सर्पदंश का प्रहार
जब प्रह्लाद नदी की विकराल लहरों के पाश से भी बच गया तो मंत्रियों की सलाह के अनुसार उसे पुनः राज्य में लाया गया। राज्य भर में प्रहलाद के ही नाम का शोर-शराबा था। एक के बाद एक चमत्कार के कारण उसकी लोकप्रियता बढ़ गई थी अथवा यह कहें कि जिधर से भी निकलो, वहीं प्रह्लाद के चर्चे आम तौर पर सुने जा सकते थे।प्रह्लाद हिरण्यकशिपु के लिए गले की फाँस बन गए थे, जो एक प्रकार से प्रतिदिन पीड़ा दे रही थी। वह इस प्रह्लाद रूपी फाँस को निकाले भी कैसे? वह तरह-तरह के प्रयास करके थक गया था और यह सोच-सोचकर परेशान था कि तलवार की तीक्ष्णता इतनी कि किसी का बच पाना असंभव, किंतु प्रह्लाद से टकराकर वह खंडित हो गई। विषाक्त लड्डुओं का सेवन कराया गया तो वह भी अप्रभावी। हाथियों के पाँव तले रौंदा जाना भी बेकार। अब वह प्रह्लाद को मारने के लिए नई युक्ति खोजने में लगा हुआ था।राजदरबार लगा हुआ था। सिंहासन पर बैठा हुआ हिरण्यकश्यपु विचारमग्न था। सभी दरबारी उसकी ओर इस आशा से देख रहे थे कि वह कुछ कहे, किंतु जब बहुत समय हो गया तो सेनापति इल्वल बोला, “महाराज! आप किस सोच में डूबे हैं ?”“सोच!” हिरण्यकशिपु सेनापति इल्वल की ओर देखते हुए बोला, “अब सोचने के लिए रह भी क्या गया है? अनेक क्रूरतम उपाय करने के पश्चात् भी कुलघाती प्रह्लाद के प्राण बच गए। अब ऐसा क्या किया जाए कि वह कुल-कलंक किसी भी प्रकार से अपनी प्राणरक्षा न कर सके।”जिसकी बुद्धि अनियंत्रित हो चुकी हो, उसे कौन किस प्रकार समझाए कि प्रह्लाद की प्राणरक्षा कोई और नहीं, बल्कि स्वयं सृष्टि के पालनकर्ता भगवान् विष्णु कर रहे हैं। यद्यपि मंत्रिगण यह तथ्य भली-भाँति जानते थे, किंतु वे इस बात से डरते थे कि यदि उन्होंने भगवान् विष्णु का गुणगान तो दूर, उनका नाम भी लिया तो फिर उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ सकता है। वे यह सब तो अपनी आँखों से देख ही चुके थे कि जो अपने पुत्र के साथ क्रूर से क्रूरतम व्यवहार कर सकता है, वह उनके साथ न जाने कितना क्रूर व्यवहार करे। इसी कारण वे चुप थे और बस, उसकी हाँ में हाँ मिलाने में ही अपनी भलाई समझते थे।यह दृश्य उसे बहुत ही हैरान करने वाला था कि उसने स्वयं अपनी आँखों से प्रह्लाद को बचते हुए देखा था। अब उसकी हिंसा और भी प्रबल हो उठी थी। उसके लिए नीति अनीति का कोई महत्त्व नहीं रह गया था। उसका एकमात्र उद्देश्य प्रह्लाद का वध करना था और उसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार था। उसे उसने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न जो बना लिया था।रानी कयाधू ने हिरण्यकशिपु को लाख समझाया, किंतु वह किसी की कहाँ सुनने वाला था। अभी भी उसे अपनी शक्ति पर अभिमान था, जो हर बार के चमत्कार के पश्चात् तार-तार हो चुकी थी। अहंकार तो उसके शरीर में रक्त की भाँति संचरित हो रहा था। जिस स्वभाव को उसने जन्मकाल से ही अपनाया था, जिसकी तृप्ति के लिए उसने चाहे अनचाहे अनेक युद्धों का आयोजन किया था और जिसे उसने अपने जीवन का आधार बना लिया था, उस अहंकार को छोड़ना उसके लिए एक प्रकार से मृत्यु का वरण करना था।हिरण्यकशिपु को प्रह्लाद में भगवान् विष्णु की छवि दिखाई देती थी और विष्णु तो थे ही उसके परम शत्रु। भला शत्रु से मित्रवत् व्यवहार कैसे किया जा सकता था, जब उसके मन-मस्तिष्क में यह बात घर कर गई थी कि असुर-कुल के लिए विष्णु अत्यंत घातक है। वह प्रह्लाद को मारने के लिए और उपाय सोचने लगा।प्रतिदिन दरबार लगता। हिरण्यकशिपु अपने मंत्रियों और सेनापतियों से विचार-विमर्श करता कि किस प्रकार अपने शत्रु-रूप में जनमे पुत्र का दमन किया जाए और किस प्रकार उस काँटे को निकाल फेंका जाए, किंतु अभी तक उसे कोई नई युक्ति नहीं सूझी थी। इसी कारण उसके स्वभाव में परिवर्तन आ गया था। वह बात-बात पर क्रोधित होने लगा था, झल्लाने लगा था। उसका क्रोध इतना बढ़ गया था कि अब कोई भी उसके सम्मुख सिर उठाकर बात करने का साहस तक नहीं करता था।