प्राणदंड का आदेश
आचार्यों ने प्रह्लाद को अनेक प्रकार से भयभीत करने का प्रयास किया कि वह अपने मन से विष्णु का नाम सदैव के लिए निकाल दे, लेकिन आचार्यों को कोई सफलता नहीं मिली। आचार्यों ने देखा कि जितना प्रह्लाद को डराने धमकाने का प्रयास करते हैं, विष्णु के प्रति उसकी भक्ति और अधिक दृढ़ होती जाती है। अंततः आचार्यों ने विचार किया कि प्रह्लाद को यदि नए-नए विषयों की शिक्षा दी जाए तो हो सकता है कि उसका मन विष्णु से विमुख हो जाए। अपनी इस नवीन सोच के साथ आचार्यों ने प्रह्लाद को भिन्न-भिन्न प्रकार के रोचक विषयों की शिक्षा देना आरंभ कर दिया। अपने इस नवीन प्रयोग से आचार्यों को लगने लगा कि तरह-तरह के विषयों की रोचकता में अब प्रह्लाद ने विष्णु को भुला दिया होगा।
दूसरी ओर असुरराज हिरण्यकशिपु के मन में यह विचार आया कि पुत्र प्रह्लाद से मिले हुए बहुत लंबा समय हो गया है तो फिर क्यों न उससे भेंट की जाए और साथ ही यह भी पता किया जाए कि अब तक उसने क्या-क्या विषय पढ़ लिये हैं। अतः उसने एक सेवक को आश्रम से प्रह्लाद को राज-महल लाने का आदेश दिया। जब सेवक आश्रम पहुँचा और हिरण्यकशिपु का आदेश आचार्यों को सुनाया तो वे भय के मारे थरथर काँपने लगे। उनके मस्तक पर चिंता की लकीरें खिंच गईं और मुख पर पसीने की बूँदें झलकने लगीं। उनका यह सोच-सोचकर बुरा हाल हुआ जा रहा था कि यदि इस बार फिर से प्रह्लाद ने हिरण्यकशिपु के सम्मुख विष्णु का गुणगान कर दिया तो हिरण्यकशिपु उन्हें जीवित नहीं छोड़ेगा। फिर भी उन्होंने अपने मन को सांत्वना दी कि संभव है कि इस बार ऐसा न हो, क्योंकि उन्होंने प्रह्लाद के मन को तरह-तरह के दूसरे विषयों में उलझाने में सफलता प्राप्त कर ली थी।
सबसे पहले आचार्य प्रह्लाद को उनकी माता कयाधू के पास लेकर पहुँचे और उनसे निवेदन करते हुए बोले, “महारानी ! हम किसी प्रकार अनेक प्रयत्न के पश्चात् प्रह्लाद का मन अन्य विषयों की ओर मोड़ने में सफल रहे हैं, परंतु यदि फिर भी प्रह्लाद ने महाराज हिरण्यकशिपु के सम्मुख विष्णु का गुणगान कर दिया तो स्थिति बड़ी विकट हो जाएगी।”
महारानी कयाधू व्याकुल स्वर में बोलीं, “आचार्य ! प्रह्लाद को आपने जैसी शिक्षा दी होगी, वह उसी का वर्णन करेगा और मैं भी उसकी मानसिक स्थिति के बारे में कुछ नहीं कह सकती।”
“महारानी! हमारी समझ में यह नहीं आ रहा है कि आश्रम में किसी ने भी प्रह्लाद को विष्णु के बारे में कुछ नहीं बताया तो फिर वह विष्णु का भक्त कैसे बन गया ?” आचार्य ने चिंतित स्वर में कहा।
“हाँ आचार्य!” महारानी कयाधू गंभीर स्वर में बोलीं, “यह बात तो हमारी समझ में नहीं आ रही है। हम तो यह सोच-सोचकर काँप उठते हैं कि यदि इस बार भी पूर्व की भाँति प्रह्लाद ने विष्णु के प्रति अपनी भक्ति भावना प्रकट की तो न जाने इसका क्या परिणाम होगा ?”
