विफल रहा प्राणदंड
असुरराज हिरण्यकशिपु के आदेशानुसार वधिक प्रह्लाद को ऐसे घनघोर जंगल में ले गए, जहाँ पृथ्वी तक सूर्य की किरणें नहीं पहुँच पाती थीं। दिन के समय भी वहाँ ऐसा प्रतीत होता था, जैसे रात घिर आई हो। प्रह्लाद ने निडरता से चारों ओर दृष्टि घुमाकर देखा। ऊँचे-ऊँचे विशाल तनों वाले वृक्ष आकाश को चूमने के लिए तैयार थे। जंगली हिंसक जानवरों की अति भयानक डरावनी आवाजें वातावरण को और अधिक डरावना बना रही थीं। अजीब सा कोलाहल उन वधिकों के हाथों में धारण किए हुए खड्गों को और भी अधिक हिंसक बना रहा था, किंतु जिसके साथ स्वयं प्रभु हों, उसे किस बात की चिंता ? किस बात का भय ?
प्रह्लाद का मन जंगल की भयानकता और वधिकों की क्रूररता से एकदम अलग अपने इष्टदेव के ध्यान में लगा हुआ था। उन्हें अपने आस-पास घटित हो रही चीजों की कोई सुध नहीं थी। उन्हें सुध थी तो केवल अपने इष्टदेव श्रीहरि विष्णु की। अपनी जन्मावस्था से लेकर अब तक वे जिसे सबसे अधिक प्रेम करते आए थे, वे भगवान् विष्णु ही थे। ऐसे में भला भगवान् अपने परम भक्त की भक्ति को निष्फल कैसे कर सकते थे ? जितनी चिंता भक्त को अपने इष्टदेव की भक्ति की होती है, उससे कहीं अधिक चिंता भगवान् को अपने भक्त की होती है। यदि भक्त किसी संकट से घिरा हो और भगवान् उसकी सहायता के लिए न आएँ ऐसा हो ही नहीं सकता। भगवान् को जो सबसे अधिक प्रिय है, वह है भक्त और उसकी भक्ति।
वधिक बार-बार भोले-भाले प्रहलाद के मुख की ओर देख रहे थे और सोच रहे थे कि इस बालक का क्या दोष, जो इसे प्राणदंड की सजा दी गई। उनका हृदय अंदर से बुरी तरह काँप रहा था। उनके हाथ में जो खड्ग थे, वे भी हाथों से छूटने के लिए तैयार थे। तभी उन वधिकों की ओर देखते हुए प्रह्लाद ने कहा, “रे वधिको! तुम अपने कर्तव्य से विमुख मत होओ। महाराज की ओर से तुम्हें जो आदेश मिला है, उसका पूरी तरह पालन करो।”
“प्रिय राजकुमार !” एक वधिक प्रह्लाद की ओर प्रेमपूर्ण दृष्टि से निहारता हुआ बोला, “मेरा हृदय तुम्हारा वध करने के लिए मना कर रहा है, बल्कि मेरा तो जी चाहता है कि मैं तुम्हें अपनी गोद में उठा लूँ और तुम्हें दुलार करूँ।”
“हाँ, राजकुमार!” दूसरा वधिक पहले वधिक की हाँ में हाँ मिलाता हुआ बोला, “तुम हो ही ऐसे कि कोई भी तुम्हें देखते ही प्रेम करने लगे। तुम असुर-कुल के शत्रु की भक्ति का परित्याग क्यों नहीं कर देते ? यदि तुम ऐसा करो तो तुम्हें प्राणदान दिया जा सकता है।”
“हे वधिको! यदि भगवान् विष्णु की यही इच्छा है कि मैं इसी प्रकार मृत्यु का वरण करूँ तो फिर मुझे मृत्यु स्वीकार है, किंतु यदि उनकी इच्छा नहीं हो तो फिर सृष्टि का कैसा भी अस्त्र-शस्त्र हो मुझे हानि नहीं पहुँचा सकता।” प्रह्लाद ने कहा, “मुझे मृत्यु का तनिक भी भय नहीं है। तुम जिस कार्य के लिए आए हो, उसे पूर्ण करो। जिस प्रकार मैं कर्तव्य से विमुख नहीं हो सकता, ठीक उसी प्रकार तुम्हारा भी अपने कर्तव्य से विमुख होना उचित नहीं है।”
