएगा। और आप कुंम्भनी के साथ सेनापति कालदामु को भेज दिजिए। वो पृथ्वी लोक पर जाते रहते है। उन्हे ये ज्ञात होगा के पृथ्वी लोक के निवासी अब कैसे है।
मृदुला के कहने पर कुंम्भन कुंम्भनी को पृथ्वी लोक जाने की अनुमति दे देता है। पिता की अनुमती पाकर बहुत प्रसन्न होती है और अपने पिता के गले लग जाती है। कुंभ्मन अपनी पुत्री कुंम्भनी से कहता है--
> पुत्री ..! मैने तुम्हे वहां पर जाने की अनुमति भले ही दे दी है । परतुं मेरी कुछ शर्त है।
> कैसी शर्त पिताश्री ?
कुंम्भनी हैरानी से पुछती है।
तब कुंभ्मन कहता है--
> यही शर्त के तुम वहां पृथ्वि पर अकेली नही जाओगी। तुम्हारे साथ हमारा सेनापति कालदामु भी जाऐगा।
कुंम्भनी कहती है--
> जैसा आप ठीक समझो पिताश्री !
कुंभ्मन कुंम्भनी के पास जाकर कुंम्भनी के माथे पर अपना हाथ फेरते हुए थोड़ा भारी आवाज मे कहता है--
> पुत्री ..! पता नही क्यो मुझे कुछ ठिक नही लग रहा है। तुम्हें वहां जाने देने की अनुमति तो दे दी पुत्री । परतुं मेरा मन पता नही क्यों नही मान रहा है।
कुंम्भनी कहती है --
> पिताश्री आप बिल्कुल निश्चंत रहिए । मैं वहा पर ऐसी कोई गलती नही करुगीं के मुझे वही पर कोई परेसानी हो। मैं अपनी पहचान और अपनी शक्ती को सबसे छुपा कर रखुगीं।
कुंम्भनी की बात पर कुंम्भन कहता है--
.> पुत्री पृथ्वी अब पहले जैसी नही रही । युग बदल गए । मानव बदल गए । पता नही अब वहा पर कैसे कैसे मानव रहते होगें । सुना है के वहां के मानव बहुत ही स्वार्थी हो गए है। इसिलिए पुत्री सिघ्र जाना और सिध्र ही वापस आ जाना। वहां पर ज्यादा दैरी मत करना। और अपने पहचान को वहा पर गुप्त ही रखना।
कुंम्भनी अपनी पिता की चितां को दैखकर कहती है---
> पिताश्री ! आप बिल्कुल भी चितां ना करे मैं अपने आप को गुप्त ही रखुगीं और सिघ्र ही लौट कर आ जाऊगीं।
कुंम्भनी की बात को सुनकर कुंम्भन एक गहरी सांस लेता है। और अपने एक सैनीक को आवाज देकर बुलाता है।
" द्वारपाल । सेनापति कालदामु को बुलाया जाए। "
द्वारपाल ने अपना सिर को झुकाए कहता है--
> जो आज्ञा माहाराज ।
इतना बोलकर द्वारपाल कालदामु को बुलाने के लिए वहां से चला जाता है़ । और कुछ दैर बात कालदामु वहां पर आ जाता है। और अपना सिर को झुकाए कुंम्भन से कहता है---
> माहाराज की जय हो । महाराज कुछ विषेस कार्य है क्या जो आपने मुझे यहां आने की आज्ञा दी।
कुंभ्मन कहता है--
> हां कालदामु ! एक कार्य आ गयी है। जिलके लिए मैं केवल तुमपर भरोसा कर सकता हूँ।
कुंम्भन की बात को सुनकर कालदामु कहता है --
> आपकी बहोत कृपा है महाराज जो आपने मुझे इस
लायक समझा।
कुंभ्मन कहता है--
