Bhakt Prahlaad - 16 in Hindi Spiritual Stories by Siya Kashyap books and stories PDF | भक्त प्रह्लाद - 16

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भक्त प्रह्लाद - 16

होलिका-दहन

प्रह्लाद को सुरक्षित देख हिरण्यकशिपु ईर्ष्याग्नि में जलने लगा था। उसने कृत्रिम प्रेम प्रकट करते हुए प्रह्लाद से पूछा,“प्रह्लाद! तुम्हारे पास ऐसी कौन सी विद्याशक्ति है, जिस कारण तुम सुरक्षित बच जाते हो ?” 

प्रह्लाद ने हिरण्यकशपु की ओर देखते हुए कहा, “पिताश्री, मेरे पास प्रभु श्रीहरि विष्णु की भक्ति की शक्ति है और मैं आपसे न जाने कितनी बार कह चुका हूँ कि आप अपनी शक्ति का अभिमान त्यागकर प्रभु का स्मरण करें तो यह आपके लिए हितकर होगा।”

प्रह्लाद की इस प्रकार की बातों ने शांत व्यवहार कर रहे हिरण्यकशिपु के तन-मन में एक बार फिर आग लगा दी। बार-बार की असफलता उसके हृदय को अत्यंत व्यथित करने लगी थी और इसी कारण उसकी विकरालता भी चरम सीमा को छूने लगी थी। उसने निश्चय कर लिया था कि वह प्रह्लाद को दंड देकर ही रहेगा, फिर चाहे उसे उसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े।

अभी तक अपने सभी प्रयासों में विफल रहने के बाद हिरण्यकशिपु ने निर्णय लिया कि वह प्रह्लाद को अग्नि में जलाकर भस्म कर देगा। इस विषय में उसने अपने मंत्रियों से विचार-विमर्श भी किया और उन मंत्रियों ने उसके उस निर्णय को सिर आँखों पर रखते हुए अपनी ओर से भी पूर्ण सहमति दे दी।

हिरण्यकशिपु की एक बहन थी, जिसका नाम होलिका था। होलिका को वरदान स्वरूप एक ऐसा दिव्यावरण प्राप्त था, जिसे ओढ़कर यदि अग्नि में प्रवेश किया जाए तो अग्नि का उसके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

जब असुरराज ने होलिका को अपनी योजना के बारे में बताया तो होलिका उसकी योजना को मूर्त रूप देने के लिए सहर्ष तैयार हो गई। उसकी योजना यह थी कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ जाएगी और फिर चिता को अग्नि दे दी जाएगी। इस प्रकार प्रह्लाद तो अग्नि में जलकर भस्म हो जाएगा और होलिका अपने दिव्यावरण के कारण सुरक्षित बच जाएगी।

अपनी योजना को व्यवहार में लाने के लिए हिरण्यकशिपु ने अपने सैनिकों को एक विशाल चिता तैयार करने की आज्ञा दी। उसके आदेश भर की देर थी कि थोड़े से समय में ही उसके सैनिकों ने एक विशाल चिता तैयार कर दी। इसके पश्चात् उसने वहाँ प्रह्लाद को लाने का आदेश दिया, जबकि होलिका पहले से ही अपने दिव्यावरण के साथ वहाँ उपस्थित थी।

हिरण्यकशिपु का संकेत पाते ही होलिका प्रह्लाद को गोद में उठाकर धीरे-धीरे चिता की ओर बढ़ने लगी। तभी प्रह्लाद ने बाल-सुलभ चेतना के साथ प्रश्न किया, “बुआश्री! आप मुझे गोद में लेकर कहाँ जा रही हैं?”

होलिका ने प्रह्लाद को बहलाते हुए कहा, “पुत्र! हम एक लंबी यात्रा पर जा रहे हैं।” 

“किंतु अभी मेरी किसी भी यात्रा पर जाने की कोई इच्छा नहीं है।” प्रह्लाद ने कहा।

“पुत्र!” स्नेह करने का नाटक करते हुए होलिका बोली, “हम जिस यात्रा पर जा रहे हैं, वहाँ अनेक प्रकार के विचित्र जीव-जंतु हैं। क्या तुम्हें यह सब देखने की इच्छा नहीं है ?”