“महारानी! बस यही कारण है कि हम प्रह्लाद को महाराज हिरण्यकशिपु के पास ले जाने के बजाय आपके पास लाए हैं।” आचार्य व्यथित हृदय से बोले, “जिससे कि आप पहले ही प्रह्लाद को भली प्रकार समझा दें कि वह महाराज के सामने विष्णु का गुणगान न करे, अन्यथा प्रह्लाद को तो महाराज के कोप का भाजन बनना ही पड़ेगा, साथ ही हम भी उनके प्रकोप से नहीं बच पाएँगे। अतः आपसे विनती है कि आप प्रह्लाद को भली प्रकार समझा दें। यह न केवल उसके लिए हितकर होगा, बल्कि इसी में हमारा भी हित छिपा हुआ है।”
“मैं आपकी चिंता भली-भाँति समझती हूँ और मैं अपनी ओर से पूरा प्रयास करूँगी कि प्रह्लाद महाराज के सम्मुख ऐसा कुछ न कहे, जिससे वे क्रोधित हों।” यह कहकर महारानी कयाधू ने प्रह्लाद को गोद में उठा लिया और उसे दुलार करने लगीं।
महारानी कयाधू प्रह्लाद के साथ तरह-तरह की बातें करने लगीं, जिससे उन्हें विष्णु के नाम का स्मरण न रहे। उन्होंने प्रहलाद को उत्तम कोटि के वस्त्रों से सुसज्जित कर भोजन कराया और फिर उन्हें लेकर राजदरबार में पहुँचीं। असुरराज हिरण्यकशिपु का दरबार लगा हुआ था। हिरण्यकशिपु स्वर्ण-रत्नों से मंडित एक उच्च सिंहासन पर विराजमान था। जैसे ही महारानी कयाधू दरबार में पहुँचीं तो उन्होंने रीतिनुसार असुरराज का अभिवादन किया। प्रह्लाद ने भी आगे बढ़कर असुरराज के चरण स्पर्श कर उसका अभिवादन किया। अपने पुत्र की इतनी श्रद्धाभक्ति देखकर असुरराज का मन प्रफुल्लित हो उठा। उसने तुरंत ही प्रह्लाद को अपने चरणों से उठाकर हृदय से लगा लिया।
यह दृश्य देख रानी कयाधू के मन को गहन सांत्वना मिली।
“पुत्र!” असुरराज ने प्रेमपूर्वक अपने पुत्र को पुकारा।
“जी पिताश्री!” अपने पिता के निकट सिंहासन पर बैठे प्रह्लाद ने कहा।
“तुम्हें आश्रम में रहते हुए बहुत समय हो गया है।” असुरराज प्रह्लाद की ओर देखते हुए बोला, “जरा हमें भी तो कुछ बताओ कि तुमने आश्रम में अब तक क्या सीखा ?”
“पिताश्री! मैंने ऐसी विद्या सीखी है, जिसके संपूर्ण अधिकारी श्रीहरि विष्णु हैं।” प्रह्लाद ने सुकोमल भाव से कहा, “उनकी ही कृपा से अब मैं भी इस विद्या का अधिकारी बन गया हूँ। वे दया के सागर हैं। यदि कोई शत्रु भी उन्हें संकटकाल में पुकारता है तो वे उसकी रक्षा के लिए दौड़े-दौड़े चले आते हैं। वे करुणानिधान हैं। जो भी उनकी भक्ति करता है, उनका स्मरण करता है, उसके कष्ट स्वतः ही दूर हो जाते हैं। वे सबसे बड़े दानी हैं। उनसे जो भी माँगो, वे सहर्ष दे देते हैं। मेरे हृदय में जो अंधकार था, वह उन्हीं की कृपा से दूर हो गया। अब मुझे ज्ञान का कोई अभाव नहीं है। मुझे श्रीहरि विष्णु की भक्ति क्या मिली कि अब मुझे किसी और वस्तु की चाह नहीं रही। उनकी भक्ति में लगे रहना, उनके नाम का उच्चारण करना, एक सेवक की भाँति उनकी आराधना करना—यह सब तो श्रेष्ठ एवं उच्च ज्ञान की श्रेणी में आता है और यह ज्ञान मुझे प्राप्त हो गया है।”
