पर्वत ने किया नमन
सूर्योदय के साथ अंधकार दूर हुआ। हड़बड़ाहट में हिरण्यकशिपु अपने शयनकक्ष से बाहर आया। यह हड़बड़ाहट उसके भय की नहीं, बल्कि उसकी प्रसन्नता की थी। उसे यह विश्वास था कि कोठरी में बंद प्रह्लाद को सर्पों ने अपनी विषैली फुफकार से ही धराशायी कर दिया होगा। उसका शत्रु-हितैषी अब जीवित नहीं होगा। यही सोचकर वह कुछ मंत्रियों के साथ अपनी संतुष्टि के लिए उस कोठरी की ओर तेज कदमों से बढ़ा जा रहा था, जिसमें प्रह्लाद बंद था।
जब हिरण्यकशिपु कोठरी के द्वार पर पहुँचा और फिर उसके अंदर का दृश्य देखा तो वह भौचक्का रह गया। उसका सारा उत्साह बर्फ की भाँति ठंडा पड़ गया। उसे विश्वास करना कठिन हो रहा था कि इतने भयानक व विषैले सर्पों के बीच में भी प्रह्लाद जीवित थे। जिन सर्पों की केवल फुफकार से ही किसी के भी प्राण सूख जाएँ, उन सर्पों के बीच प्रह्लाद मग्न होकर अपने इष्टदेव का ध्यान कर रहा था। कोठरी का दृश्य देखने के पश्चात् हिरण्यकशिपु दाँत पीसता हुआ लौट गया।
प्रह्लाद को जीवित देखकर हिरण्यकशिपु का माथा ठनक गया। उसकी शिराएँ ढीली पड़ गई थीं। वह बाहुबली, जिसके पराक्रम के आगे कोई भी न टिक पाया था, जिसके शौर्य की कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई थी, जिसके क्रोध मात्र से देवता तक थर-थर काँपने लगते थे वही आज उस बालक से एक बार फिर पराजित हो गया था, जिसके हाथ में न अस्त्र था और न शस्त्र उस बालक के सामने एक बार फिर वह निस्तेज हो गया था।
अब हिरण्यकशिपु को तीनों लोकों की विजय भी व्यर्थ सी लगने लगी थी। उसे अपने पराक्रम पर धिक्कार हो रहा था। उसे यह बात रह-रहकर और भी अधिक चिंतित कर रही थी कि लोग क्या कहेंगे कि एक निरीह बालक से वह हार गया और एक बार नहीं, बल्कि बारंबार और देवता! देवता तो उसकी खिल्ली उड़ा रहे होंगे कि बताओ एक बालक से वह पार न पा सका। इस तरह की बातें जहाँ उसके अभिमान पर चोट कर रही थीं, वहीं उसके क्रोध को भी बढ़ा रही थीं।
एक प्रह्लाद की मृत्यु ही थी, जो हिरण्यकशिपु का खोया हुआ सुख-चैन लौटा सकती थी, अन्यथा उसके लिए हर प्रिय वस्तु भी अप्रिय हो रही थी। जिस प्रकार प्रत्येक बालक के लिए चाँद पकड़ना एक अप्राप्य वस्तु के समान होता है, उसी प्रकार प्रह्लाद की मृत्यु भी हिरण्यकशिपु के लिए एक अप्राप्य वस्तु ही प्रतीत हो रही थी। जब व्यक्ति की बुद्धि कुंठित हो जाती है तो वह दुष्ट कर्म करने के लिए आतुर हो उठता है। हिरण्यकशिपु के साथ भी ऐसा ही हुआ। इस बार विचार किसी और का नहीं, बल्कि उसका अपना था। यही कारण था कि वह अपने कक्ष में अकेले ही जोर-जोर से ठहाके मारकर हँस रहा था और बड़बड़ा रहा था कि इस बार प्रह्लाद तेरा जीवित रहना असंभव है।
हिरण्यकशिपु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि जाओ, प्रह्लाद को किसी ऊँचे पर्वत-शिखर पर ले जाओ और वहाँ से नीचे फेंक दो। जब उसका शरीर चट्टानों से टकराएगा तो टकराते ही चूर-चूर हो जाएगा।
उसकी आज्ञा मिलते ही सैनिकों ने कोठरी की ओर दौड़ लगा दी और वहाँ से प्रह्लाद को निकालकर एक ऊँचे पर्वत पर ले गए। उन्होंने प्रह्लाद के हाथ-पाँव को कसकर बाँध दिया, किंतु प्रह्लाद ने उनसे कुछ न कहा। बस, मन-ही-मन अपने इष्टदेव की स्तुति करने लगे। तभी एक सैनिक बोला, “राजकुमार! तुम असुरराज की बात मान क्यों नहीं लेते? अभी भी समय है। यदि तुम उनकी बात मान जाओ तो संभव है कि भविष्य में तुम्हें और कष्ट नहीं भुगतने पड़ेंगे।”