“जी, इच्छा तो है, किंतु मैं चाहता हूँ कि इस यात्रा पर हमारे साथ माता श्री भी हों तो और अच्छा होगा।” अपनी माता को स्मरण करते हुए प्रह्लाद बोला।

“किंतु पुत्र! तुम्हारी माता इस यात्रा पर हमारे साथ नहीं जा सकतीं।” होलिका ने प्रह्लाद के सिर पर कृत्रिम वात्सल्य से हाथ फेरते हुए बताया।

“ऐसा क्यों बुआ श्री!” प्रह्लाद विचलित होते हुए बोला।

“इसका भी एक कारण है, जिसे मैं अभी स्पष्ट नहीं कर सकती।” होलिका बोली।

“तो फिर मेरा आपके साथ इस यात्रा पर जाना असंभव है।” प्रह्लाद ने रूठे स्वर में कहा।

“किंतु प्रह्लाद! यह तो तुम्हारे पिताश्री की आज्ञा है कि हम इस यात्रा पर जाएँ।” प्रह्लाद को बहलाते हुए होलिका बोली।

“तब तो मुझे अवश्य ही इस यात्रा पर आपके साथ जाना पड़ेगा, क्योंकि यह पिताश्री की आज्ञा है और पिताश्री की आज्ञा टालना उचित नहीं होगा।” प्रह्लाद ने कहा।

“तो फिर चलो, हम अपनी यात्रा आरंभ करते हैं।” यह कहकर होलिका प्रह्लाद को गोद में लिये विशाल चिता की सीढ़ियों पर चढ़ने लगी।

आकाश को छूती चिता की सीढ़ियों को हैरानी से देखते हुए प्रह्लाद ने होलिका से पूछा, “बुआश्री! ये सीढ़ियाँ इतनी ऊँचाई पर कहाँ गई हैं?”

“ये सीढ़ियाँ सीधे स्वर्ग की ओर गई हैं।” होलिका कुटिलता से मुसकराते हुए बोली।

“अच्छा, जो देवताओं का निवास स्थान है।” प्रह्लाद ने कुछ सोच-विचार के पश्चात् कहा।

“हाँ, तुमने सत्य कहा।” होलिका बोली।

“बुआश्री! इसका अर्थ तो यह हुआ कि मुझे देवताओं के दर्शन करने का अवसर मिल जाएगा।” प्रह्लाद ने होलिका की ओर देखते हुए कहा।

“हाँ-हाँ, वहाँ तुम अनेक देवताओं के दर्शन कर सकोगे।” होलिका ने प्रह्लाद की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा।

प्रह्लाद को अपनी बातों के जाल में उलझाने के पश्चात् होलिका ने चिता की सीढ़ियों पर तेजी से चढ़ना आरंभ कर दिया और कुछ ही देर में वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लिये चिता के निकट बनी सीढ़ियों के शीर्ष पर पहुँच गई, फिर वह सीढ़ियों से उतरकर चिता पर आकर बैठ गई। यों चिता पर बैठने के बाद प्रह्लाद ने पूछा, “बुआश्री! आप तो कह रही थीं कि ये सीढियाँ तो सीधे स्वर्ग में जाती हैं, किंतु ये यहीं समाप्त हो गईं ओर यहाँ तो स्वर्ग है ही नहीं।”

“पुत्र! अभी कुछ देर पश्चात् देखना कि अग्निदेव एक विमान पर सवार होकर यहाँ आएँगे और फिर हमें अपने साथ लेकर स्वर्ग की ओर चलेंगे।” होलिका ने अपनी बातों से प्रह्लाद को बहलाने का प्रयास किया।

इसके पश्चात् होलिका ने नीचे खड़े असुरों की ओर चिता में आग लगाने का संकेत किया। चिता में आग का लगाना था कि वह धू-धू करके जलने लगी। उसकी विशाल लपटें आकाश को छूने लगीं। उसी समय वायु बड़े वेग से चलने लगी। ऐसा प्रतीत हुआ, मानो आकाश आँधी से घिर गया हो।

