अजेय वरदान की प्राप्ति
असुर नगरी में जो भी घटित हुआ, उससे अनभिज्ञ असुरराज हिरण्यकशिपु अपनी तपस्या में लीन था। तपस्या करते-करते हिरण्यकशिपु को कई वर्ष बीत गए, लेकिन अभी तक उसे इच्छित परिणाम की प्राप्ति नहीं हुई थी। उसका शरीर अत्यंत कमजोर हो गया था, भुख-प्यास सब लुप्तप्रायः हो गई थी, लेकिन अभी तक वह इच्छित फल की प्राप्ति से वंचित था। उसके मन में यदा-कदा यह विचार भी आता कि वह तपस्या छोड़कर वापस लौट चले, लेकिन अगले ही क्षण उसके अंतर्मन से आवाज निकलती, ‘नहीं असुरराज, नहीं। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए तुम इतने वर्षों से कठोर तप में लीन हो, उसे अब यों ही अधर में छोड़कर लौटना उचित नहीं। इस तरह के विचार तुम्हारे असाध्य-साधन के लिए किसी बड़े विघ्न से कम नहीं हैं। इन विचारों को अपने मनोमस्तिष्क से दूर रखो। यदि सफलता प्राप्त करनी है तो अपने हृदय को तब तक दृढ़ रखो, जब तक कि तपस्या का फल प्राप्त न हो जाए। यह तुम्हारी अग्निपरीक्षा है और यदि तुम इसमें सफल हो गए तो फिर सफलता तुम्हारे चरण चूमेगी। तुम्हें अपने उद्देश्य से कभी नहीं भटकना है। अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ रहो।’
इस तरह हिरण्यकशिपु मानसिक दृढ़ता के साथ तपस्या करता रहा। उसे न तो होने वाली भारी वर्षा की परवाह रही, न कड़ी धूप की और न ही बर्फबारी की। वह अडिग, अचल अपने मनोरथ को पूर्ण करने में संलग्न रहा। निडरता उसका सबसे बड़ा अस्त्र थी। उसकी कठोर तपस्या से प्रभावित होकर ब्रह्मा को उसके समक्ष दर्शन देने हेतु आना पड़ा। ब्रह्मा ने कोमल स्वर में पुकारा, “अससुरराज !”
हिरण्यकशिपु पूर्ववत् अपनी आँखें बंद किए भक्ति में लीन रहा। ऐसा लगा, जैसे उसे कुछ सुनाई ही न दिया हो। उसकी आँखें वैसे ही बंद रहीं, जैसे वर्षों से बंद थीं।
“अससुराज! अपनी आँखें खोलो।” ब्रह्मा ने एक बार फिर अपेक्षाकृत तीव्र स्वर में पुकारा।
जब ब्रह्मा के शब्द हिरण्यकशिपु के कानों में गूँजे तो उसे संदेह हुआ कि कोई उसकी तपस्या में बाधा उत्पन्न करने का प्रयास कर रहा है। ब्रह्माजी उसके मनोभावों को तुरंत ताड़ गए। उन्होंने एक बार फिर पुकारा– “असुरराज! कोई भी तुम्हारी तपस्या में बाधा उत्पन्न नहीं कर रहा है, बल्कि तुम्हारी तपस्या पूर्ण हो गई है। अपनी आँखें खोलकर देखो, तुम इतने वर्षों से जिसे पुकार रहे हो और तुम्हारा हृदय जिस अभीष्ट की अभिलाषा में व्याकुल है, वह साक्षात् तुम्हारे सम्मुख उपस्थित है।”
हिरण्यकशिपु ने अपनी आँखें खोलीं तो साक्षात् ब्रह्मा को अपने सम्मुख पाकर सहसा ही उसके हाथ अभिवादन की मुद्रा में आबद्ध हो गए और मुख से निकल पड़ा, “भगवान् ब्रह्मदेव को तुच्छ भक्त का सादर प्रणाम!”