प्रह्लाद को घोर यातनाएँ एवं प्रताड़नाएँ देते-देते निराश एवं हताश हो चुके हिरण्यकशिपु के जीवन का ऐश्वर्यवैभव, मानो सब छिन गया था। उसकी दशा बड़ी दयनीय हो गई थी। राजकार्य अव्यवस्थित होने लगे थे और यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी कि लोगों में राजाज्ञा और राजदंड का भय अपेक्षाकृत कम होने लगा था। दरबारीगण असुरराज इस बारे में कुछ भी कहने का साहस न कर पाते थे, क्योंकि वे महाराज की मनोदशा भली प्रकार जानते थे। एक दिन सेनापति नमुचि ने संकोच करते हुए धीरे से कहा, “महाराज! मैं कुछ अनुरोध करना चाहता हूँ।”“हाँ नमुचि!” हिरण्यकशिपु गंभीर स्वर में बोला, “कहो, क्या कहना चाहते हो ?”“महाराज! आप राजकुमार प्रह्लाद को क्षमा...।” नमुचि ने इतना ही कहा था कि उसकी बात को बीच में ही काटते हुए हिरण्यकशिपु क्रोधावेश से चिल्लाते हुए बोला, “नमुचि! उचित शब्दो का प्रयोग करो। इतना सब कुछ हो जाने के पश्चात् भी मैं उस कुलघाती को क्षमादान दूँ। यदि तुम हमारे प्रिय न होते तो संभव है कि अभी तक जीवित न होते।”असुरराज की आँखों से क्रोधाग्नि निकल रही थी। यह देखकर नमुचि क्षमा याचना करते हुए बोला, “महाराज! मुझे खेद है कि मैं आपको चिंतातुर देखकर त्रुटिपूर्ण सुझाव दे बैठा। वास्तव में मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मैं आपका तुच्छ सेवक क्षमाप्रार्थी हूँ। स्वामी, कृपया मुझे क्षमादान देकर कृतार्थ करें।”“नमुचि! हम जानते हैं कि तुमने अनादर भाव से हमारे लिए वह प्रस्ताव नहीं रखा था।” हिरण्यशिपु अपेक्षाकृत शांत स्वर में बोला, “बल्कि तुम भी हमारी समस्या का समाधान करने हेतु उतने ही व्यग्र हो, जितने कि हम स्वयं हैं, किंतु तुम्हारा समाधान कदाचित् समस्या के विपरीत है, फिर भी हमने तुम्हें क्षमा किया।”नमुचि ने शीश झुकाकार हिरण्यकशिपु का अभिवादन किया और क्लांत भाव से धीरे-धीरे वहाँ से चला गया।हिरण्यकशिपु जितने क्रूर स्वभाव का था, उससे भी कहीं अधिक क्रूर स्वभाव के उसके मंत्री, सेनापति, और सलाहकार थे। ये मंत्री चापलूस तो थे ही, साथ ही लालची भी थे। अपने राजा को प्रसन्न करने के लिए वे कोई भी नीच कर्म करने से नहीं हिचकते थे। उनकी नीचता पर हिरण्यकशिपु को सबसे अधिक प्रसन्नता होती थी। हिरण्यकशिपु को जैसे ही समिति द्वारा विषैले सर्पों से प्रह्लाद को डसवाने का उपाय सुझाया गया, उसने तुरंत ही उस दिशा में कार्य आरंभ करवा दिया। उसने अपने सेवकों को आज्ञा दी कि राज्य भर से तीक्ष्ण विषैले सर्पों को लाया जाए। उसने यह घोषणा भी करवा दी कि जो भी जितने अधिक विषधर लाएगा, उसे उतना ही बड़ा पुरस्कार व सम्मान दिया जाएगा।हिरण्यकशिपु का आदेश पाते ही अनेक सेवक अधिकाधिक विषधरों की खोज में जुट गए। कुछ ही समय में वे अनेक प्रकार के छोटे-बड़े भयानक और विषैले सर्प ले आए, जिन्हें देखकर हिरण्यकशिपु को अतीव प्रसन्नता हुई। जिस समय प्रह्लाद अपने इष्टदेव श्रीहरि की भक्ति में लीन था, उस समय उन विषैले सर्पों को कोठरी में छोड़ दिया गया। इस बात की प्रह्लाद को कोई जानकारी नहीं थी, किंतु जब विषैले सर्पों ने फुफकारना आरंभ किया तो उनका ध्यान भंग हुआ। वे जरा भी भयभीत नहीं हुए और अपने प्रभु का नाम स्मरण करते रहे। जिस पर प्रभु की कृपा हो, भला उसका अहित कैसे हो सकता है! सर्पों ने उनका कुछ भी अहित नहीं किया और कुछ क्षणों के पश्चात् उन सर्पों ने फुफकारना भी बंद कर दिया। सभी सर्प उस कोठरी में एक ओर इस प्रकार बैठ गए, जैसे स्वयं प्रभु ने उन्हें इसकी आज्ञा दी हो। अंतत: हिरण्यकशिपु अपनी इस कुटिल चाल में भी विफल रहा।