जिस योजना के अनुसार होलिका ने दिव्यावरण आग से बचाव के लिए अपने शरीर पर डाला हुआ था, वह तेज वायु के कारण उड़ने लगा। यह सब प्रभु की लीला थी कि वह दिव्यावरण उड़कर प्रह्लाद के शरीर से जा लिपटा। इसी बीच चिता की अग्नि ने प्रचंड रूप धारण कर लिया था, जिस कारण होलिका का शरीर बुरी तरह जल गया, जबकि दिव्यावरण के कारण प्रह्लाद सुरक्षित बच गया था। जहाँ अग्नि की प्रचंड ज्वाला के बीच होलिका का शरीर जलकर राख हो गया, वहीं प्रह्लाद को कोई हानि नहीं पहुँची। होलिका के छल ने स्वयं होलिका को छलकर उसके प्राण हरण कर लिये थे, जबकि प्रभु की कृपा से इस बार भी प्रह्लाद के प्राण बच गए थे।

सूर्योदय के पश्चात् हिरण्यकशिपु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे चिता वाले स्थान पर जाकर देखें कि वहाँ क्या घटित हुआ। आदेश मिलते ही सैनिक चिता वाले स्थान पर आए और राख के ढेर को हटाकर होलिका को ढूँढ़ने लगे। अथक प्रयास के बाद भी उन्हें होलिका तो नहीं मिलीं, किंतु प्रह्लाद दिव्यावरण में लिपटे हुए अवश्य मिल गये, जो सांनद निद्रामग्न थे। सैनिकों ने तुरंत हिरण्यकशिपु को सूचित किया और उसे संपूर्ण घटना की जानकारी दी।

सूचना पाते ही व्याकुल-व्यग्र अवस्था में हिरण्यकशिपु दौड़ा-दौड़ा चिता वाले स्थान पर आया। प्रह्लाद को जीवित अवस्था में देख वह तुरंत समझ गया कि उसकी बहन होलिका चिता की अग्नि में जलकर भस्म हो गई। क्रोध के कारण उसका बुरा हाल था। वह प्रह्लाद की ओर देखकर विचार करने लगा कि उसने विभिन्न प्रकार से प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया, किंतु वह अपने एक भी प्रयास में सफल न हो सका। अपने इन प्रयासों में विफल होने के बाद उसने सोचा कि निश्चय ही प्रह्लाद में कोई ऐसी विशेष शक्ति है, जो विषम परिस्थितियों में उसका साथ देती है और इसी विशेष शक्ति के प्रभाव के कारण हर बार प्रह्लाद के प्राण बच जाते हैं।

एक दिन आचार्य शंड ने हिरण्यकशिपु को समझाते हुए कहा, “महाराज! आप विश्वविजेता हैं, धरती के परम शक्तिशाली योद्धा हैं। अतः आप क्यों अपनी शक्ति इस अल्पायु बालक के कारण व्यर्थ गँवा रहे हैं? इससे आपको कोई हानि होगी, इस बारे में आप बिल्कुल भी चिंता न करें।”

“आपका कथन सर्वथा उचित है आचार्य!” हिरण्यकशिपु बोला, “किंतु जब मैं इस दुर्बुद्धि-हठी बालक को देखता हूँ तो मेरा क्रोध स्वत: ही फूट पड़ता है।”

“महाराज! कुछ समय पश्चात् पिताश्री शुक्राचार्य अपनी तपस्या पूर्ण करके आश्रम लौटने वाले हैं। जब वे लौट आएँगे तो वे स्वयं प्रह्लाद की वृत्ति में परिवर्तन कर देंगे। अतः आप निश्चिंत होकर अपना ध्यान राजकार्यों में लगाएँ और प्रह्लाद के बारे में चिंता करना छोड़ दें।” आचार्य शंड ने समझाते हुए कहा।

“तो फिर आप ही बताएँ आचार्य कि क्या किया जाए ?” हिरण्यकशिपु गंभीर स्वर में बोला।

“आप प्रह्लाद को आश्रम में छोड़ दें। अभी तो वह बहुत छोटा है। जब बड़ा हो जाएगा तो इसकी बुद्धि परिपक्व हो जाएगी, साथ ही यह असुरों के हित-अहित की बात भी भली-भाँति समझ जाएगा।” आचार्य शंड ने अपना सुझाव प्रस्तुत करते हुए कहा।

हिरण्यकशिपु को आचार्य शंड का सुझाव उचित लगा और उसने प्रह्लाद को आचार्य शंड की देखरेख में आश्रम में भेज दिया।