गुणा कहता है --
> क्या बात है यार ये अचानक बाइक की लाइट क्यो बंद हो गई।
आलोक बाइक की लाइट चैक करने लग जाता है पर अंधेरा होने के कारण उसे कुछ समझ मे नही आता । आलोक अपना की टॉर्च जलाकर दैखने लग जाता है और चतुर से कहता है---
> चतुर जरा दैख तो अंदर मे कही वायर तो नही छुट
गयी है।
चतूर भी बाइक की लाइट को दैखने लग जाता है। तभी गुणा की नजर सड़क पर बैठे दौ पक्षीयों पर जाता है। अंधेरा होने पर भी उन पक्षीयों की आंखे लाल चमक रहा था। गुणा ये कंफर्म करने के लिए थोड़ी आगे बड़ाता है के वो चमकने वाली क्या चिज है।
कुछ कदम आगे बड़ने पर गुणा दैखता है के वहा पर दौ पक्षी बैठे थे जिसकी आंखे बड़ी बड़ी और लाल थी और वो इन तिनो को ही दैख रही थी। गुणा पक्षीयों के आंखो को दैखकर डर जाता है । गुणा सामने पड़ी एक पत्थर को उठाता है और उन दौनो पक्षीयो की तरफ फैकने जाता है तभी आलोक गुणा को रौकते हूए कहता है--
>अरे गुणा तु वहां क्या कर रहा है।
गुणा बिना कुछ जवाब दिये ही इन दौनो पक्षी पर पत्थर फेंक दैता है जो पक्षी बने मातंक के सिर पर लग जाता है जिससे मांतक घायल हो जाता है। मांतक के सर से खून निकलने लगता है। जिससे दैखकर त्रिजला गुस्सा हो जाती है और कहती है--
> इन मानवो का इतना साहस त़के ये हम पर पत्थर
फेंके। मैं अभी इन्है़े सबक सिखाती हूँ।
त्रिजला के इतना कहते ही मांतक त्रिजला को रौकते हूए कहता है--
> नही ! रुको त्रिजला । शांत हो जाओ तुम कुछ नही करोगी। तुम्हारे इस गुस्से के कारण इनका हमपर संदेह भी हो सकसा है । इसिलिए अपने गुस्से पर संयम रखो। ये मनुष्य तो होते ही मुर्ख है। ये तो इनका स्वभाव है बेजुबान को मारना।
त्रिजला फिर गुस्से से कहती है--
> अगर इन सबको हमारे बारे मे पती चल भी गया तो मैं इन्हे यही पर समाप्त कर दूगीं।
मांतक फिर त्रिजला को समझाते हूए कहता है--
> नही त्रिजला हम ऐसा नही कर सकते । क्योकींं ये मत भुलो के हम वचन बध्द हैं। हम किसी भी निर्दोष को हानी नही पहूँचा सकते और ये लोक हमारा नही है इम मानवो का है। हम इमके लोक मैं आये है। इसिलिए भुल इनका नही हमारा है।
मांतक के सिर से खुन वह रहा था । जिसे दैखकर त्रिजला का गुस्सा और बड़ जाता है। त्रिजला मांतक से कहती है --
> स्वामी भले ही हम अभी इनके लोक मे आए है परतुं हमने किसीको हानी नही पहूँचायी और इस मानव ने आप पर पत्थर फेंक कर भुल किया है। जिसका दंण्ड तो इन्हे मिलेगा ही । भले ही मैं इसे मार नही सकती पक उस दुष्ट को दंण्ड अवस्य दे सकती हूँ जिसने आपकी ये दशा की है।
मातंक उससे कुछ कह पाता इससे पहले त्रिजला वहां से उड़कर गुणा की और तेजी से जाने लगती है। जिसे दैखकर गुणा घबरा जाता है। त्रिजला गुणा के दौनो गालो पर अपने तेज नाखुनो से वार करती है जिससे गुणा के दौनो गालो से खून बहने लगती है । गुणा दर्द से कराहते हुए कहता है--
.> आह ! मेरा गाल कमीनी पक्षी तेरा सर्वनाश हो । मैं तुझे नही छौड़ूगां ।
इतना बोलकर गुणा एक और पत्थर उठाता है और उन पर जैसै ही फेकने जाता है के आलोक और चतुर दौनो ही गुणा को रौकते हूए कहता है--
> रूको ये तुम क्या कर रहे हो। किसी बेजुबान को