> मेरी पुत्री कुंम्भनी पृथ्वी लोक पर जाने की हठ कर रही है । वो ये दैखनी चाहती है के हमारे पूर्वज वहा पर कैसे रहते थे कहा रहते थे और पृथ्वी कैसी दिखती है वहां के लोग कैसे है। ये सब कार्य तुम्हे करना है। क्योकी मैने कुंम्भनी को पृथ्वी लोक जाने की अनुमति दे दी है। और मैं उसे अकेली जाने की अनुमती नही दे सकती । तो इसिलिए मैं तुम्हे वहां पर पुत्री कुंम्भनी के साथ उसकी सुरक्षा कवच बनकर जाओगे। क्योकी तुम पृथ्वी पर जाते रहते हो इसिलिए तुम्हे वहा का ज्ञान है तो मेरी पुत्री की सुरक्षा का प्रबंध भी तुम ही करोगे। मेरी पुत्री को वहा पर किसी भी प्रकार की कोई कष्ट या किसी प्रकार का कोई हानी ना हो इस सब सुरक्षा का प्रबंध तुम्हे ही करना है।
कुंम्भन की बात को सुनकर कालदामु कहता है---
> जैसी आपकी ईच्छा महाराज। आप बिल्कुल भी चितां ना करे मैं राजकुमारी के साथ उनकी ढाल बन कर रहूगाॉ और राजकुमारी पर किसी भी प्रकार की विपत्ति को आने से पहले उसे कालदामु से सामना करना होगा ।
कालदामु की बात को सुनकर कुंभ्मन निश्चंत हो जाता है और खुश होकर कालदामु और कुंम्भनी को जाने की अनुमति दे देता है। कालदामु राजकुमारी कुंभ्मनी के जाने का प्रबंध करने के लिए वहां से चला जाता है। कुंम्भनी अपनी माता मृदुला और पिता कुंम्भन के गले लगकर वहां से पृथ्वि लोक को चली जाती है। इतना बोलने के बात कुंम्भन अपने उस पल से अपने वर्तमान पल मे आ जाता है।
जहां पर कुंम्भन त्रिजला और मातंक जंगल मे थे। कुम्भन कहता है--
> कुृछ दिन बित जाने के बाद एक दिन अचानक से
कालदामु मेरे पास आता है जो बहुत ही घबराया हुआ था।
मेरे पुछने पर कालदामु कहता है--
> महाराज । अनर्थ हो गया महाराज । अनर्थ हो गया । कुंम्भन कालदामु को घबराया हुआ दैखकर कहता है।
क्या हुआ किस अनर्थ की बात कर रहे हो तुम और तुम तो कुंभ्मनी के साथ पृथ्वी लोक गए छे ना तो फिर तुम यहां क्या कर रहे हो ? पुत्री कुंम्भनी कहां है ?
कालदामु कहता है --
> महाराज कुंम्भनी को कुछ मानवो ने बंधक बना लिया है।
कुंम्भनी को बंधक ब जाने की बात को सुनकर कुंभ्मन की आंखे गुस्से से लाल हो जाता है। और कुम्भन से कहता है--
> क्या ...! ये कैसै संभव है। ये नही हो सकता है। एक देत्य कन्या को एक साधारण मानव कैसे बंधक बना सकता है ? वो भी कालदामु तुम्हारे जैसे विरोचन के रहते हूए । ये मैं कैसे मान लु । अगर ये सत्य है
कालदामु तो फिर तुम कहां थे और यूं वहां से भागकर कैसे आ गए । मेरी पुत्री को वहां संकट मे छौड़कर कैसे आ सकते हो तुम ?
> मुझे क्षमा करे महाराज परतुं वे कोई साधारण मानव नही था उन्होने अचानक ये हमपर हमला कर दिया।
इससे पहले की हम कुछ कर पाते उन्होने एक शक्ती से मुझे मूर्क्षित कर दिया और राजकुमारी को अपने साथ लेकर चले गए ।
कुंम्भन हैरानी से पूछता है --
> लेकर चले गए । परतुं कहां ?
> ये तो मुझे नगी पता महाराज । जब मेरी आंख खुली तो मे वहां पर अकेला था। मुझे क्षमा करे महाराज मैं राजकुमारी की सुरक्षा नही कर पाया।
कालदामु अपना सिस को झुकाए कुंम्भन से कहता है।
कुंम्भन की बात सुनकर मांतक कहता है--
> मित्र क्या ये संभव है के एक देत्य कन्या को किसी
मानव द्वारा बंधक बना लिया गया हो। क्या इस युग मे भी ऐसे मानव है जो हम देत्यो से भी ज्यादा शक्तीशाली है ?
To be continue....1153