“सैनिको! क्या तुम देख नहीं रहे हो, मुझे किसी भी प्रकार के कष्ट का सामना नहीं करना पड़ रहा है।” प्रह्लाद ने मुसकराते हुए कहा, “यदि मुझे कोई कष्ट होता तो न जाने मैं कब का मृत्यु को प्राप्त हो चुका होता। रही बात पिताश्री की, तो मैं उनके अनुसार अपने प्रभु से विमुख नहीं हो सकता।”
प्रह्लाद के वचन सुनकर सैनिकों ने कहा, “तो फिर ठीक है। अब भयानक दंड भुगतने के लिए तैयार हो जाओ।”
जिस पर्वत की ऊँचाई से हिरण्यकशिपु के सैनिक प्रह्लाद को नीचे फेंकने वाले थे, वहाँ से नीचे का दृश्य बड़ा ही भयभीत करने वाला था। उन सैनिकों को विश्वास हो गया था कि जब प्रह्लाद का शरीर नीचे पड़े विशाल पत्थरों से टकराएगा तो शायद ही उसके शरीर की कोई हड्डी भी चकनाचूर होने से बचे। सैनिक मन-ही-मन यह सोचकर हर्षित हो रहे थे कि जब असुरराज को प्रह्लाद की मृत्यु का समाचार मिलेगा तो वह उनसे बड़ा प्रसन्न होगा, फलस्वरूप हमें बड़ा पुरस्कार भी मिलेगा।
जब सैनिक प्रह्लाद को पर्वत से नीचे गिराने लगे तो प्रह्लाद ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने इष्टदेव का ध्यान करने लगा। उसे अपने प्रभु पर विश्वास था और इसी विश्वास के कारण उसमें आगाध श्रद्धा थी। उसके साथ यह सब जो घटित हो रहा था, उसे प्रह्लाद प्रभु की लीला मान रहे थे।
सेवकों ने प्रह्लाद को पर्वत से नीचे गिरा दिया। देखने वालों ने आश्चर्य से यह दृश्य देखा। नीचे गहरी घाटी से पर्वत-शिखर की ऊँचाई हजारों हाथ की थी। सामान्यतः किसी भी प्राणी के इतनी ऊँचाई से घाटी में गिरने से उसके शरीर का खंड-खंड होकर बिखरना अवश्यंभावी था, किंतु यहाँ पर पर्वत शिखर से गिराए जाने वाला प्राणी कोई सामान्य नहीं अपितु श्रीहरि का परम भक्त प्रह्लाद था। प्रह्लाद को जैसे ही पर्वत शिखर से नीचे की ओर धकेला गया, देखने वालों को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो पर्वत शिखर प्रह्लाद को अपने आगोश में लिये गहरी घाटी में झुक गया हो। शिखर ने सुरक्षित ढंग से प्रहलाद को घाटी में उतार दिया। कुछ समय पूर्व तक जो गहरी घाटी नुकीले भारी पत्थरों एवं चट्टानों से भरी हुई थी, वह अब रंग-बिरंगे फूलों और हरी-भरी वनस्पतियों से परिपूर्ण थी। वहाँ रंग-बिरंगी तितलियाँ फूलों पर मँडरा रही थीं, और भिन्न-भिन्न रंग के भँवरे गुन-गुन करते हुए मधुर गान सुना रहे थे। प्रह्लाद को आश्चर्यजनक ढंग से झुककर घाटी में उतारने के पश्चात् पर्वत-शिखर ने भक्त शिरोमणि के चरण स्पर्श कर उन्हें नमन किया। यह संपूर्ण क्रियाकलाप जैसे क्षण भर में ही पूरा हो गया। तत्पश्चात् अगले ही क्षण उन्नत पर्वत शिखर अपनी पूर्वावस्था में आ गया।
सैनिकों और अन्य सभी लोगों की आँखें आश्चर्य के कारण फटी की फटी रह गईं। वे लोग प्रस्तर प्रतिभा की भाँति मंत्रमुग्ध से होकर इस नयनाभिराम दृश्य को देखते रह गए। उनके मुख से एक शब्द तक न निकला। ऐसा लगा, जैसे उनकी जिह्वा तालू से चिपक गई हो।
भक्त-वत्सल श्रीहरि की कृपा से प्रह्लाद अभी भी स्वस्थ थे, सुरक्षित थे और असुरराज हिरण्यकशिपु की कृत्रिम प्रतिष्ठा पर आघात कर रहे थे।
हिरण्यकशिपु को फिर से प्रह्लाद के सुरक्षित बच जाने की सूचना मिली तो वह अपना संतुलन खो बैठा। किसी प्रकार बड़ी कठिनाई से मंत्रियों ने उसे नियंत्रित किया और उसे यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि वे शीघ्र ही कोई ऐसा उपाय ढूँढ़ेंगे कि इस बार प्रह्लाद का जीवित बच पाना असंभव है।