मारना अच्छी बात नही है। अभी तुने दैखा ना उसे पत्थर मारने का नतीजा ।
चतुर कहता है--
.> बुरे काम का बुरा नतीजा।
चतुर गुणा के घांव को दैखते हूए कहता है--
> इस्स। कितना खुन बह रहा है ।
चतूर कहता है --
> अब पता तला किसी निर्दोष को मारने से क्या होता
है। इसे भी ऐसे ही दर्द होता होगा।
चतूर कुछ कदम आगे बड़कर कहता है--
> हे पक्षीयों मेरे दोस्त को माफ कर देना इसने जो
गलती की है आपने उसकी सजा इसे दे दिया है। अब आप शांत हो जाईए।
चतूर मांतक के खुन को दैखकर कहता है--
> उफ तुम्हें भी काफी चोटें आई है। अगर मे़ैं तुम्हे पकड़ पाता तो मैं तुम्हारे घांव पर मलहम लगा देता पर मेरी बात तो तुम समझ ही नही सकती।
चतूर के माफी मागंने से त्रिजला की गुस्सा शांत हो जाता है। और दौनो ही वहां से उड़कर चला जाता है। मांतक और त्रिजला के जाते ही बाइक की लाइट अपने आप जल उठती है। जिसे दैखकर चतूर खूश होकर कहता है--
> दैखा अच्छे काम का नतीजा हमेशा अच्छा ही होता
है। मैने माफी मांगी तो लाइट जल गयी और तुमने पत्थर मारा तो उसकी परीणाम सामने है।
चतुर गुणा के गालों को दैखकर हंसने लगता है। आलोक चतुर से कहता है--
> वो सब तो ठीक है। पर एक पक्षी का ऐसे गुणा पर
हमला करना तुम्हे अजीब नही लगता उसका हमला ऐसे था वह गुणा को और मारना चाहता था जबकी किसी भी पक्षी को पत्थर मारने से वह वहा से उड़ कर भाग जाती है पर ये भागी नही बल्की उलटा गुणा पर ही हमला कर दिया। ये कुछ अजीब नही लग रहा है।
आलोक की बात पर चतूर भी कहता है--
> हां यार इस बारे में तो मैने सौचा ही नही और मेरे माफी मांगने पर वो सच मे चले गये। ये आज कल
सब कुछ अजीब नगी हो रहा है ?
आलोक कहता है --
> अब पहले हमे उस चेतन के पास चलना होगा ।
जिसके के लिए दैर हो रही है।
इतना बोलकर सभी बाइक पर चड़ जाता है। गुणा अपने दौनो हाथों को दौनो गालो पर रथ कर बैठ जाता है। आलोक कहता है--
> गुणा तु ठीक है ना या तुझे हॉस्पिटल पैड़ दूं ?
गुणा कहता है--
> नही यार मैं ठीक हूँ अगर हम हॉस्पिटल की और गये तो चेतन निकल जाएगा। इसिलिए पहले उसे ढुंढ ले फिर हॉस्पिटल ।
गुणा के इतना कहने पर आलोक बाइक स्टार्ट करते हवेली की और चला जाता है। उधर हवेली के उपर फिर से मांतक और त्रिजला दक्षराज पर नजर रखने के लिए बैठ जाता है। जहां पर दक्षराज चेतन से बातें कर रहा था और दयाल वही पास में बैठा था। तभी दक्षराद का फोन रिंग होने लगता है ।
दक्षराज अपना फोन दैखता है जिसमे चट्टान सिंह का फोन था़ दक्षराज फोन दैखकर कहता है--
.> ये चट्टान इतनी रात को क्यों कॉल रहा है।
दक्षराज फोन रिसिव करते कहता है--
> हां चट्टान बोल । इतनी रात को अचानक कॉल क्यों किया सब ठीक तो है ना ?
चट्टान सिंह कहता है--
> मेरे यहीं तो सब ठीक है। पर कुछ दैर बाद तेरे वहां
पर कुछ ठीक नही रहेगा।
दक्षराज हैरानी से पूछता है--
.> मेरे यहां ठीक नही रहेगा का क्या मतलब ? च
ट्टान सिंह कहता है--
> चेतन कहां पर है ?
चट्टान से चेतन के बारे में सुनकर दक्षराज हैरान हो जाता है और चट्टान सिंह से पूछता है--
> तुझे कैसै पता के चेतन यहां आया है ?