प्रह्लाद के मुख से इस प्रकार की बातें सुनकर असुरराज का संपूर्ण शरीर क्रोधाग्नि में जल उठा। वह अपने ही पुत्र के मुख से अपने परम शत्रु की प्रशंसा सुनकर भला शांत कैसे रह सकता था। उसे तो आवेश में आना ही था। क्रोध के कारण उसकी भुजाएँ फड़कने लगीं और आँखें किसी दहकते धधकते ज्वलामुखी की भाँति लाल हो गईं। जिस शत्रु को समाप्त करने के लिए उसने इतनी कठिन तपस्या की, हजारों-लाखों संत-महात्माओं की हत्या कर डाली और विष्णु के नाम को समाप्त करने के लिए अपनी संपूर्ण शक्ति लगा दी, उसी का पुत्र उसके परम बैरी का भक्त हो, यह उसके लिए कैसे सहनीय था।
क्रोध के मारे हिरण्यकशिपु की भृकुटि तन गई थी। दरबार में सन्नाटा छा गया। जो जहाँ था, जड़वत् स्थिति में था। असुरराज का क्रोध अब सीमा पार कर चुका था। उसका क्रोध देखकर आचार्यगण भयभीत हो उठे। उनके मस्तक पर पसीने की बूँदे झलकने लगीं। उन्हें लगने लगा कि अब उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना ही पड़ेगा।
असुरराज ने दोनों आचार्यो शंड और अमर्क की ओर देखा तो उनके प्राण ही सूख गए। उनका संपूर्ण शरीर पसीने से तर-ब-तर था। उनकी स्थिति ऐसी हो गई थी, जैसे कसाई के सामने बकरे की हो जाती है। उनकी बुद्धि जैसे जड़ हो गई थी। वे दोनों अपने तर्क में कहें भी तो क्या कहें? उनकी कुछ कहने की शक्ति तो पहले ही जवाब दे चुकी थी। असुरराज कर्कश स्वर में बोला, “क्यों आचार्य! यह सब क्या है ? तुमने मेरे पुत्र को यह कैसा ज्ञान दिया, जो यह मेरे परम शत्रु विष्णु का गुणगान करना सीख गया? क्या तुम्हें इस बात का तनिक भी भय न रहा कि ऐसी स्थिति में तुम्हें हमारे क्रोध का भी सामना करना पड़ेगा ? क्या तुमने यह सोच लिया था कि हम तो गुरुपुत्र हैं और इसी कारण हमें कुछ न कहा जाएगा ?”
असुरराज के ऐसे कठोर वचन सुनकर दोनों आचार्यों की दशा अत्यंत दयनीय हो गई। अपने तर्क में क्या सफाई पेश करें, क्या प्रमाण के रूप में अन्य विद्यार्थियों को पेश करें, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था और यदि कुछ समझ में आ रहा था तो बस वह थी मृत्यु।
आचार्य शंड ने साहस जुटाते हुए हाथ जोड़कर कहा, “महाराज! जैसा बालक प्रह्लाद ने वर्णन किया है, हमारे आश्रम में इस प्रकार की शिक्षा नहीं दी जाती। प्रह्लाद ने अभी-अभी जो वर्णन किया है, यह ज्ञान उसे आश्रम से नहीं मिला है।”
आचार्य शंड के इतने कहने भर से असुरराज को तनिक भी विश्वास नहीं हुआ। उसके मन में यह बात बैठ गई थी कि आश्रम के अतिरिक्त प्रह्लाद को ऐसा ज्ञान कहीं और से कैसे मिल सकता है, प्रह्लाद आश्रम में ही तो शिक्षाध्ययन कर रहा है। अब बारी आचार्य अमर्क की थी। उन्होंने भी कँपकँपाती लड़खड़ाती जिह्वा से कहा, “महाराज! हम आपसे सौगंध खाकर कहते हैं कि प्रह्लाद ने जो कुछ भी वर्णन किया है, उसका ज्ञान उसे आश्रम में कदापि नहीं मिला।”
आचार्यों की बातें सुनकर असुरराज का क्रोध कुछ शांत हुआ। उसने प्रह्लाद पर दृष्टिपात करते हुए कहा, “प्रह्लाद! अपने पिता के परम शत्रु का इस प्रकार गुणगान करते हुए क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती? अतिशीघ्र बताओ कि इस प्रकार की शिक्षा तुम्हें कहाँ से प्राप्त हुई ?”
