Bhakt Prahlaad - 12 in Hindi Spiritual Stories by Siya Kashyap books and stories PDF | भक्त प्रह्लाद - 12

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भक्त प्रह्लाद - 12

गजानन-परीक्षा

प्रभु की लीला अपरंपार है। उसे जान पाना, समझ, पाना हर किसी के वश की बात नहीं। उसकी इच्छा हो तो अग्नि में से जल का स्रोत फूट पड़े अथवा जल से अग्नि की भयानक लपटें निकलने लगें। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं। सबकुछ उसकी दया दृष्टि पर निर्भर करता है। उसका खेल बड़ा निराला है। वह जिसे चाहे जीत दिला दे और जिसे चाहे हार का कड़वा घूँट पिला दे। यह विदित नहीं कि वह कब क्या कर दे।

भला कोई किसी पर तलवार से और भालों से वार करे और वह बच जाए तो इसे प्रभु की लीला ही तो कहा जाएगा। प्रह्लाद के साथ भी यही हुआ था। पहले उन पर अनेक अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार किए गए, किंतु उन्हें कुछ भी हानि न हुई, फिर उन्हें विषैले लड्डुओं का सेवन कराया गया, तब भी उन्हें कोई हानि न हुई।

जब असुरराज हिरण्यकशिपु को यह सूचना मिली कि विषैले लड्डुओं को खाने के बाद भी प्रह्लाद जीवित है तो वह बुरी तरह से बौखला उठा। यह जानकर वह आश्चर्यचकित था और क्रोधित भी। वह सोच रहा था कि इतना तीव्र विष जिसे सूँघते ही प्राण-पखेरू उड़ जएँ, उसका सेवन करने के बाद प्रह्लाद कैसे जीवित बच गया! यह उसके लिए चिंता का विषय बन गया था।

हिरण्यकशिपु बड़ा अहंकारी और हठी था। जैसे-जैसे मृत्यु प्रह्लाद से दूर होती जाती थी, वैसे-वैसे वह भी प्रह्लाद को मृत्यु के मुख में धकेलने के लिए दृढ़ होता जा रहा था। प्रह्लाद की प्राणरक्षा के लिए स्वयं भगवान् उनके साथ थे, किंतु हिरण्यकशिपु के साथ कौन था? क्रोध, ईर्ष्या, हठ और अभिमान के अतिरिक्त कुछ भी उसके साथ न था और इन्हीं दुर्व्यसनों के फेर में पड़कर वह अपना जीवन नष्ट करने पर तुला हुआ था।

प्रह्लाद को मारने के लिए हिरण्यकशिपु ने अब कोई अन्य उपाय सोचना आरंभ कर दिया था। वह प्रकृति से ही क्रूर विचारों का था और संस्कार के रूप में भी उसे दूसरों पर अत्याचार करने की शिक्षा मिली थी। चूँकि वह प्रह्लाद का पिता था, इसीलिए उसके मन में आया कि क्यों न एक बार फिर प्रह्लाद को समझाया जाए कि वह अपना हठ त्याग दे और उसकी बात स्वीकार कर ले।

एक दिन हिरण्यकशिपु उस अँधेरी कोठरी में गया, जिसमें उसने प्रह्लाद को रखा हुआ था। ऐसा नहीं था कि वह प्रह्लाद से प्रेम नहीं करता था, किंतु अभिमान के कारण उसकी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो चुकी थी कि क्या उचित है और क्या अनुचित। वह प्रह्लाद के निकट पहुँचा और बोला, “प्रह्लाद! तुम यों विष्णु का गुणगान करना क्यों नहीं छोड़ देते, जबकि विष्णु हमारा परम शत्रु है। हमारे पुत्र होकर तुम उस असुर-कुल के अहितकारी विष्णु का नाम जपते हो, इससे अधिक लज्जा की बात हमारे लिए और क्या हो सकती है ?”

अपने पिता के मुख से अपने आराध्य के प्रति ऐसे कठोर दुर्वचन सुनकर भी प्रह्लाद मुसकराने लगे। वे समझ गए थे कि अहंकार की अग्नि में जलकर ही उनके पिता यह सब कह रहे हैं। प्रह्लाद ने बड़े विनीत स्वर में कहा, “पिताश्री! आप अकारण ही भगवान् विष्णु पर दोष लगा रहे हैं, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। वे तो निर्दोष और निर्लिप्त हैं। आप व्यर्थ ही उन्हें अपराधी मान बैठे हैं।”

प्रह्लाद का कहा एक-एक शब्द हिरण्यकशिपु के तन-मन में तीर की भाँति चुभ रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि अपने पुत्र को वह समझाए भी तो कैसे! वह ऐसी कौन सी युक्ति का प्रयोग करे, जिससे प्रह्लाद विष्णु का नाम लेना सदा-सर्वदा के लिए भूल जाए! जिसे केवल और केवल अपनी प्रशंसा सुनने की आदत पड़ चुकी थी, वह भला किसी और की प्रशंसा अपने सामने कैसे सुन सकता था और फिर प्रशंसा करने वाला उसका अपना ही पुत्र हो तो फिर स्थिति बड़ी विकट बन जाती है। तभी एकाएक वह गरजकर बोला, “प्रह्लाद! क्या तुम यह नहीं जानते कि आज संसार में मेरा प्रतिरोध करने वाला कोई भी नहीं है और तुम हो कि मेरे ही पुत्र होकर मुझे शिक्षा देने का साहस कर रहे हो। यदि तुम्हें विष्णु का नाम लेना है, उसका गुणगान करना है तो करो, किंतु यह स्मरण रहे कि आज से मेरी संपूर्ण शक्ति तुम्हारे विरोध में खड़ी है।”