चट्टान सिंह हंसते हूए कहता है--
> हा हा हा हा ।
चट्टान सिंह दक्षराज को हॉस्पिटल वाली सारी बात बोलकर सुनाता है। जिससे सुनकर दक्षराज सौच मे पड़ जाता है के चेतन को अब ज्यादा दैर तक हवेली पर रखना सही नही होगा।
क्योकी आलोक और उसके दोस्त कभी भी चेतन को ढुंढते हूए यहां पर आ सकते है। उधर से चट्टान सिंह कहता है--
> दक्षराज तु मेरा दोस्त है इसिलिए मुझे लगा के तुम्हे
इस बारे पता चले। ताकी तुझे आलोक के सामने शर्मिन्दा ना होना पड़े। मगर दक्षराज एक बात याद रखना के अब कुछ भी गलत काम मत करना जिसका दंणड तुम्हारे साथ साथ निर्दोष गांव वालो को भी भोगना पड़े।
दक्षराज चट्टान को थैंक्स बोलकर फोन काट देता है। और चेतन ती दैखता है जिससे दैखकर दक्षराज हैरान हो जाता है। दक्षराज दैखता है के वहां पर चेतन नही था। दक्षराज दयाल से कहता है--
> दयाल ये चेतन कहां चला गया ?
दयाल भी हैरानी के साथ कहता है--
> नही मालिक मैने तो उन्हे। जाते हुए नही दैखा। वो अभी यही पर था।
दक्षराज और दयाल चेतन को यूं वहां से घायब दैखकर हैरान था। दक्षराज और दयाल दौनो ही चेतन को ढुंढने लग जाता है। दक्षराज सोचने लग जाता है --
> ये चेतन आखिर बिना बती के कहां गयाब हो गया। कही सुंदरवन के अंदर के नही चला गया। नही नही अगर वो सुंदरवन जाता तो मुझे जरुर बता के जाता।
इतना सौचते सौचते दोनो ही हवेली के बाहर तला जाता है जहां पर दक्षराज का नजर चेतन पर जाता है जो हवेली को चारों और घुरे जा रहा था। चेतन को दैखकर दक्षराज कहता है---
> अरे चेतन जी आप यहां है और मैं आपको अंदर ढुंढ रहा हूँ। चट्टान सिंह का फोन आया था वो कह रहा था के आलोक और ।
दक्षराज के इतना कहते ही चेतन अपनी अंगुली को अपने होंट पर रखकर दक्षराज को चुप रहने का इशारा करता है और फिर से हवेली को घुरने लग जाता है। दक्षराज चुप हो जाता है और सौचता है --
> आखीर ये चेतन को अचानक क्या हो गया । इसने कभी हवेली नही दैखी है क्या।
दक्षराज कुछ बोल पाता उससे पहले चेतन दयाल से कहता है---
> दयाल अंदर जाकर कागज और कलम लेकर आओ। दयाल हैरानी से दधराज की और दैखता है दक्षराज दयाल को कागज और कलम लाने का इशारा करता है। दयाल अंदर जाकर कागज और कलम लेकर आता है और चेतन को दे देता है। चेतन दयाल से कागज कलम लेकर उसमे कुछ लिखने लगता है।
दक्षराज ये सब दैखकर हैरान हो जाता है और गौर से चेतन की और दैखने लगता है। चेतन कागज पर लिखकर उस कागज को दयाल को पकड़ा देता है। दयाल उस कागज को दक्षराज को दे देता है।
दक्षराज कागद पे लिखा को पड़ कर घबरा जाता है और उसके माथे पर पसीने की बड़ी बड़ी बूदें थी। दक्षराज बहुत डरा हुआ था जिसे दैखकर दयाल भी घबरा जाता है और सौचने लगती है ---
> आखीर इस कागज मे ऐसा क्या लिखा है जिसे पड़कर मालिक की ये हालत हो गयी। दयाल दखराज से पूछता है---
> मालिक ! इस कागज पर ऐसा क्या लिखा है जिससे पड़कर आपकी ये हालत हो गयी।
दक्षराज कागज़ को दयाल के हाथ मे थमा देता है। दयाल कागज को मन ही मन पड़कर लगता है। चेतन ने कागज पर लिखा था के हवेली के आसपास कोई दैत्य शक्ती है जिसका आभास मुझे हो रहा है। शायद वो शक्ती छिपकर हमारी बात सुन रहा है इसिलिए मेैने इस कागज पर लिख कर तुम्हे सब बता रहा हूँ।
चट्टान सिंह की बात मुझे समझ मे आ गया है क्योकी हॉस्पिटल मे मुझे आभास हो गया था के आलोक को मुझ-पर शक हो गया है और वो मुझ-पर नजर रखने लगे है।
To be continue....902