Bhakt Prahlaad - 8 in Hindi Spiritual Stories by Siya Kashyap books and stories PDF | भक्त प्रह्लाद - 8

Featured Books
Categories
Share

भक्त प्रह्लाद - 8

हिरण्याक्ष-वध की कथा

हिरण्यकश्यपु ने बड़े अच्छे ढंग से समझा-बुझाकर प्रह्लाद को पुनः आश्रम में भेज दिया। जैसा कि हिरण्यकश्यपु ने आश्रम के आचार्यों को आश्रम का पुनर्निरीक्षण करने की बात कहीं थी तो उन्होंने वैसा ही किया, किंतु उन्हें ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह सिद्ध होता है कि कोई प्रह्लाद के मन में विप्लवकारी विचारों का प्रतिपादन कर रहा हो। आचार्य स्वयं आश्चर्यचकित थे कि प्रह्लाद के मन में इस तरह के विचार कैसे उपजे। अंततः एक दिन उन्होंने पूछ ही लिया, “वत्स! ये हाहाकारी विचार तुमने कहाँ से ग्रहण किए, जिनसे संपूर्ण असुर समाज को घातक हानि हो सकती है ?”

“आचार्य!” प्रह्लाद ने मधुर एवं शांत स्वर में कहा, “मैंने ये विचार कहीं और से ग्रहण नहीं किए हैं, बल्कि इनका स्त्रोत तो मेरा अंतर्मन ही है।”

“प्रह्लाद! अपने अंतर्मन पर नियंत्रण रखो और मन से असुरों का अहित करने वाले हत्यारे विष्णु की छवि को बाहर निकाल दो, अन्यथा इसके घातक परिणाम होंगे।” आचार्य शंड ने प्रह्लाद को समझाते हुए कहा। 

“आचार्य! मेरे हृदय में श्रीहरि विष्णु की जो छवि बन चुकी है, उसे मैं लाख प्रयत्न के बाद भी नहीं मिटा सकता।” प्रह्लाद ने बड़े ही नम्र भाव से कहा, “किंतु मैं आपसे एक बात जानना चाहता हूँ।”

“कहो, क्या जानना चाहते हो ?” आचार्य शंड ने पूछा।

“आपने अभी विष्णु को 'अहित' करने वाला कहा था। मैं यह जानना चाहता हूँ कि विष्णु ने क्या अहित किया है, जिससे सारा असुर समाज उन्हें अपना परम शत्रु समझता है।” प्रह्लाद ने आचार्य शंड की ओर देखते हुए पूछा। 

“हाँ, विष्णु ने असुर समाज का अहित किया है।” आचार्य शंड तीव्र स्वर में बोले, “विष्णु ने वराह रूप धरकर तुम्हारे पिता के भाई हिरण्याक्ष का वध किया था। यही कारण है कि सारा असुर समाज विष्णु को हत्यारे की दृष्टि से देखता और इसी कारण विष्णु को परम शत्रु माना जाता है।”

“आचार्य! क्या आप मुझे इस घटना के बारे में बता सकते हैं?” प्रह्लाद ने निवेदन किया। 

“अवश्य वत्स!” आचार्य शंड ने स्वीकृति देते हुए कहा, “यदि उस घटना को सुनकर तुम विष्णु के प्रति अपने विचारों में परिवर्तन ला सको तो हम यह घटना तुम्हें अवश्य बताएँगे।”

“तो फिर सुनाइए आचार्य !” प्रह्लाद ने उत्सुकता से कहा। आचार्य शंड ने घटनारंभ करते हुए बताया “प्रह्लाद! तुम्हारे पिता हिरण्यकशिपु और उनके भाई हिरण्याक्ष के जन्म के समय सृष्टि में भारी उथल-पुथल मचने लगी। देवता तक भयभीत हो उठे। ये दोनों भाई अत्यंत शक्तिशाली थे। जैसे-जैसे ये बड़े होने लगे, उनकी शक्ति की भयंकरता में भी उसी अनुपात में वृद्धि होने लगी। देवता बड़े आनंदपूर्वक देवलोक में जीवनयापन कर रहे थे। चूँकि हिरण्याक्ष ने अथाह शक्ति अर्जित कर ली थी। बस, उन्होंने देवलोक पर आक्रमण कर दिया। उसके विशाल एवं विकराल रूप को देखकर देवता भयभीत हो उठे और भय के कारण वे इधर-उधर भागने लगे। तभी भयंकर गर्जना करते हुए हिरण्याक्ष ने समुद्र देवता वरुण का आह्वान किया। जैसे ही वरुण देव हिरण्याक्ष के सामने प्रकट हुए तो हिरण्याक्ष ने उन्हें चुनौती देते हुए कहा, “हे वरुण देव! मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ। अतः मेरी चुनौती स्वीकार करके मुझसे युद्ध करो।”

“असुरराज!” वरुणदेव बोले, “आप अथाह शक्ति के स्वामी हैं। मुझमें आपसे युद्ध करने की सामर्थ्य नहीं है।” वरुण देव को क्षमायाचना करते देख हिरण्याक्ष ने ठहाका लगाकर हंसना आरंभ कर दिया, “हा... हा... हा... ऐसा प्रतीत होता है कि समस्त देवता मेरे सम्मुख शक्तिहीन हो गए हैं। हा... हा... हा...क्या किसी भी देवता में मुझसे युद्ध करने की सामर्थ्य नहीं है ?”