यह कहते हुए हिरण्यकशिपु का शरीर क्रोध की अधिकता से काँपने लगा। अपनी बात स्पष्ट करने के बाद वह वहाँ से चला गया और सीधे मंत्रणा भवन में जा पहुँचा। उसने तुरंत मंत्रियों को वहाँ आने के लिए बुलावा भेजा। कुछ देर पश्चात् मंत्रियों का पूरा दल मंत्रणा कक्ष में आ गया। हिरण्यकशिपु का अभिवादन कर वे एक ओर बैठ गए। कुछ देर तक कक्ष में शांति छाई रही। किसी भी मंत्री की कुछ कहने या बोलने की हिम्मत न हुई। सभी यह सोच रहे थे कि स्वयं असुरराज ही चर्चा की शुरुआत करें, किंतु जब बहुत देर हो गई तो एक वृद्ध मंत्री बोला, “क्या बात है महाराज! आज आप इतने चिंतित क्यों है ?”

“प्रह्लाद के कारण हमारी चिंता अब और अधिक बढ़ गई हैं।” हिरण्यकशिपु व्यग्र स्वर में बोला, “यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि प्रहलाद को मारने के लिए अनेक उपाय किए गए, किंतु एक भी उपाय सफल नहीं हुआ। क्या यह सोचने वाली बात नहीं है कि उसके शरीर पर तलवार और भालों का कोई प्रभाव नहीं हुआ? दूसरी बात यह है कि इतने विषैले लड्डू खाने के बाद भी उसे बेहोशी तक न आई। हमारी समझ में यह बात नहीं आती कि प्रह्लाद का शरीर किस चीज का बना हुआ है। आखिर उसकी काया पर किसी चीज का प्रभाव क्यों नहीं होता है ? क्या यह हैरान करने वाली बात नहीं है ?”

हिरण्यकशिपु की बात सुनकर एक मंत्री बोला, “महाराज! आप चिंतित क्यों होते हैं? ऐसा भी तो हो सकता है कि प्रह्लाद कोई जादू-विद्या जानता हो और उसी से वह अपनी रक्षा कर रहा हो। मेरे विचार से कोई ऐसा काम किया जाए, जिससे वह मृत्यु के पंजे से छूटने न पाए।”

“हाँ, तो बताइए न वह उपाय!” हिरण्यकशिपु उत्तेजित होते हुए बोला।

“असुरराज! ऐसा किया जाए कि प्रह्लाद के हाथ-पैर बाँधकर उसे हाथी के पैरों तले डाल दिया जाए।” मंत्री ने अपना सुझाव देते हुए कहा, “तब देखिए कि वह मरता है या नहीं और फिर यदि नहीं मरता है तो ज्ञात हो, जाएगा कि वह कैसे बचता है!”

मंत्री की बात हिरण्यकशिपु को उचित लगी। वह बोला, “तो फिर ठीक है, हम ऐसा ही करेंगे और देखेंगे कि प्रहलाद के प्राण यदि बचते हैं तो फिर कैसे बचते हैं!”

इस प्रकार हिरण्यकशिपु के आदेशानुसार हाथियों का एक रैला लाया गया और साथ ही यह भी आज्ञा दी गई तुरंत ही प्रह्लाद को बाँधकर लाया जाए। उसकी आज्ञा करने की देर थी, तुरंत ही उसके दोनों आदेशों का पालन किया गया। जब प्रह्लाद को बंधनों में जकड़कर उसके सामने लाया गया तो असुरराज चिल्लाते हुए बोला, “सैनिको! इस कुलघाती को इन हाथियों के पैरों तले कुचल डालो।”

“महाराज! ऐसा अन्याय न कीजिए।” निकट ही खड़ी रानी कयाधू ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “इस कोमल सी काया वाले बच्चे के लिए इतना कठोर आदेश न दीजिए। कृपया इस पर दया कीजिए।” 

“महारानी! यह विद्रोही हमारी दया के योग्य नहीं है।" हिरण्यकशिपु गरजकर बोला, “अब, जब यह हाथियों के पैरों तले कुचला जाएगा तो देखेंगे कि इसका विष्णु इसे किस प्रकार बचाता है।”

फिर क्या था, हिरण्यकशिपु के आदेश पर प्रह्लाद को हाथियों के पैरों तले डाल दिया गया और एक-एक कर हाथी उनके शरीर के ऊपर से गुजरने लगे। हिरण्यकशिपु का विचार था कि जब हाथी प्रह्लाद के शरीर के ऊपर से गुजरेंगे तो वह भय के मारे चीख-पुकार करेगा, किंतु सब कुछ उसकी सोच के विपरीत हुआ। प्रह्लाद के मुख से चीख तो क्या, आह जैसा शब्द भी न निकला। वह आँखें बंद किए हुए भगवान् विष्णु का स्मरण करता रहा।

जब हाथियों का रैला गुजर गया और प्रह्लाद को कुछ भी न हुआ तो हिरण्यकशिपु के साथ-साथ वहाँ उपस्थिति प्रत्येक असुर की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं। यह दृश्य देख सभी दंग रह गए। अब हिरण्यकशिपु करे भी तो क्या! वह पैर पटकता हुआ वहाँ से चला गया।