“पिताश्री! इसमें लज्जा की कैसी बात ?” प्रह्लाद ने निडरतापूर्वक कहा, “सृष्टि की संपूर्ण कृपाओं के आधार त्रिलोकीनाथ भगवान् विष्णु से इस प्रकार का वैरभाव रखना बिल्कुल भी उचित नहीं है। मुझे भगवान् विष्णु के बारे में जो भी ज्ञान प्राप्त हुआ है, वह आश्रम से नहीं, बल्कि मेरे अपने अंतर्मन से प्राप्त हुआ है।”
“मौन हो जा कुल-कलंक!” असुरराज दाँत पीसते हुए बोला, “तू उस कायर विष्णु को त्रिलोकीनाथ कहता है, जो हमारी शक्तियों से भयभीत होकर न जाने कहाँ छिपा बैठा है। वास्तविक त्रिलोकीनाथ तो हम हैं। हमने न केवल तीनों लोकों को विजित किया है, बल्कि चौदह भुवन को जीतकर दसों दिशाओं में असुरों का राज्य स्थापित किया है। रे मूर्ख! सृष्टि की संपूर्ण कृपाओं के आधार हम ही हैं, इसीलिए तू हमें त्रिलोकीनाथ कहकर संबोधित कर।”
“पिताश्री! भले ही आपने तीनों लोकों को विजित किया हो, किंतु उनका सृजन तो आपने नहीं किया।” प्रह्लाद ने कहा,“अतः आप त्रिलोक-विजेता तो हो सकते हैं, किंतु त्रिलोकीनाथ नहीं।”
अपने ही पुत्र के मुख से अपने विपरीत विचारों को सुनकर असुरराज क्रोध से दहाड़ उठा। दरबारीगण समझ गए थे कि अब प्रह्लाद के प्राण संकट में हैं। असुरराज ने अपने सैनिकों को आदेश दिया, “ले जाओ इस कुलघाती को मेरी दृष्टि के सामने से और इसका वध कर दो।”
असुरराज का यह आदेश जारी करना था कि रानी कयाधू आँसू बहाते हुए बोलीं, “स्वामी! यह आप क्या कर रहे हैं? अपने ही प्रिय पुत्र को प्राणदंड का आदेश! नहीं, आप ऐसा अनर्थ न करें।”
“महारानी! यह सत्य है कि प्रह्लाद हमारे लिए अत्यंत प्रिय था, किंतु अब नहीं है।” असुरराज गरजते हुए बोला, “इसने हमारा जो अपमान किया है, उसका इसे उचित दंड मिलना ही चाहिए।”
महारानी कयाधू ने फिर कोई प्रतिरोध नहीं किया। दरबारी भी कुछ न कह सके, क्योंकि वे असुरराज की प्रवृत्ति व उसके क्रोध से भली-भाँति परिचित थे। वे जानते थे कि यदि उन्होंने इस विषय में असुरराज को कुछ समझानेबुझाने का प्रयास किया तो उन्हें भी उसके कोप का भागी बनना पड़ सकता है। अतः उन्होंने शांत रहने में ही अपनी भलाई समझी।
यद्यपि असुरराज ने प्रह्लाद के लिए प्राणदंड का आदेश जारी कर दिया था, तथापि सैनिकों का साहस नहीं हो पा रहा था कि वे प्रह्लाद को बंधनों में जकड़ लें, किंतु वे असुरराज का आदेश भी तो नहीं टाल सकते थे। अतः वे बड़ी कठिनाई से प्रह्लाद को पकड़कर वहाँ से ले गए।
प्रह्लाद ने राजसैनिकों के कार्य में विघ्न डालने का कोई प्रयास नहीं किया और न ही अपने पिता अथवा माता से अपने प्राणों की रक्षा के लिए किसी प्रकार का अनुनय-विनय किया। मौन रहकर राजाज्ञा का पालन करते हुए प्रह्लाद सैनिकों के साथ चल पड़े। असुरराज के प्रति दया, करुणा और प्रेम की मिश्रित अनुभूति स्पष्ट झलकती थी, किंतु उस अनुभूति को कोई भी दरबारी असुरराज के भय से प्रकट कर पाने में असमर्थ था। प्रह्लाद की माता रानी कयाधू की दशा तो अन्य सभी से अधिक दयनीय था। आँसुओं के सागर को उन्होंने पलकों में कैद कर लिया था और हृदय में उठती तीव्र वेदना को वे मूक भाव से पी गईं। संभवतः यही उनकी नियति थी।