“असुरराज!” वरुण देव ने विनीत स्वर में कहा, “तुमसे युद्ध करने की शक्ति केवल भगवान् विष्णु में ही है। वे ही तुम्हारी चुनौती स्वीकार करने में सक्षम हैं।”

“विष्णु ! हा...हा...हा...।”हिरण्याक्ष परिहास करते हुए बोला, “उसमें हिरण्याक्ष से युद्ध करने की शक्ति...मुझसे.... हा... हा... यह तुम्हारी भूल है कि विष्णु मेरी चुनौती को स्वीकार करने में सक्षम है। विष्णु तो क्या, कोई भी देव, दानव, यक्ष और गंधर्व आदि हिरण्याक्ष की चुनौती स्वीकार नहीं कर सकता... हा... हा... हा...।” हिरण्याक्ष के जोरदार ठहाकों से आकाश गूँज उठा और जीव थरथर काँपने लगे। उसके आसुरी कृत्यों के कारण पुण्य का लोप होने लगा था, जिस कारण पाप का बोझ बढ़ गया था। उसके पापाचार के कारण जीव त्राहि-त्राहि करने लगे थे। एक समय ऐसा आया कि उसने पृथ्वी को उठाकर समुद्र में छिपा दिया। परिणाम यह हुआ कि पृथ्वी के सभी प्राणी रोने-तड़पने लगे। वे भय और आतंक के मारे भगवान् विष्णु को पुकारने लगे।

अपने भक्तों की पुकार पर श्रीहरि विष्णु ने विशाल वराह का रूप धारण किया और समुद्र में डूबकी लगाकर अपनी लंबी नाक पर पृथ्वी को धारण करते हुए बाहर निकाल लिया। जब हिरण्याक्ष ने यह दृश्य देखा तो वह भयंकर गर्जना करते हुए बोला, “रे वराह! तुमने जहाँ से पृथ्वी को उठाया है, उसे उसी स्थान पर रख दो, अन्यथा...।” 

“अन्यथा क्या?” वराह रूपी विष्णु ने फुफकराते हुए कहा।

“अन्यथा गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार हो जाओ।” हिरण्याक्ष क्रोध के मारे काँपते हुए बोला। 

“परिणाम...।” भगवान् विष्णु परिहास करते हुए बोले।

“हाँ परिणाम।” हिरण्याक्ष दाँत किटकिटाते हुए बोला, “मैं यह भली-भाँति जान गया हूँ कि तुम वराह के रूप में विष्णु हो। चलो, यह भी अच्छा हुआ कि तुम स्वयं ही मेरे सम्मुख आ गए। वास्तव में मैं तुम्हें ही खोज रहा था। अब तुम्हें मेरे हाथों से कोई नहीं बचा पाएगा।”

“अरे, ओ दुष्ट पापी राक्षस!” पृथ्वी को यथास्थान रखते हुए वराह ने कहा, “निश्चय ही मैं तुम्हारे सम्मुख आ गया, लेकिन तुम्हारी मृत्यु के रूप में।” 

“रे विष्णु ! तुम्हें मेरी शक्ति का ज्ञान नहीं है। यदि तुम्हें मेरी शक्ति का ज्ञान होता तो अन्य देवताओं की भाँति तुम भी मेरे सम्मुख आने का साहस कभी नहीं करते।” हिरण्याक्ष शक्ति के मद में चूर होते हुए बोला।

हिरण्याक्ष का इतना कहना था कि वराह की आँखें क्रोध के मारे रक्तिम हो उठीं। उनके बीच घमासान युद्ध आरंभ हो गया। ब्रह्मा व अन्य सभी देवता इस भयंकर युद्ध को देखने के लिए आ जुटे। सभी देवता मन-ही-मन यह सोच रहे थे कि रात्रिकाल से पूर्व ही यह युद्ध समाप्त हो जाए तो अच्छा होगा, अन्यथा विकट स्थिति उत्पन्न हो जाएगी, क्योंकि रात्रि के साथ ही आसुरी शक्तियों में वृद्धि होने लगती है और असुर अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं।

भगवान विष्णु ने देवताओं की मानसिक स्थिति को ताड़ लिया था। अतः उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र की सहायता से हिरण्याक्ष को शस्त्रहीन कर दिया। इसके पश्चात् उन्होंने अपने मुष्टि प्रहारों से हिरण्याक्ष का अंत कर दिया। जब हिरण्यकशिपु को पता चला कि विष्णु के हाथों उसका भाई हिरण्याक्ष मृत्यु को प्राप्त हो चुका है तो वह बड़ा क्षुब्ध हुआ। बस, तब से वह विष्णु को अपना परम शत्रु मानने लगे। यद्यपि उसके मन में पहले से ही विष्णु के प्रति वैरभाव थे, किंतु अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु के बाद से उनके मन की शत्रुता और दृढ़ हो गई। इतना कहकर आचार्य शंड चुप हो गए।

“ आचार्य!” प्रह्लाद ने अपना तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा, “मुझे तो इस घटनाक्रम में भगवान् विष्णु का कोई दोष दिखाई नहीं देता।”

“प्रह्लाद!” आचार्य शंड कोधित स्वर में बोले, “मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारे अंदर कभी भी सुधार नहीं आ सकता। विष्णु ने तुम्हारे पिता के भाई का बड़ी निर्ममता से वध कर दिया और फिर भी तुम हो कि विष्णु की प्रशंसा किए जा रहे हो। तुम असुर कुल के लिए कलंक हो।”

इसके बाद आचार्य शंड प्रह्लाद के मन से भगवान् विष्णु का नाम मिटाने के लिए उसे तरह-तरह से प्रताडित करने लगे, किंतु उस पर किसी भी प्रताड़ना का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह पूर्ववत् भगवान् विष्णु की भक्ति में लीन रहने लगा।