ब्रह्माजी ने अभिवादन स्वीकार करते हुए कहा, “असुरराज ! हम तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हैं।” अपने इष्टदेव के मुख से ये शब्द सुनकर हिरण्यकशिपु की आँखों से अश्रुधार बहने लगे। ये शब्द सुनने के लिए न जाने कितने वर्षों से उसके कान व्याकुल थे और इसके लिए उसने न जाने कितने कष्ट सहे थे। वह भाव विह्वल होते हुए बोला, “भगवान्! साक्षात् दर्शन देकर आपने मुझ पर बड़ी कृपा की है।”
“कहो, क्या चाहते हो असुरराज ?” ब्रह्माजी ने गंभीर वाणी में स्पष्ट प्रश्न पूछा।
“भगवान्! आप मुझे अमरता का वरदान दें।” हिरण्यकशिपु करबद्ध हो, विनीत स्वर में बोला।
हिरण्यकशिपु की अमरता की बात सुनकर ब्रह्माजी की भृकुटि तन गई। वे स्पष्ट रूप से कहना चाहते थे कि सृष्टि में जिस प्राणी ने भी जन्म लिया है, उसे मृत्यु का ग्रास अवश्य बनना पड़ेगा, किंतु उन्होंने ऐसा कुछ कहा नहीं। उन्होंने हिरण्यकशिपु को समझाते हुए कहा, “वत्स! यह वरदान छोड़कर तुम कोई और वरदान माँग लो, मैं तत्काल ही उसकी पूर्ति कर दूँगा।”
ब्रह्माजी की बात सुनकर हिरण्यकशिपु हताश हो उठा। उसने विचार किया कि जिस वरदान की प्राप्ति के लिए उसने इतनी कठिन तपस्या की और न जाने उसके लिए कैसे-कैसे कष्ट सहे, उसका तो न कहकर रास्ता ही बंद कर दिया गया। कुछ देर सोचने-विचारने के बाद उसने क्षीण स्वर में कहा, “भगवान्! यदि आप मुझे अमर होने का वरदान नहीं देना चाहते तो फिर कृपा कर आप मुझे यह वरदान दें कि स्वर्ग हो या पाताल, पृथ्वी हो या आकाश, कहीं भी कोई मेरा सामना करने वाला न हो। मैं सभी को परास्त कर सकूँ। किसी में भी मुझे परास्त करने की शक्ति न हो। आपके द्वारा सृजित सृष्टि का कोई भी जीवधारी मुझे न मार सके। मेरी मृत्यु न तो महल के अंदर हो और न महल के बाहर, न दिन में हो और न रात में मेरे शरीर को किसी भी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से हानि न पहुँचाई जा सके। न मेरी मृत्यु धरती पर हो और न आकाश में।”
ब्रह्माजी ने हिरण्यकशिपु की इच्छा को सुना तो उनके अधरों पर मुसकान खिल उठी। उन्होंने हिरण्यकशिपु को ‘तथास्तु’ कहकर उसकी इच्छानुरूप वरदान दे दिया, और तुरंत वहाँ से अंतर्धान हो गए।
ब्रह्माजी के प्रस्थान करते ही असुरराज बड़े जोर से ठहाका लगाकर उठा, “हा...हा...हा ! अंततः मैं अमर हो ही गया। अब सृष्टि का कोई भी प्राणी मुझे नहीं मार सकता, कोई अस्त्र-शस्त्र मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। इसका अर्थ यह हुआ कि अब संपूर्ण सृष्टि पर मेरा ही आधिपत्य होगा, अर्थात् संपूर्ण सृष्टि का अधीश्वर अब मैं ही हूँ।”
हिरण्यकशिपु की आँखों में अहंकार का भाव मचलने लगा था। उसे अभिमान की जंजीरों ने बुरी तरह जकड़ लिया था। मनोवांछित वरदान पाकर उसकी छाती गर्व से चौड़ी हुई जा रही थी। उसका मन फूला नहीं समा रहा था। लंबे समय से वह अपने महल और परिवारजनों से दूर वन में था। अब उनसे मिलने की लालसा अत्यंत तीव्र हो उठी थी। उसके मन में भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार हिलोरे मार रहे थे। इसी बीच वह विष्णु को भी याद करना न भूला। जैसे ही विष्णु का नाम उसके मन में आया, उसके मन में प्रतिकार की भावना बलवती हो उठी। वह तेज कदमों से अपने महल की ओर बढ़ने लगा।
