भयानक लहरों के बीच
बार-बार हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को क्षति पहुँचाने की कुचेष्टा करता और बार-बार प्रह्लाद अपने आराध्य देव भगवान् विष्णु की कृपा से प्रत्येक संकट से बाहर निकल आते। अपने गलत इरादों में असफल होने के बाद भी हिरण्यकशिपु को सीख नहीं मिली थी कि यह सब भगवान् विष्णु की ही कृपा है, जो प्रह्लाद प्रत्येक संकट से बचे हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता था, मानो भगवान् विष्णु नहीं, बल्कि प्रह्लाद उसके परम शत्रु हों। उसकी सभी कोशिशें धूल में मिल गई थीं। वह किसी भी प्रकार से प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं कर सका था।
हिरण्यकशिपु, जिसने तीनों लोकों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था, वह अपने ही निहत्थे व सुकोमल पुत्र से एक प्रकार से परास्त हो गया था और इस पराजय को वह किसी भी तरह से पचा नहीं पा रहा था। यह उसके लिए कितने धिक्कार की बात थी कि जिसने देवराज इंद्र को अपने प्राण बचाने के लिए इधर-उधर दौड़ने के लिए विवश कर दिया था, वही आज एक बालक के सामने झुक गया था। वह सब प्रकार के उपाय करके हार गया, किंतु अपने मनोरथ में सफल न हो सका।
प्रह्लाद को किस प्रकार मारा जाए, यह सवाल उसके जी का जंजाल बन गया था। हर बार की विफलता के कारण उसे अपमान का घूँट पीना पड़ रहा था। उसकी रातों की नींद और दिन का चैन सब काफूर हो गया था। उसकी रास-रंग और नृत्य की महफिले गायब हो गई थीं। अब उसके आठों पहर बेचैनी में गुजरने लगे थे।
हिरण्यकशिपु की दयनीय दशा देखकर मंत्रियों को चिंता सताने लगी। उन्हें यह भय त्रस्त करने लगा कि यदि उनके प्रतापी राजा को कुछ हो गया तो उनका क्या होगा? उनकी समस्त असुर जाति की रक्षा कौन करेगा ? क्योंकि हिरण्यकशिपु चिंता के कारण प्रतिदिन व्यथित होता जा रहा था। एक दिन कुछ मंत्री एकत्र होकर उसके पास आए और उसे यह उपाय बताया कि प्रह्लाद को डुबोर मार दिया जाए। इससे प्रह्लाद बिल्कुल भी न बच सकेगा। मंत्रियों का उपाय जानकर हिरण्यकशिपु के शरीर में नवचेतना जाग्रत् हुई। मंत्रियों का यह उपाय उसे बड़ा कारगर लगा। अब उसने सोचा कि देखता हूँ, जल की भयानक एवं विकराल लहरों के पाश से प्रह्लाद स्वयं को कैसे बचा पाता है! उसकी आँखों में एक नई चमक पैदा हो गई थी।
प्रातःकाल से ही राज्य भर में यह बात जंगल में लगी आग की तरह फैल गई कि प्रह्लाद को जल में डुबोकर मारा जाएगा। जब यह बात रानी कयाधू के कानों में पहुँची तो वे दौड़ी-दौड़ी हिरण्यकशिपु के पास आई और बोलीं, “महाराज! ऐसा अन्याय मत कीजिए। उस नन्हे से बालक का क्या दोष, जो आप उसे मारने के लिए तरह-तरह के उपाय कर रहे हैं और आपने तो देख भी लिया कि उसके अहित में आपका हित नहीं है, बल्कि उसके हित में ही आपका हित है।”
“महारानी! आपको हमारे लिए इस तरह की बातें करना शोभा नहीं देता।” हिरण्यकशिपु क्रोधित स्वर में बोला, “और हमें यह हित-अहित का पाठ पढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है।”