“तो फिर ठीक है राजकुमार!” एक वधिक बोला, “हम अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करने के लिए कटिबद्ध हैं। अतः अब अंतिम बार अपने प्रभु का स्मरण कर लो और फिर मृत्यु को गले लगाने के लिए तैयार हो जाओ।”
“मेरे प्रभु तो हर क्षण प्रतिक्षण मेरे हृदय में बसे रहते हैं। अत: तुम निश्चिंत होकर अपना कार्य करो।” प्रह्लाद ने अपनी आँखें बंद करते हुए कहा।
प्रह्लाद के इतना कहने के बाद वधिकों की मुखाकृति गंभीर हो गई। आज तक उन्होंने इस तरह की निडरता कहीं नहीं देखी थी और न ही उन्हें सुनने को मिली थी। उन्हें जो देखने को मिला था, वह था भय। एक क्षण के लिए उन वधिकों ने प्रह्लाद को निहारा और फिर अगले ही क्षण उन्होंने प्रह्लाद पर अपने खड्ग से प्रहार करने आरंभ कर दिए, किंतु आश्चर्य से उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं। उनके द्वारा खड्ग से किए गए एक के बाद एक प्रहार का प्रह्लाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था।
जब वधिकों को लगा कि खड्ग से कोई बात नहीं बनी तो फिर उन्होंने अपने भालों से प्रह्लाद पर प्रहार करने आरंभ कर दिया। अरे, यह क्या! भालों की नोंक देखते-ही-देखते मुड़ गई और तलवारें खंड-खंड होकर बिखर गईं, किंतु प्रह्लाद अविचलित अपनी आँखें बंद किए जस के तस खड़े रहे। जहाँ वधिकों के मुख पर भय व्याप्त था, वहीं प्रह्लाद के मुख पर मोहक-सी मुसकान खिल रही थी। वधिक समझ गए थे कि यह प्रभु की लीला है, जिस कारण प्रह्लाद को खरोंच तक नहीं आई।
कुछ समय पश्चात् प्रह्लाद ने वधिकों से कहा, “क्या हुआ? वध करने में इतना विलंब क्यों ?”
“राजकुमार!” दोनों वधिक हाथ जोड़ते हुए बोले, “हम तुम्हारा वध करने में असमर्थ हैं।”
“क्यों!” प्रह्लाद बोले, “मेरा वध करने में असमर्थता कैसी ?”
फिर वधिकों ने प्रह्लाद को खंडित हुए अस्त्र-शस्त्रों को दिखाया, जिन्हें देखते ही प्रह्लाद के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वास्तव में हुआ यह था कि जब वधिक उन पर प्रहार कर रहे थे तो प्रह्लाद उस समय आँखें बंद किए हुए भगवान् विष्णु का स्मरण कर रहे थे। उन्हें तो पता भी नहीं था कि उनके साथ क्या हो रहा है। अब प्रहलाद को विश्वास हो गया था कि उनकी प्राण-रक्षा के पीछे भगवान् विष्णु ही हैं, जिन्होंने वधिकों के अस्त्रों को विखंडित कर भक्त वत्सलता दिखाई है।
इस घटना ने वधिकों के अंतर्मन को झकझोरकर रख दिया था। इसके पश्चात् वे दौड़े-दौड़े असुरराज हिरण्यकशिपु के पास गए। उन्होंने पसीने से तर-ब-तर दरबार में प्रवेश किया। उनकी आँखों में भय व मस्तक पर चिंता की लकीरें खिंची साफ दिखाई दे रही थीं। उन्होंने हाथ जोड़कर असुरराज का अभिवादन किया। असुरराज ने उन पर दृष्टिपात करते हुए पूछा, “क्या हुआ ? तुम इतने भयभीत क्यों दिखाई दे रहे हो ?”