कुछ समय पश्चात् असुरराज हिरण्यकशिपु अपनी नगरी में पहुँचा, लेकिन जब वह वहाँ पहुँचा तो उसे चारों ओर वीरान सा दिखाई दिया। चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। ऐसा प्रतीत होता था, जैसे वर्षों से यहाँ कोई रहता ही नहीं है। जो प्रसन्नता का वातावरण वह अपने जाते समय वहाँ छोड़ गया था, अब उसे शोक ही शोक दिखाई दे रहा था। वहाँ का करुण क्रंदन उसको बुरी तरह विचलित कर रहा था। उसकी प्रजा के चेहरे उतरे हुए थे। किसी की भी आँखों में उसके वापस लौटने का जरा सा भी उत्साह नहीं था। सभी के चेहरे टूटी डाल की भाँति लटके हुए थे। यह दृश्य देख वह विचलित हो उठा। उसने देखा कि असुरों के चेहरों पर हर्ष के बजाय भय व्याप्त था। उसके मन में भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार आ रहे थे।
हिरण्यकशिपु विचार कर रहा था कि जिसके आतंक से सभी भयभीत रहते थे और जिसके वैभवशाली राज्य में किसी भी शत्रु को प्रवेश करने की हिम्मत भी नहीं होती थी, आज उसी राज्य में सबकुछ तहस-नहस हुआ पड़ा था। घर-के-घर उजाड़ दिए गए थे। यह दृश्य देख उसका हृदय चीत्कार कर रहा था। चलते-चलते उसके पग कंपन कर रहे थे। जिसके आतंक से, भय से संपूर्ण पृथ्वी काँपती थी, आज उसी असुरराज के पग काँप रहे थे। ऐसी स्थिति में उसके मनोवांछित वर पाने का हर्ष व उत्साह — सब मंद पड़ गया था। राज्य की दुर्दशा देखकर उसके तन-मन में क्रोध के शोले फूटने लगे थे।
सर्वप्रथम उसने उस दुर्ग में प्रवेश किया, जहाँ उसकी अजेय सेना रहती थी। वहाँ का दृश्य देखकर वह आश्चर्यचकित हो उठा। दुर्ग में उसे कोई भी दिखाई नहीं दिया। सभी सैनिक वहाँ से पलायन कर चुके थे। किले की दीवारें जगह-जगह से टूटी हुई थीं। वहाँ भी सबकुछ तहस-नहस पड़ा था। बड़ी कठिनाई से अपने हृदय को सँभाले वह अस्त्रशाला की ओर चल दिया। वहाँ का हाल तो और भी बुरा था। तलवारें, भाले और धनुष-बाण सभी छिन्न-भिन्न अवस्था में पड़े थे। इसके बाद उसने अंतःपुर की राह पकड़ी। जैसे ही वह अंतःपुर के द्वार पर पहुँचा तो फाटक को टूटा हुआ देखकर उसने अनुमान लगा लिया कि यहाँ भी भारी उत्पात मचाया गया है। अंत:पुर में प्रवेश करके उसने अपने विश्राम कक्ष आदि को देखा, किंतु चारों ओर हृदय की धड़कनें बढ़ा देने वाली शांति थी। यकायक उसे न जाने क्या सूझा कि वह मदमस्त हाथी की भाँति तेजी से इधर-उधर दौड़ने लगा। अपनी परम प्रिय रानी कयाधू को वहाँ न पाकर उसकी मुट्ठियाँ भिंच गई, क्रोधावेश के कारण उसके नेत्र रक्तिम हो गए और उसके होंठ फड़फड़ाने लगे। उसके चीखने-चिल्लाने की आवाज से अंतःपुर का कोना-कोना गूँज उठा। वह वहीं बैठ गया। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
रानी कयाधू को हिरण्यकशिपु बहुत प्रेम करता था, उसे अंतःपुर में न पाकर वह उन्मत्त सा हो गया था। वह सोच-सोचकर चिंतातुर था कि न जाने किस अवस्था में और कहाँ होगी उसकी रानी ? दूसरी ओर यह सोचकर भी उसका बुरा हाल था कि क्या उसके वीर योद्धा इस विनाशलीला को नहीं टाल सकते थे, जिन्होंने उसके नेतृत्व में देवताओं तक को पराजित कर दिया था। आज उसे वहाँ अपना कोई भी परिचित दिखाई नहीं दे रहा था। न जाने सबके सब कहाँ चले गए थे। यही बात उसे और अधिक चिंतित किए जा रही थी।