हिरण्यकशिपु ने रानी कयाधू का कोई अनुनय-विनय नहीं सुना और उन्हें मायूस होकर वहाँ से जाना पड़ा।
हिरण्यकशिपु के आदेशानुसार प्रह्लाद को बाँधकर लाया गया और सैनिक उन्हें नदी की ओर लेकर चल पड़े। यह दृश्य देखने के लिए हजारों व्यक्ति एकत्र हो गए थे। सभी की साँसें जैसे रुकी हुई सी थीं। एक अबोध बालक को इतनी कठोर सजा और वह भी किसके द्वारा, अपने ही पिता द्वारा! हिरण्यकशिपु की बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी। उसे अपने स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। यही कारण था कि वह उचित-अनुचित का भेद भी नहीं जान पा रहा था।
नदी में उठ रही विशाल एवं भयानक लहरें भयभीत करने वाली थीं। इन लहरों की भीषण गर्जना सुनकर आतंक से आत्मा तक काँप उठती थी। हिरण्यकशिपु ने जब एक ऊँची चट्टान से नदी की विकरालता एवं भयानकता को देखा तो वह ठहाका लगा उठा, “हा...हा...हा... अब देखता हूँ, कैसे बचेगा प्रह्लाद! हा... हा...।”
फिर हिरण्यकशिपु ने अपने सैनिकों को उस ऊँची चट्टान से प्रह्लाद को नीचे नदी में गिराने की आज्ञा दी। हिरण्यकशिपु को यह विश्वास था कि इससे पहले भले ही प्रह्लाद बच गया हो, किंतु इस बार वह नदी में डूबकर अपने प्राण अवश्य त्याग देगा।
हिरण्यकशिपु का आदेश पाते ही सैनिकों ने प्रह्लाद को नदी में फेंक दिया और इसी के साथ हजारों आँखें उस निरीह बालक को नदी के गर्भ में जाते हुए देखने लगीं। हिरण्यकशिपु की भाँति सभी को यही लगता था कि प्रह्लाद का बच पाना असंभव है, परंतु जिसके तारणहार स्वयं भगवान् ही हों तो फिर भला उसे मृत्यु का कैसा भय! फिर तो कोई भी उसका क्या अहित कर सकता है, उसका क्या बिगाड़ सकता है ?
जब प्रह्लाद इतनी ऊँचाई से नदी में गिरा तो उसे जरा भी चोट न लगी और यह क्या, उसके बंधन भी स्वतः टूटकर बिखर गए थे। वह नदी में गिरा भी तो ऐसे, जैसे रुई के ढेर पर गिरा हो। तभी एक चमत्कार हुआ। उसकी रक्षार्थ एक विशाल कमल ने उन्हें अपने आगोश में ले लिया और तैरते हुए नृत्य सा करने लगा। उस कमल पर बैठे हुए प्रह्लाद उच्च स्वर में अपने आराध्य देव का स्तुति गान कर रहे थे। जब लोगों ने यह दृश्य देखा तो उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। उनके लिए यह विश्वास करना कठिन हो रहा था कि इतनी ऊँचाई से गिरकर बच जाना किस प्रकार संभव है। उन्होंने देखा कि प्रह्लाद को बंधनों में जकड़कर नदी में फेंका गया था, किंतु बंधनों का तो कोई नामो-निशान तक न था। कुछ ही समय में कमल पुष्प तट पर आ लगा और प्रह्लाद उससे ऐसे नीचे उतर गये, जैसे किसी नौका से उतर रहे हो।
प्रह्लाद को सुरक्षित लौटते देख हिरण्यकशिपु भी आश्चर्यचकित था। वह एकटक प्रह्लाद को देखता रहा, किंतु अभी भी उसकी आँखों में विकरालता थी। इन घटनाओं को देखने के बाद भी, जिनका साक्षी वह स्वयं था, उसकी आँखों पर से स्वार्थ व अभिमान का परदा नहीं हटा। प्रभु उसे चेता रहे थे, किंतु ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह चेतना ही नहीं चाहता था।
राजकार्यों से हिरण्यकशिपु का ध्यान हट गया था और प्रह्लाद का किस प्रकार वध किया जाए, इस ओर ही लगा हुआ था।