उन वधिकों का भय के कारण बुरा हाल था। वे असुरराज के क्रोध से भली-भाँति परिचित थे। वे जानते थे कि असुरराज के आदेश की अवज्ञा का दंड है मृत्यु, किंतु उन्होंने अवज्ञा तो की ही नहीं थी। वे उसके आदेश का पालन करने के लिए पूर्णतया कटिबद्ध थे, किंतु भगवान् विष्णु के चमत्कार के कारण यह संभव न हो सका। जब असुरराज के पूछने पर भी वधिक कुछ न बोले, तो वह क्रोध के मारे गरजता हुआ बोला, “रे वधिको! क्या तुम्हें अपने प्राण प्रिय नहीं हैं? शीघ्र बताओ कि क्या तुम दुष्ट बालक का वध कर आए हो ?”
“नहीं, महाराज!” उनमें से एक वधिक बोला, “हम प्रह्लाद का वध करने में असफल रहे।”
“असफल!” असुरराज क्रोध से भरभरा उठा, “इसका अर्थ यह हुआ है कि तुमने हमारे आदेश का पालन नहीं किया।”
“नहीं महाराज!” दूसरा वधिक हाथ जोड़ते हुए बोला, “ऐसा नहीं है। हमने प्रह्लाद पर अनेक प्रकार के अस्त्रशस्त्रों से प्रहार किए, किंतु उस पर किसी भी प्रकार के शस्त्र का कोई प्रभाव नहीं हुआ, बल्कि उलटे शस्त्र हीं खंडित हो गए।”
वधिकों के मुख से यह सुनकर असुरराज आश्चर्यचकित भी हुआ और क्रोधित भी। वह कुछ देर पश्चात् बोला, “तो ठीक है। हम उसे स्वयं देखेंगे कि प्रह्लाद में ऐसी क्या विशेषता है, जो उस पर किसी भी प्रकार के अस्त्रशस्त्र का प्रभाव नहीं हुआ।”
असुरराज उन वधिकों व अन्य दरबारियों के साथ उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ प्रह्लाद को वध के लिए ले जाया गया था। उस स्थान पर पहुँचने के पश्चात् जब असुरराज ने टूटे-फूटे अस्त्र-शस्त्रों को देखा तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। वह एकटक दृष्टि से उन खंडित शस्त्रों को देखते रहा, फिर वह प्रह्लाद की ओर पलटते हुए बोला, “प्रह्लाद! तेरी बुद्धि में हमारी बात आई या नहीं ?”
“पिताश्री! मेरी बुद्धि में तो यह बात पहले से ही आ चुकी है कि जब तक मुझ पर भगवान् विष्णु की कृपा रहेगी, तब तक मेरा कोई अहित नहीं हो सकता।” प्रह्लाद ने कहा।
“इसका अर्थ यह हुआ कि तू विष्णु की भक्ति करना नहीं छोड़ेगा।” असुरराज क्रोध के मारे तमतमाते हुए बोला।
“पिताश्री! वे तो मेरे आराध्य हैं और अपने आराध्य की आराधना करना मेरा परम कर्तव्य है।” प्रह्लाद ने अपने पिता की ओर देखते हुए कहा।
“इसका तात्पर्य यह है कि हमारा-तुम्हारा कोई संबंध नहीं। हमारा तुम पर कोई अधिकार ही नहीं है।” असुरराज ने कहा।
“नहीं, पिताश्री! आप ऐसा मत कहिए। आप तो मेरे पिता हैं और आपका मुझ पर पूरा अधिकार है। मैं आपका बहुत सम्मान करता हूँ।” प्रह्लाद ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
“तुम्हारा ऐसा कहना सब मिथ्या है। यदि तू हमारा सम्मान करता तो फिर हमारी अवज्ञा कदापि नहीं करता।” असुरराज तमतमाते हुए बोला।
“पिताश्री! मैं आपकी हर आज्ञा मानने को तैयार हूँ, किंतु सर्वप्रथम आपको अपने मन से भगवान् विष्णु के प्रति दुर्भावना का परित्याग करना होगा।” प्रह्लाद ने विनीत स्वर में कहा।
“रे मूर्ख!” असुरराज का शरीर क्रोध के मारे कँपकँपा उठा, “यह बात तू हमें बताएगा कि हमें किस बात का परित्याग करना चाहिए और किसका नहीं, अभी तूने हमारा क्रोध देखा ही कहाँ है ?”
इतना कहकर असुरराज हिरण्यकशिपु वहाँ से चला गया। संभवतः वह प्रहलाद को दंडित करने के बारे में ही सोच रहा था कि किस प्रकार प्रह्लाद को दंडित किया जाए।